बस्ती। जो सीएमओ की कुर्सी दो साल पहले 30-40 लाख में बिकती थी, अब उसकी कीमत एक करोड़ तक पहुंच गई है। जाहिर सी बात हैं, कि जो सीएमएस एक करोड़ देकर सीएमओ की कुर्सी पर बैठेगा, यह भजन तो करेगा नहीं। कुर्सी पर बैठते ही सबसे पहले वह एक करोड़ निकालेगा, फिर सात पुष्तों का इंतजाम यह सोचकर करेगा, कि पता नहीं फिर कभी सीएमओ की कुर्सी पर बैठने को नशीब हो कि नहीं? सीएमओ की कुर्सी पर बैठने को बेताब जब एक सीएमएस से बात होने लगी और यह कहा गया कि सरजी 30-40 लाख कहां से लाएगें, कहने लगे कि 30-40 लाख भूल जाइए, अब तो एक करोड़ का इंतजाम करना होगा। इससे कम में कुर्सी नहीं मिल सकती। जोर देकर कहने लगे, एक बार तो सीएमओ की कुर्सी पर तो बैठना ही है। भले ही चाहे एक करोड़ ही क्यों न देना पड़े? कहा कि न जाने कितने सीएमएस एक करोड़ लेकर घूम रहे हैं, हमारे साथ में एक और सीएमएस, सीएमओ की कुर्सी पर बैठने के लिए लाइन में लगे हुएं है। यह भी कहते हैं, कि कोई जरुरी नहीं कि एक करोड़ में कुर्सी मिल ही जाए, यह रकम और भी हो सकती है। जब यह जानने का प्रयास किया गया, कि क्या कोई काबिलियत या मेरिट के आधार पर सीएमओ नहीं बन सकता, तो कहने लगे, अगर मेरिट और काबिलियत के आधार पर ही सीएमओ बनाना होता, तो एक करोड़ की फीस क्यों देनी पड़ती? अब आप लोग समझ गए होगें कि क्यों सीएमएस लोग रिजेंट खरीद में इतना बड़ा घोटाला करते है।

एक अन्य सीएमएस ने बताया कि अधिकतर सीएमओ बनने वालों को अपनी जेब से एक रुपया भी नहीं लगाना पड़ता, सब कुछ ठेकेदार/आपूर्तिकर्त्ता मैनेज करते है। कौन से जिले का सीएमओ बनना हैं, वह बना देगें, बशर्ते सीएमओ बनने के बाद उनका पूरा ख्याल रखना होगा, सारे ठेकापटटी इन्हीं को ही देना होगा। एक तरह से सीएमओ की कुर्सी पर ठेकेदार को ही बैठना माना जाता है। छह माह भी नहीं बीतता है, कि ठेकेदार का खर्चा वसूल हो जाता है, उसके बाद जो भी समय बचता उसमें सीएमओ और ठेकेदार मिलकर जिले के पीएचसी, सीएचसी, नर्सिंग होम, अल्टासाउंड, पैथालाजी की जांच, लाइसेंस सहित एमओआईसी, फार्मासिस्ट एवं डाक्टरों के तबादले से लेकर उनके सीआर तक लिखने में हाथ साफ करते है। अगर किसी सीएमओ को बस्ती के डिप्टी सीएमओ डा. एके चौधरी, डा. एसबी सिंह और डा. बृजेश शुक्ल जैसी लुटेरे की टीम मिल गई, तो समझो सीएमओ की चांदी ही चांदी। डा. बृजेश शुक्ल जैसा अगर एनएचएम का प्रभारी और संदीप राय जैसा बाबू हो तो फिर क्या कहना? फिर चाहें एमओआईसी कप्तानगंज का बच्चा पीएमसी में लापरवाही से मरे या फिर सल्टौआ का एमओआईसी मार खाए, कोई फर्क सीएमओ और उनके लुटेरों की टीम पर फर्क नहीं पड़ता। देखा जाए तो बच्चा या फिर किसी मरीज की जान तो किसी गरीब परिवार की ही जाती, लेकिन यह लोग इतने असंवेदनशील होते हैं, कि मरे हुए बच्चे और मरीज के जांच के नाम पर पैसा लेते है। पैसा मिल जाने पर नर्सिगं होम वाले को क्लीन चिट मिल जाता है, दिखाने के लिए भले ही छोटी मोटी कार्रवाई कर दें, लेकिन कठोर कार्रवाई नहीं करते। सीएमओ की टीम को पूरी तरह मालूम था, कि एमओआईसी को मारने वाले का नर्सिगं होम अगर सील भी कर देगें तो वह पिछवाड़े से संचालन करेगा, यही कारण है, कि पिछवाड़े का दरवाजा सील नहीं किया। प्राइवेट नर्सिगं होम की लापरवाही से तो रोज किसी जच्चा बच्चाकी मौत होती हैं, मौत की जानकारी तो सोशल मीडिया के जरिए सभी को हो जाती, जांच टीम बनाने की भी जानकारी सीएमओ की ओर से जारी हो जाता है, लेकिन जांच टीम ने क्या कार्रवाई की, इसका पता किसी को भी नहीं चल पाता। सबकुछ मैनेज हो जाता है।