बस्ती। अगर कोई संयुक्त निदेशक शिक्षा यानि जेडीई आलोक दूबे जैसे बाबू से यह कहे, कि जितना चाहों उतना विभाग को लूट लो, हम तुम्हारे साथ है, तुम्हारे उपर आंच तक नहीं आएगी, तो बाबू भ्रष्टाचार का तो रिकार्ड बनाएगा ही। मंडल स्तर का अधिकारी अगर भ्रष्ट बाबू का साथ देता है, तो माना जाता है, कि वह भी भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। नहीं होता तो आलोक दूबे जैसे भ्रष्ट बाबू को बढ़ावा न देते है। जेडीई आनंदकर ने यह साबित कर दिया कि बाबू भ्रष्टाचार तभी करता है, जब साहब चाहेंगें, वरना किसी बाबू की इतनी हिम्मत नहीं  कि वह बिना साहब की मर्जी के एक रुपया भी ईधर का उधर कर सके। जेडीई साहब कभी भी भूलकर बाबूओं पर आंख बंद कर भरोसा मत करिएगा, नहीं तो किसी दिन ऐसी ठोकर लगेगी, कि संभल नहीं पाइएगा, खासतौर से आलोक दूबे जैसे बाबू से सावधान रहिएगा। वरना किसी दिन खून के आंसू भी रोना पड़ सकता है। देखा जाए तो वर्तमान में संयुक्त शिक्षा निदेशक यानि जेडीई कार्यालय को साहब नहीं बल्कि आलोक दूबे चला रहे है। दूबेजी साहब के इतने चहेते और कमाउपूत हैं, कि इनके लिए यह सारे नियम कानून को भी तोड़ने को तैयार रहते है। इनकी हर गलती को माफ करने को तैयार रहते है। साहब, आलोक बाबू के जाल में इतनी बुरी तरह फंस चुके हैं, कि निकलना भी चाहें तो नहीं निकल सकते। कार्यालय वाले पूछते हैं, कि आखिर साहब ने आलोक दूबे में ऐसा क्या देख लिया, कि उनके लिए कुछ भी करने को तैयार रहते है। ऐसा भी नहीं कि जो काम दूबेजी कर सकते हैं, वह हम लोग नहीं कर सकते। बहरहाल, किसी भी अधिकारी के लिए कोई बाबू खास नहीं होना चाहिए, अगर खास हुआ तो आरोप लगना तय है। बात पैसा कमाने या न कमाने की नहीं रहती, अधिकारी जितना अधिक सबसे को सम्मान देगा, उतना अधिक उसका सम्मान होगा।

कहना गलत नहीं होगा कि आउटसोर्सिगं के मामले में अगर दूसरा कोई कमिश्नर होता तो अब तक जेडीई नप गए होते, यही बात जब षुक्रवार को मीडिया की ओर से कमिश्नर को बताई गई, और पूछा गया कि सरजी जब इस मामले में जेडीई दोषी है, तो फिर क्यों नहीं उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को लिखा गया? जब उन्हें उनके आदेश और जेडीई के द्वारा बाबू के खिलाफ की गई कार्रवाई वाला पत्र दिखाया तो कहने लगे, कि जेडीई ने गलत किया, कमिश्नर साहब भी कहने लगे कि सचेत कोई कार्रवाई नहीं होता। कहने लगे कि वह इस मामले को देखेगे। यह भी कहा कि बाबू आलोक को क्यों नहीं उनके मूल मंडल आडिट के पटल पर भेजा गया? और क्यों उसे भानपुर के तहसील हर्रैया, भानपुर के अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विधालयों के अन्तर्जनपदीय स्थानान्तरण सबंधी कार्य के आलावा अशासकीय सहायता प्राप्त/वित्त पोषित संस्ृित माध्यमिक विधालयों, महाविधालयों की परीक्षा से संबधित कार्य, राजकीय कर्मचारियों के एसीपी संबधी प्रकरण का निस्तारण, आकस्मिक अवकाश पंजिका एवं आवागमन पंजिका का रखरखाव एवं संयुक्त षिक्षा निदेशक द्वारा सौंपे गए अन्य कार्य जैसा मलाई पटल दे दिया गया? जबकि इन्हें तत्कालीन जेडीई डा. ओम प्रकाश मिश्र इन्हें हटा चुके है। कहा गया कि सिर्फ आलोक बाबू के चलते पूरे कार्यालय का माहौल खराब हो रहा है। कमिश्नर साहब को यह भी बताया कि लोग यह जानना चाहते हैं, कि क्या जेडीई अपने खिलाफ कार्रवाई कर सकते है? आप ने उसी अधिकारी को कार्रवाई करने को लिख दिया, जो फर्जीवाड़ा का मुखिया हो।

बता दें कि इस संबंध में जांच समिति द्वारा पत्र संख्या 825 दिनांक 19 मार्च 2026 के माध्यम से उपलब्ध कराई गई। जांच टीम ने पहली नजर में गड़बड़ी निकाली। स्पष्ट कहा गया कि बिड में शिकायत करता के साथ-साथ अन्य फर्म अंतिम रूप से प्रचलित बिड के शर्तों के अनुसार तकनीकी रूप से योग्य नहीं पाई गई। निविदा में कई बिंदुओं पर अनियमितता किये जाने की पुष्टि हुई। जिससे स्पष्ट पता चल रहा है कि जो निविदा विभाग द्वारा आमंत्रित की गई थी उसमें पारदर्शिता नहीं बरती गई है। इसलिए कमिश्नर ने संयुक्त शिक्षा निदेशक बस्ती मंडल को यह निर्देशित किया है कि पूर्व में की गई निविदा को निरस्त करते हुए दोबारा फिर नियमानुसार निविदा आमंत्रित करते हुए अग्रिम कार्रवाई सुनिश्चित कराये और इसके साथ ही उन्होंने निर्देश दिए हैं कि दोषी के विरुद्ध उत्तरदायित्व निर्धारित करते हुए कृत कार्रवाई से उन्हें भी अवगत कराया जाए। जेडीई ने दोषी बाबू को कार्रवाई के नाम पर सिर्फ सचेत करने का मतलब जेडीई अपने कमाउपूत बाबू के खिलाफ कोई ऐसी कार्रवाई नहीं करना चाहते, जिससे बाबू का बहुत बड़ा नुकसान हो, इस नुकसान के चक्कर कहीं कमिश्नर साहब की ओर से जेडीई का ही नुकसान न हो जाए।