बस्ती। क्या कभी ब्राहृमण महासभा और समाज के लोगों ने यह सोचा भी था, कि जिस व्यक्ति ने ब्राहृमण महासभा पर दो दषकोें से अधिक समय तक राज किया हो, लोग उस कथित चंपत राय को बाहर का रास्ता दिखाने और हिसाब-किताब न देने पर गबन का एफआईआर दर्ज कराने की मांग करने लगेंगें। अगर ब्राहृमण महासभा जैसी संस्था के राष्टीय महामंत्री पर चंदा चोर और पत्थर चोर जैसे आरोप लगने लगे तो यह संस्था के लिए बहुत ही शर्मनाक। आरोप इतने दिनों से लग रहें, लेकिन जबाव नहीं दिया जा रहा। खुषबु के उस कमेंट पर हर उस ब्राहृमण महासभा के सदस्यों और समाज को विचार अवष्य करना चाहिए, कि आखिर इस तरह का कमेंट करने की क्या आवष्यकता पड़ गई। लिखा कि ब्राहृमण महासभा बहुत ही षर्मनाक स्थित में पहुंच गया है, यह ब्राहृमण महासभा, समाज में हम लोग क्या मुंह दिखाएगें? जब मेढ़ ही खेत खाने लगा, ऐसे चंपत राय जैसे लोगों को सभा से बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए, और हिसाब-किताब न देने पर गबन का एफआईआर दर्ज होना चाहिए। कोई इस कमेंट को उस तरह हल्के में न लें जिस तरह अभी तक लेते आएं हैं, और जिसका नतीजा आज सबके सामने है। ओंकार लिखते हैं, कि असफलता स्वीकार हैं, लेकिन धोखाधड़ी नहीं। कोयला के बड़े कारोबारी नवीन दूबे जिसे महासभा का जिलाध्यक्ष बनाने के लिए महामंत्री ने अपने राष्टीय अध्यक्ष तक से झूठ बोला, और जिसके लिए सारे नियम कानून तोड़ा, उन्होंने लिखा कि पत्थर चोरी हो या चंदा चोरी, दोनों ही गंभीर एवं अक्षम्य अपराध है। ऐसे कृत्यों को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नही किया जा सकता। कहा कि आगामी बैठक में निष्पक्ष एवं पारदर्षी जांच का निष्कर्ष प्रस्तुत किया जाए। अगर कोई व्यक्ति दोषी पाया जाता है, तो उसके विरुद्व बिना किसी पक्षपात के संगठन के नियमों के अनुसार कठोरतम कार्रवाई की जाए,? ताकि भविष्य में कोई भी इस प्रकार का कृत्य करने का साहस न कर सके।
जिस तरह चंदा चोरी के बाद राम मंदिर की व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, उसी तरह ब्राहृमण महासभा की मंदिर की व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे है। दोनों में काफी समानता दिखाई दे रही है। सवाल तो अब राष्टीय अध्यक्ष पर भी उठने लगें, और पूछा जा रहा है, कि जब चंदा चोरी से लेकर पत्थर चोरी और मनमाने तरीके से पदाधिकारियों की नियुक्ति की जानकारी थी, तो क्या कार्रवाई किया? क्यों नहीं इतने गंभीर आरोपों की जांच करवाई और क्यों नहीं पत्थर चोरी के आरोप में मुकदमा दर्ज करवाया? क्यों नहीं अनियमित नियुक्ति के लिए महामंत्री से सवाल जबाव किया, और क्यों नहीं उन्हें अनियमित कार्य करने से रोका? आखिर आप की क्या मजबूरी थी? अगर आप समय रहते कार्रवाई कर दिए होते तो आज आप ही के लोग आपको मौनी बाबा न कहते, और आप से कोई सवाल कर पाता। यह भी किसी ने नहीं सोचा नहीं रहा होगा, कि ब्राहृमण महासभा मीडिया की सुर्खियां बनेगी। देखा जाए तो हर किसी के निषाने पर महामंत्रीजी है। क्यों हैं, इसके लिए यह खुद जिम्मेदार है? इनके चाहने वाले बार-बार समझाते रहे कि हिसाब-किताब क्यों नहीं देते? अगर यह मित्रों की बात मान लिए तो ब्राहृमण महासभा और षंभूनाथ मिश्र को यह दिन न देखना पड़ता। उदयषंकर षुक्ल, साथियों को अपना अनुभव बताते हैं, कि जिस संस्था में अखबारबाजी और सोषल मीडिया पर पदाधिकारियों की आलोचना लिखी जाने लगे, वह संस्था समाप्त हो जाती है, खुली चर्चा ही लोकतंत्र का मंच होता है। अंबिका पांडेय लिखते हैं, कि ब्राहृमण सभा किसी व्यक्ति की जागीर नहीं, पूरे समाज की सामूहिक धरोहर है, पद नहीं प्रकिया का सम्मान ही संगठन की पहचान बनता है, सदस्यता के बिना पद बांटना संगठन की गरिमा की गरिमा पर प्रष्नचिंहृ खड़ा करता है, पारदर्षिता, लोकतंत्र और सवंाद से ही संगठन का सम्मान ओर विष्वास बना रह सकता है। बृजनंदन दास मिश्र लिखते हैं, कि बिना सदस्य के ही लोगों को प्रसाद के रुप में बड़े-बड़े पद पर नाम की घोषणा कर दी जाती है, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, पदाधिकारी के लिए सदस्य होना आवष्यक है, चाहें सामान्य सदस्य हों या आजीवन सदस्य। डा. आषीष नरायन त्रिपाठी ने राष्टरय अध्यक्ष से पूछा कि क्या बिना आजीवन सदस्य बने, क्यों लोग पदाधिकारी बनते जा रहे हैं? क्यों पद देने के लिए सारे नियम कानून को ताक पर रख दिए गए। दो लोगों को बिना सदस्य के पदाधिकारी बनाए जाने का विरोध हो रहा है, इनमें जिलाध्यक्ष नवीन दूबे, इन्हें जिलाध्यक्ष बनाने के लिए ई. राधेष्याम पांडेय को जिलाध्यक्ष के पद से हटाकर राष्टीय उपाध्यक्ष बना दिया, जब इसके लिए अध्यक्षजी ने महामंत्री से पूछा कि क्या इसकी जानकारी और सहमति ई. राधेष्याम पांडेय से ली या नहीं, पर कहा ली, लेकिन उन्हें पता चला कि राधेष्याम पांडेयजी से तो पूछा ही नहीं गया, इस पर अध्यक्षजी ने महामंत्रीजी की खूब क्लास लगाई, अगर उसी समय अध्यक्षजी कार्रवाई कर दिए होते तो महामंत्री बिना सदस्य के संजय षुक्ल को अनियमित रुप से जिला महामंत्री न बना पाते। अध्यक्षजी के सामने नियम विरुद्व बनाए गए पदाधिकारी की घोषणा की जाती है, उनका फूल मालाओं से स्वागत किया जाता हैं, और अध्यक्षजी मौन रहतेे है।
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