बस्ती। जिले की सरकारी जमीनों पर अगर भूमामियों ने कब्जा कर लिया या फिर कब्जा कर रहें हैं, उनमें 90 फीसद मामलों में प्रधानों का हाथ रहता है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जो प्रधान भूमि प्रबंधन समिति का अध्यक्ष होता है, और जिसके जिम्मे ग्राम समाज की संपत्तियों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी रहती है, अगर वही प्रधान भूमाफियों के साथ सरकारी जमीनों पर कब्जा करवाने में लिप्त रहेगा, तो क्या सरकारी जमीन बच पाएगी? 90 फीसद से अधिक सरकारी जमीनों पर कब्जा प्रधानों की सहमति से हो रहें हैं, या हो चुके है। इसमें सबसे खराब भूमिका नकली प्रधानों की रहती है, असली प्रधानों को पता ही होता कि उनके पति या देवर ने क्या-क्या किया? इन्हें पता चलता है, जब दनके खिलाफ एफआईआर होता है, और पुलिस इन्हें पकड़ने के लिए इनके घर पहुंचती है। कुछ इसी तरह का मामला गौर के ग्राम धोबहा का सामने आया। यहां की महिला प्रधान हैं, लेकिन जितने भी सही और गलत काम होते हैं, सब इनके पति यानि नकली प्रधान की सहमति से होते है। इनकी सहमति से ही गांव के एक र्जन से अधिक लोगों ने खलिहान और नवीन पर्ती की सरकारी जमीन पर पक्का निर्माण कर लिया, और खेती-बारी भी कर रहे है। यह सब तक हुआ, जब मामला हाईकोर्ट में चंदन कुमार के द्वारा दाखिल पीआईएल के बावजूद हुआ। हल्का लेखपाल और शिकायतकर्त्ता एसओ गौर, एसडीएम हर्रैया और डीएम के यहां दरखास्त देते रहें, लेकिन किसी ने सरकारी जमीन को बचाने का प्रयास नहीं किया। ऐसा लगता है, कि पूरा हर्रैया तहसील भूमाफियों के साथ खड़ा है। सरकारी जमीनों पर कब्जा होने में जितना हाथ प्रधानों का होता है, उससे अधिक हाथ तहसीलों का बचाव में होता है। सवाल उठ रहा है, कि आखिर गांव का आदमी शिकायत करने कहां जाएगा, सबसे पहले वह हल्का लेखपाल के पास जाएगा, क्यों कि हल्का लेखपाल भूमि प्रबंधन समिति का सचिव होता। जब वह नहीं सुनता तो एसडीएम के पास जाता है, और जब एसडीएम भी नहीं सुनते तो वह डीएम के पास जाता है, और जब डीएम भी नहीं सुनते तो वह कमिष्नर के पास जाता। इस बीच भागदौड़ में बता चलता है, कि सरकारी जमीन पर पक्का मकान बन गया, और पक्का मकान गिरवाना आसान नहीं होता। इसके बाद शिकायतकर्त्ता हाईकोर्ट जाता है, ताकि वह सरकारी जमीन को भूमाफियों के हाथों से बचा सके, अब जरा अंदाजा लगाइए कि एक गांव का आम आदमी अगर सरकारी जमीन को भूमाफियों के हाथों से बचाने के लिए पैसा खर्च करके हाईकोर्ट जाता तो फिर अधिकारियों के होने और न होने का क्या मतलब? बहरहाल, आज भी शिकायतकर्त्ता चंदन कुमार पुत्र तुलसीराम सरकारी जमीन को भूमाफियों के कब्जे से छुड़ाने के लिए दूषित सरकारी व्यवस्था से लड़ाई लड रहा है। कब तक लड़ेगा उसे नहीं मालूम।