रिटायर के आठ दिन पहले डायरेक्टर साहब ने अपने ईमान को श्री इंटरप्राइजेज के भगवान यादव के हाथों दो करोड़ में बेच दिया, इसके बदले इन्होंने अधिकार के बाहर जाकर सात अरब के चददर की धुलाई का आर्डर दे दिया
-जिस चददर की धुलाई का टेंडर बस्ती में 245 रुपये में निकला, उसी चददर की धुलाई के लिए डायरेक्टर साहब ने जाते-जाते श्री इंटरप्राइजेज को 1245 रुपये में आर्डर कर दिया, यानि छह अरब से अधिक का सरकार का नुकसान कर गए भ्रष्ट डायरेक्टर
बस्ती। ऐसा लगता है, मानो स्वास्थ्य विभाग में लोग इस लिए नौकरी करना पसंद करते हैं, ताकि ईमान बेचकर धन कमाया जा सके। यहां पर लगभग सभी का ईमान बिकता, बस खरीदने और कीमत देने वाला चाहिए। कीमत मिल जाने के बाद डायरेक्टर स्तर का अधिकारी खुद को बेचने के लिए तैयार हो जाते है। जब डायरेक्टर स्तर का अधिकारी अपना ईमान और धर्म पैसे के लिए बेच सकते हैं, तो अगर सीएमओ, सीएमएस, चीफ फार्मासिस्ट और बाबू अपना ईमान बेचा तो कौन सा गलत किया। जब विभाग के मंत्री अपना ईमान बेच सकते हैं, तो फिर बचा क्या? यह लोग जब तक नौकरी में रहते हैं, बिकने के आलावा और कोई काम नहीं करते, यह लोग नौकरी के अंतिम दिनों तक बिकने को तैयार रहते हैं, और इंतजार करते हैं, कि कोई खरीदने वाला आए, और उसे खरीदे। इन्हीं में एक नाम हैं, हेल्थ डायरेक्टर डा. रतन पाल सिंह सुमन का है। इनकी लाटरी उस समय लगी, जब इनके पास श्री इंटरप्राइजेज के भगवान यादव पहुंचे, इन्हें डायरेक्टर साहब तक और कोई नहीं बल्कि एक महिला अधिकारी ने पहुंचाया, और महिला ने इसकी कीमत भी खूब वसूली। बताते हैं, कि इस महिला की बात प्रमुख सचिव भी नहीं काटते, इस लिए अगर किसी ठेकेदार को कोई काम प्रमुख सचिव से करवाना होता है, वह महिला की मदद लेता है। ऐसी पावरफुल महिला पूरे स्वास्थ्य विभाग में नहीं मिलेगी। चूंकि डा. रतन पाल सिंह रिटायर होने वाले थे, इस लिए जाते-जाते वह इतना लूटकर ले जाना चाहते थे, जितना पूरी नौकरी में नहीं लूटा होगा। ऐसे में श्री इंटरप्राइजेज के भगवान यादव उनके सामने लक्ष्मी का भंडार लेकर आए। कहते हैं, कि जैसे ही यादवजी ने दो करोड़ का आफर दिया, और काम बताया तो डायरेक्टर साहब की आखंे चमक उठी। सोचा कि अगर जाते-जाते उन्हें कोई दो करोड़ दे रहा है, तो इसमें बुराई क्या है? डायरेक्टर साहब को अच्छी तरह मालूम था, कि जिस काम के लिए उसे दो करोड़ का आफर दिया जा रहा है, वह उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है। फिर भी उन्होंने काम करने की हामी भर दी, महिला अधिकारी ने भी कहा कि साहब कर दीजिए मेरे रहते आप का कुछ नहीं होगा, मैं सबकुछ संभाल लूंगी। क्यों कि मेरी पहुंच प्रमुख सचिव तक है। उसके बाद डायरेक्टर साहब वह काम किया, जिसे खुद के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा कहा जाता है। बिना टेंडर के इन्होंने श्री इंटरप्राइजेज को प्रदेष भर के सरकारी अस्पतालों के चददर और कबंल धोने का आर्डर बिना टेंडर निकाले दे दिया, जाहिर सी बात कि नोट षीट पर प्रमुख सचिव के भी हस्ताक्षर होगें।
बता दें कि सरकार ने सरकारी अस्पतालों के टेंडर निकालने और अनुबंध करने की जिम्मेदारी मेडिकल कारपोरेशन को दे रखी है। कारपोरेषन ने इसके लिए टेंडर भी निकाला, लेकिन सिर्फ श्री इंटरप्राइजेज के क्वालीफाई करने से टेंडर को निरस्त करना पड़। श्री इंटरप्राइजेज का टेंडर एक चददर की धुलाई का 1245 रुपया भरा गया था। लगभग दो साल तक यादवजी टेंडर पाने के लिए परेशान रहे। मगर कारपोरेश\न ने टेंडर ही नहीं निकाला। नियम विरुद्व और अधिकार से बाहर जाकर दो करोड़ लेकर फर्जी आर्डर करने वाले डायरेक्टर डा. रतन पाल सिंह के फर्जीवाड़ा की षिकायत करते हुए कुंवर कांस्टक्षन कंपनी बस्ती के रमेष प्रसाद ने लिखा कि डायरेक्टर ने दर रुपया 500 प्रति षैया के स्थान पर श्री इंटरप्राइजेज को 1245 रुपया प्रति शैया का अनुमोदन रिटायर होने के आठ दिन यानि 31 दिसंबर 25 से पहले लाभ लेकर आदेश पारित कर दिया, जब कि इन्हें आदेश पारित करने का कोई अधिकार ही नहीं है। लेकिन इन्होंने भारी रकम लेकर आदेष जारी कर दिया। कहा कि नियम विरुद्व आर्डर करने से सरकार को हर साल करोड़ों रुपये का सरकार का नुकसान हो रहा है। कहा कि मेरी फर्म प्रति षैया जीएसटी लेकर 278 रुपया की धुलाई करने को तैयार है। पत्र में श्री इंटरप्राइजेज और डा. रतन पाल सिंह के विरुद्व जांच कराकर विधिक कार्रवाई करने की मांग की गई है। प्रदेष भर के अस्पतालों में डेली 49400 चददर की धुलाई होती है। इस तरह एक माह में सिर्फ चददर की धुलाई के मद में लगभग 62 करोड़ का भुगतान श्री इंटरप्राइजेज को हो रहा, और सालाना लगभग सात अरब का भुगतान होता। अब जरा अंदाजा लगाइए कि बस्ती के कुंवर कांस्टक्षन कंपनी 245 रुपये में एक चददर की धुलाई कर रही है, और उसी चददर की धुलाई का आदेश श्री इंटरप्राइजेज को 1245 रुपये में दिया गया। यही कारण है, कि यह फर्म एक चददर पर 500 रुपया का कमीशन दे रही है।
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