बस्ती। अगर 101 साल बाद भी ब्राहृमण महासभा बेदाग नहीं हो पाया, तो सवाल तो उठेगा, 100 साल बाद जिस संस्था को उंचाईयों की बुलंदी को छूना चाहिए, अगर उस पर चंदा चोरी और प्रापटी को हजम करने का आरोप लगे, तो यह उस समाज के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य की बात हैं, जो समाज का सबसे बुद्विजीवी वर्ग माना जाता है। कहना गलत नहीं होगा ब्राहृमण समाज अपने आराध्य देवता का मंदिर तक नहीं बचा पा रहे है। जो समाज अपने आराध्य देवता का मंदिर नहीं बचा पा रहा है, वह अपने भाई बंधुओं की रक्षा करेगा? सबसे धुर्त और बेईमान समाज के ठेकेदार बने बैठे है। जिस समाज के लोगों ने सबसे अधिक सीएम, सांसद ओर विधायक दिया, आज वह समाज एक मंडल में एक सांसद के लिए तरस रहा, आज इन्हीं समाज के लोगों को आए दिन सोषल मीडिया पर अपशब्द कहे जा रहे है। अब तो नगर पालिका के अभिलेखों में ब्राहृमण महासभा मालवीय रोड के नाम से दर्ज होने की आवाज उठने लगी है। सवाल उठ रहा है, कि जब यह संस्था किसी व्यक्ति के नाम नहीं हो सकती तो कैसे 1997 में इसके राष्टीय महामंत्री कमलेश्वर पांडेय ब्राहृमण समाज भवन दर्ज हो गया? और कैसे इनका नाम 2016 तक यानि 19 साल तक दर्ज रहा? और जब अध्यक्षजी को 2016 में यह पता चला कि ब्राहृमण महासभा के मकान और हाता को वर्तमान महामंत्री शंभूनाथ मिश्र ने प्रापर्टी को स्वंय के नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन किया, तो उसी समय क्यों नहीं अध्यक्षजी ने महामंत्री को बाहर का रास्ता दिखाया? और क्यों अध्यक्ष और महामंत्री के नाम दर्ज करवाया? जब नाम और पद नाम से दर्ज नहीं हो सकता तो क्यों 1997 में नाम से और 2016 में पद से दर्ज हुआ। अगर अध्यक्षजी 2016 में ही महामंत्री को निकालने का निर्णय ले लिया होता तो आज ब्राहृमण महासभा इस स्थित में न होता। महामंत्री को निकाला भी नहीं, और उसके पद के नाम से दर्ज भी करवा दिया। जब महामंत्री को यह लग गया, कि अध्यक्षजी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करेगें, तो उन्होंने चोरी करना शुरु कर दिया, और ब्राहृमण महासभा को ऐसे स्टेज पर लाकर खड़ा कर दिया, जहां पर इसका कोई नाम भी लेना चाहता। महामंत्री के खिलाफ जो भी आरोप लगाए गए, वे सब सच साबित हो रहे है। महामंत्री को दस साल का मौका देने का मतलब ब्राहृमण महासभा की बर्बादी माना जा रहा है, और इसके लिए काफी हद तक अध्यक्ष को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। कहा भी जाता है, अगर किसी चोर को छोड़ दिया जाए, तो वह चोरी करना नहीं छोड़ता बल्कि और तेजी से चोरी करने लगता है, जब आप किसी चोर को मौका देगें तो वह चोरी करेगा ही, जिसका उदाहरण शंभूनाथ मिश्र के रुप में देखा जा सकता है। इसी तरह पिछले 25 सालों से महामंत्री और कोषाध्यक्ष को हिसाब-किताब देने का मौका दिया जा रहा है, जिसका नतीजा आज सबके सामने है। अभी भी समय है, जितना जल्दी हो सके, ब्राहृमण महासभा का नाम नगर पालिका में दर्ज करवाइए, तब फिर कोई शंभूनाथ मिश्र जैसा व्यक्ति इसे अपने नाम नहीं करवा पाएगा। महामंत्री झूठ पर झूठ बोलते जा रहे हैं, फिर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है, क्यों नहीं की जा रही है, और क्यों नहीं दस साल पहले की गई? इस सवाल का जबाव आज भी लोग जानना चाहते है। सवाल उठ रहा है, कि जब 1925 में ही तत्कालीन एसडीएम सूरत नरायण मणि ने जमीन ब्राहृमण महासभा के नाम से नाम से आवंटित किया तो बाद में कैसे यह कमलेष्वर पांडेय और उसके बाद अध्यक्ष और महामंत्री के नाम हो गया? और जब इसके संस्थापक ग्राम बरपार देवरिया के सूरत नारायण मणि त्रिपाठी रहें, तो कैसे महामंत्री अपने आप को संस्थापक लिखने और कहने लगें? क्यों नहीं लोगों ने इस पर एतराज जताया? कहने का मतलब महामंत्री को बढ़ावा ब्राहृमण महासभा के लोगों ने ही दिया।