किसानों की हजारों बीघे लौकी,तुरई, चारा की फसल गंगा की बाढ़ में बर्बाद,कौन जिम्मेदार

ओमप्रकाश गौतम

समय रहते सिस्टम और जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी निभाते तो हर साल किसान की फसल बर्बाद नहीं होती। बारिश के मौसम में हर साल गंगा की बाढ़ आती है इस साल भी खादर के दो दर्जन गांवों के जंगल में हजारों बीघे किसान की लौकी, तुरई,चारे की फसल गंगा बाढ़ की भेंट चढ़ गई। पशु पालकों को महिला दस,पंद्रह किमी दूर दराज सड़क किनारे से घास लाने को मजबूर है। आखिर किसान की इस तबाही का जिम्मेदार कौन है? कोई जिम्मेदार होता तो किसान की फसल के नुकसान की भरपाई कराई जाती मगर ऐसा नहीं होता है जबकि सरकार किसान की फसल के नुकसान की भरपाई का हर साल प्रदेश स्तर पर दावा करती है। 

सिस्टम की अनदेखी 


जनपदीय आला अधिकारियों को समय पर चेताया जाता है।   गत वर्ष तो तत्कालीन जिला अधिकारी अभिषेक पांडे ने बाढ़ ग्रस्त इलाके में गंदे पानी में घुसकर किसान की दुर्दशा को देखा था। जंगल में बरसाती नालों और नगर सहित आबादी के नालों की सफाई के लिए चेताया गंगा के रौद्र रूप कहकर टाल दिया गया। 

क्या कहते है किसान
समाज सेवी भारतीय किसान संघ के पूर्व जिला महामंत्री सोनू चौहान ने बताया कि गंगा की बाढ़ में करीब तीन हजार बीघे सब्जी लौकी, तुरई,नष्ट हो गई जंगल में जल भराव में चारा नहीं बचा। खादर के किसानों को करोड़ों का नुकसान हो गया। जिम्मेदार जनप्रतिनिधियों को हर साल बताया जाता है। ग्राम प्रधान, एम एल ए और एमपी को किसानों की दुर्दशा नजर नहीं आती है। चुनाव के समय जात,धर्म में फंसा कर जीत जाते है और अपनी जिम्मेदारी से दूर हो जाते है। तीन करोड़ की लागत से काकाठेर तीन लेयर का कच्चा बांध बनाया गया जो अधिकारियों की मनमानी के चलते दो लेयर गंगा में डूब गई। गंगा का जल आबादी को छू रहा है। ग्रामीणों की चिंता कम नहीं हो पाई। 

मुख्यमंत्री की गंगा किनारे घोषणा भी फेल
मुख्यमंत्री योगी आदिनाथ ने अपने पहले काल खंड 22 नवंबर 2018 को गंगा किनारे पर कार्तिक गंगा स्नान मेला का उद्घाटन तथा गत वर्ष 2025 को भी गंगा मेला का उद्घाटन अवसर पर गंगा पुल बनाने की घोषणा भी हवा हो गई जबकि घोषणा पर अमल होता तो बाढ़ के प्रकोप से बचकर क्षेत्र की तरक्की होती। विधायक हरेंद्र सिंह तेवतिया और धनौरा विधायक राजीव तरारा ने अपने अपने विधान सभा क्षेत्र की समीक्षा बैठक में गंगा पुल का निर्माण कराए जाने को उठाया तो मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे को स्वयं का बताया गया मगर हर साल होने वाली किसानों की परेशानी कम नहीं हुई।