बस्ती। महिलाओं का सहारा लेकर अपनी ताकत दिखाना आज के नेताओं के लिए फैशन सा बनता जा रहा है, चूंकि नेताओं के पास पैसे की कोई कमी नहीं होती है, इस लिए यह लोग पैसे के बल पर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं का इस्तेमाल भीड़ जुटाने के लिए करते हैं, बड़े नेताओं को इसी भीड़ को जनसमर्थन बताकर टिकट का दावा ठोकतें हैं, लेकिन इनकी असलियत का पता चुनाव के परिणाम के बाद पता चलता है। जिले में कोई भी ऐसा नेता नहीं जिसके पास अपार जनसमर्थन हो, और जिसके एक आवाज पर हजारों की भीड़ जमा हो जाए, सच तो यह है, कि इन लोगों के पास हजार दो हजार तक के समर्थक नहीं होगें, अगर यह लोग किराए पर भीड़ न जुटाएं तो इनके बड़े नेताओं की जनसभा और रैली कभी सफल ही न हो। हजार, दो हजार की भी भीड़ जुटाना मुस्किल हो जाएगा। सवाल उठ रहा है, कि जब नेता पैसे से भीड़ जुटा सकते हैं, तो फिर पैसे से चुनाव क्यों नहीं जीत सकते? जिस तरह भीड़ जुटाने के लिए महिलाओं का सहारा लिया जा रहा है, उससे उनके सम्मान को ठेस पहुंचता, चूंकि गरीबी और आर्थिक तंगी इतनी है, कि महिलाएं हजार-पांच सौ और एक साड़ी पर भागी-भागी गांव से षहर चली आती है 

महिलाओं का इसे अधिक अपमान और नहीं हो सकता, एक तरह से महिलाओं को उनका समय खरीदने जैसा होता है। यह भी सच है, कि अगर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं न हो तो कोई कार्यक्रम सफल ही न हो, इसके लिए नेताओं को महिलाओं का शुक्रगुजार होना चाहिए, वरना कम भीड़ देखकर कोई बड़ा नेता आना ही नहीं चाहेगा। सवाल यह भी उठ रहा है, कि तिरंगा यात्रा में साड़ी और पांच सौ रुपया का क्या काम? क्या मोदीजी ने कहा था, कि साड़ी और पैसा देकर तिरंगा यात्रा में महिलाओं की भीड़ जुटाइए।

कल से एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को इस लिए साड़ी बांटी जा रही है, ताकि वह साड़ी के बदले नेताजी की तिरंगा यात्रा को सफल कर सके। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि लाइन लगाकर साड़ी और पैसा बांटा बांटी जा रहा हैं, इतनी महिलाओं को बुला लिया गया था, कि अनेक महिलाएं इसका विरोध कर रही थी, और कह रही थी, जब साड़ी नहीं देना था, तो बुलाया क्यों? और जब बुलाया तो क्यों बाहर धकेलकर अपमानित किया? एक महिला तो यहां तक कह रही थी, कि हम लोगों की भी इज्जत है। ऐसा लगता है, मानो नेताजी को इस बात का एहसास नहीं रहा होगा, कि साड़ी के लिए इतनी अधिक महिलाओं की भीड़ हो जाएगी। भीड़ तिरंगा यात्रा में दिखी भी, लेकिन यह भीड़ नेताजी के समर्थकों या उनके चाहने वालों की नहीं थी, बल्कि अधिंकाष भीड़ किराए पर लाई गई थी। कहने को भले ही नेता महिला षस्तीकरण की बातंे करते हैं, लेकिन असलियत में इन महिलाओं का यह लोग उपयोग करते है। नेता लोग जब चाहते हैं, हजार-पांच और साड़ी देकर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को कभी रैली में भीड़ बढ़ाने तो कभी नेताओं के स्वागत में भीड़ दिखाने तो कभी तिरंगा यात्रा में महिलाओं की भीड़ दिखाकर अपनी नकली ताकत का एहसास भाजपा के बड़े नेताओं को कराते आ रहे है। ऐसे नेताओं की उनकी असली ताकत चुनाव में दिखाई ही देती है। नकली भीड़ दिखाकर टिकट पाने में सफल तो हो जाते हैं, लेकिन जहां असली परीक्षा होती है, वहां फेल हो जातें हैं, क्यों कि वहां पर नेताओं का पैसा काम नहीं आता, काम इस लिए नहीं आता क्यों कि इनसे अधिक देने वाले अन्य तैयार रहते है। एक साड़ी और पांच सौ रुपये के लिए अनेक घरों में काम करने वाली महिलाएं, उस दिन काम पर ही नहीं गई। कहा भी जाता है, कि सबकुछ कीजिए लेकिन धन का प्रदर्षन मत करिए, फिर कहा जा रहा हैं, कि धन से भीड़ तो जुटाई जा सकती है, लेकिन चुनाव नहीं जीता जा सकता। सवाल उठ रहा है, कि तिरंगा यात्रा में साड़ी और पांच सौ रुपया का क्या काम? क्या मोदीजी ने कहा था, कि साड़ी और पैसा देकर तिरंगा यात्रा में महिलाओं की भीड़ जुटाइए। जो लोग इस तरह की राजनीति करते हैं, वह कभी सफल नहीं होते, वही सफल होते हैं, जो जनता के बीच में लोकप्रिय होतें और जिनका चरित्र बेदाग होता, वरना मोदी, योगी और शाह भी चाहेंगे तो चुनाव नहीं जीता पाएगें। जिले में पैसे के बल पर जो लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहते हैं, उन्हें अपनी रणनीति बदलनी चाहिए, और उन नेताओं से सीख लेनी चाहिए, जिन्होंने पैसा तो अथाह खर्च किया, लेकिन चुनाव नहीं जीत पाएं, सरकार की योजनाओं और सरकारी धन से जिले का सबसे अधिक विकास करने का दावा करने वाले पूर्व सांसद जब चुनाव नहीं जीत पाए, तो नीजि धन से कैसे कोई चुनाव जीत पाएगा? ध्यान देने वाली बात है, कि पैसे से टिकट मिल सकता है, लेकिन पैसे से चुनाव नहीं जीता जा सकता, इस फारमूले को अगर कोई एडाप्ट कर लेता है, तो उसका बहुत कुछ बच जाएगा, हारने के दाग लगने से बच जाएगा।