बस्ती। उप निदेशक कृषि पर बर्खास्त अमन प्रताप सिंह और शचि वर्मा के वेतन भुगतान के मामले में पक्षपात करने का आरोप लग रहा है। सवाल उठ रहा है, कि डीडी साहब ‘शचि वर्मा’ पर ‘रहम’ क्यों कर रहे हैं? और ‘अमन प्रताप सिंह’ पर सितम ‘क्यों’ ढ़ा रहें हैं? यह भी कहा जा रहा है, कि जब डीडी, षचि वर्मा को सारे नियम कानून को ताक पर रखकर और हाईकोर्ट के आदेष की अवहेलना करके बर्खास्तगी और स्थगन आदेश के बीच का लगभग डेढ़ के वेतन का भुगतान कर सकते हैं? तो क्यों नहीं अमन प्रताप सिंह को बर्खास्तगी और स्थगन आदेश के बीच के वेतन का भुगतान कर रहें? क्या कारण रहा कि ‘मैडम’ के मामले में डीडी इतने रहमदिल हो गए कि उनके लिए वित्तीय अनियमिता करने तक को तैयार हो गए, सरकारी खजाना तक को खोल दिया? और क्या कारण रहा है, कि अमन प्रताप सिंह के मामले में डीडी ने रहमदिल के होने का परिचय नहीं दिया? शचि वर्मा के अनियमित वेतन के मामले में डीडी और लिपिक पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है।

फर्जी वेतन बेचने के आरोप का दंश झेलने वाले डीडी पर नियम विरुद्व ‘पुनीत पांडेय’ को वीआरएस देने के मामले का निस्तारण न करने का भी आरोप लग रहा है। डीडी और जेडीए पर वीआरएस देने वाले तत्कालीन प्रभारी जिला कृषि अधिकारी डा. राजमंगल पांडेय को बचाने का भी आरोप लग रहा है। लगभग दो साल हो गए, और अभी तक जेडीए और डीडी इस नतीजे पर ही नहीं पहुंचे कि वीआरएस नियम से दिया गया, या फिर नियम विरुद्व। निस्तारण के मामले में दोनों अधिकारियों की भूमिका जांच कमेटी के गठन तक ही सिमट कर रह जा रही है। डीडी को अच्छी तरह मालूम हैं, कि कोई भी अधिकारी समकक्ष अधिकारी की जांच नहीं कर सकता, फिर भी वह जांच में समकक्ष अधिकारी को ही रख रहें है। जबकि एक अधिकारी लिखकर भी दे चुकें हैं, कि मेरे अधिकार क्षेत्र में समकक्ष अधिकारी की जांच करना नहीं है। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि जेडीए और डीडी को मामले का निस्तारण करने के लिए हर बार एक सप्ताह का समय दिया जाता है, लेकिन लगभग दो साल हो गए, इन अधिकारियों का अभी तक एक सप्ताह समाप्त नहीं हुआ, और न निदेशालय ही इस मामले में निस्तारण न करने वाले अधिकारियों के खिलाफ न तो कोई करता और न ही कोई सवाल-जबाव। इससे साफ पता चलता है, कि यह तो निदेषालय, जेडीए और डीडी, वीआरएस देने वाले अधिकारी को बचा रहे हैं, या फिर पीड़ित, अधिकारियों की इच्छा की पूर्ति नहीं कर पा रहें है। निदेशालय और शासन में बैठे अधिकारी भी सिर्फ कागजी घोड़ा दौड़ा रहे है। विभाग के एक अन्य अधिकारी ने यहां तक कह डाला कि पुनीत पांडेय को राहत सिर्फ हाईकोर्ट से ही मिल सकता? सवाल भी करते हैं, कि अगर इनके स्थान पर कोई और होता तो अब तक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुका होता। हालांकि पुनीत पांडेय को बार-बार ईशारा मिल रहा है, कि जाकर साहबों से मिल लीजिए, निस्तारित भी हो जाएगा और नौकरी के साथ लाखों रुपया का वेतन भी मिल जाएगा। देखा जाए यह लड़ाई न्याय और अन्याय के लिए हो रही है। जिस तरह अधिकारी ने असंवेदनशीलता का परिचय देते हुए पुनीत पांडेय के साथ अमानवीय व्यवहार किया हैं, उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। कार्यालय का हर कर्मी कह रहा है, कि नियम विरुद्व वीआरएस दिया गया। यह भी सही है, कि जब यह मामला कोर्ट में जाएगा तो सभी की कलई खुल जाएगी, और ऐसे एतिहासिक निर्णय की संभावना जताई जा रही हैं, जो विभाग और शासन के लिए एक नजीर बनेगा, कार्रवाई के दायरे में वे लोग आएगें, जिन लोगों ने न्याय नहीं किया, और अन्याय करने वालों का साथ दिया। जेडीए और डीडी की मंशा है, कि इस मामले में जो भी कार्रवाई या निर्णय हो वह निदेशालय और शासन स्तर पर हो। एक अधिकारी ने बेबाकी से कहा कि अगर निदेशालय और शासन को लगता है, कि अनियमित रुप से वीआरएस दिया गया तो निर्णय क्यों नहीं ले रहें हैं? क्यों जेडीए और डीडी के पाले में गेंद फ्रेंक दे रहें हैं? देखा जाए तो अधिकारी की कही हुई बातों में वजन लगता है।