बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि क्यों भाजपा के जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी की डूबती नैया का सहारा बार-बार सपाई बन रहे हैं? पूछा जा रहा है, कि जिसे सहारा बनना चाहिए, वह क्यों नहीं बन रहा, और जिसे नहीं बनना चाहिए, वह क्यों बन रहा हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि संजय चौधरी को भाजपाईयों से अधिक सपाईयों पर भरोसा हो। भाजपाईयों का संजय चौधरी से किनारा कसना और सपाईयों का करीब आना कहीं किसी और बात की ओर तो संकेत नहीं कर रहा है? बहरहाल, अंदर की बात चाहें जो भी हो, लेकिन दो घटनाओं ने सजंय चौधरी को सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि अपना कौन है, और पराया कौन? राजनीति के गलियारें में इसके कई मायने निकाले जा रहे है। रही बात संजय चौधरी को समझने और न समझने की बात तो जब इन्हें पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी नहीं समझ पाए तो किसी और में इतनी समझ कहां कि वह संजय चौधरी को समझ सके। इनके साथ रहने वाले कहते हैं, कि भईया को समझना सबके बस की बात नहीं है। इन्हें वही समझ सकता है, जो इनसे धोखा खाया होगा। बात हम कर रहे थे, कि क्यों जब भी इनके उपर कोई मुसीबत आती है, तो भाजपाई क्यों नहीं साथ में खड़े होते? क्यों सपाई इनके लिए डटकर खड़े रहते है? आप लोगों को याद होगा जिला पंचायत के उस बैठक की जहां पर गिल्लम चौधरी, विधामणि सिंह सहित दर्जनों भाजपाई इनके भ्रष्टाचार पर हमला बोल रहे थे, बात हाथापाई तक पहुंच गई थी, तब ऐसे मौके पर सपा के विधायक महेंद्रनाथ यादव, राजेंद्र चौधरी और अतुल चौधरी बचाव में उतर आए थे, जबकि सपाईयों को भाजपाईयों के साथ संजय चौधरी कस विरोध करना चाहिए था, लेकिन विरोध के बजाए बचाव कर रहे थे, तभी से सपाईयों पर सवाल उठते आ रहे हैं, कि आखिर आप लोग क्यों बचाव कर रहे थे? जबकि आप लोगों को तो इनके भ्रष्टाचार का विरोध करना चाहिए था। यह ऐसा मौका था, जब सभी ने यह देखा कि सपाई किस तरह भाजपा के जिला पंचायत अध्यक्ष का बचाव कर रहे हैं। तभी लोगों को खिचड़ी पकती हुई महसूस हुई थी। यह अलग बात हैं, कि जो भाजपाई संजय चौधरी का विरोध कर रहे थे, वे लोग बाद में समझौता कर लिए। सवाल उठ रहा हैं, कि जो गिल्लम चौधरी एंड पार्टी अविष्वास प्रस्ताव लाकर संजय चौधरी को पद से हटाना चाहती थी, उस ईमानदार पार्टी की ईमानदारी कहां चली गई, चंद रुपये में बिकने वाले लोग ही जिला पंचायत की बर्बादी के जिम्मेदार है। ऐसे बिकने वालों के साथ वही होना चाहिए, जो संजय चौधरी अब तक करते आएं। ऐसे बिकने वालों की औकात तो संजय चौधरी ने ही बताया था। अब आइए, एक दिन पहले हुए ‘दिषा’ की बैठक में जो कुछ हुआ। जैसे ही संजय चौधरी ने यह मुद्वा उठाया, सारे सपाई उनके पक्ष में ठीक उसी तरह खड़े हो गए, जिस तरह जिला पंचायत की बैठक में खड़े हुए थे। हालांकि भाजपा विधायक अजय सिंह ने उस समय संजय का विरोध किया जब वह यह कहने लगे कि इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं हैं, यह मामला गांव वालों और एथेनाल फैक्टी का निर्माण करने वालों के बीच का है। यहां पर अजय सिंह का विरोध करना जायज था, क्यों कि फैक्टी के लिए सरकार ने एनओसी जारी किया, एमओयू पर सरकार ने हस्ताक्षर किया, तो फिर यह कहना कहां तक उचित है, कि यह मामला सरकार का नहीं है। हैरानी होगी कि बैठक में अनेक भाजपाई बैठे हुए थे, लेकिन किसी ने संजय चौधरी का साथ नहीं दिया, साथ दिया, अतुल चौधरी, राजेंद्र चौधरी और महेंद्रनाथ यादव जैसे सपा के विधायकों ने। विरोध करना सही है, या गलत हैं, यह चर्चा का विषय हो सकता है, लेकिन ऐसे समय विरोध करना जब फैक्टी का निर्माण पूरा होने को है। सवाल यह भी उठ रहा है, कि जो विरोध नींव रखते समय होना चाहिए, वह निर्माण पूरा होते समय क्यों हो रहा है? क्यों यह विरोध चुनाव के करीब होने पर हो रहा है? बात यहां पर फैक्टी से गांव वालों को होने वाले नुकसान की नहीं हो रही है, और न रोजगार देने की हो रही है, बात हो रही है, विरोध के समय की। मौके पर सबसे अधिक विरोध सपा विधायक राजेंद्र चौधरी और भाजपा के जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी कर रहे हैं, और दोनों को रुधौली विधानसभा क्षेत्र ही चुनाव लड़ना है, तो सवाल उठ रहा है, इसका श्रेय किसे मिलेगा? भाजपा को या सपा को। गांव वाले भी नहीं समझ पा रहे होगें, कि अगर निर्माण रुक गया तो वह किसको श्रेय देगें और किसे जीताएगें? यह बहुत ही अहम सवाल है।