बनकटी/बस्ती। गौशाला सिरौता की दुर्दशा केवल एक गौशाला की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है, जहाँ घोषणाएँ तो बहुत होती हैं, लेकिन संवेदनाएँ कहीं खो गई हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो गौसंरक्षण केवल भाषणों और नारों तक सीमित रह जाएगा, और गौशालाएँ करुणा के केंद्र नहीं, बल्कि उपेक्षा के स्मारक बनकर रह जाएँगी।
भारतीय संस्कृति में गौमाता को केवल एक पशु नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा और करुणा का प्रतीक माना गया है। गाँवों की अर्थव्यवस्था से लेकर धार्मिक आस्था तक, गाय सदियों से भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। लेकिन विडंबना यह है कि आज जिन गौशालाओं को संरक्षण और सेवा का केंद्र होना चाहिए, वे स्वयं उपेक्षा, भ्रष्टाचार और अव्यवस्था की शिकार बन चुकी हैं। इसका सबसे मार्मिक उदाहरण है वृहद गौशाला सिरौता, जहाँ की दुर्दशा न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि समाज की संवेदनहीनता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
कागजों में करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, योजनाओं की घोषणाएँ होती हैं, निरीक्षणों की तस्वीरें अखबारों में छपती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बेहद भयावह है। वृहद गौशाला सिरौता में गायों के लिए न पर्याप्त चारा है, न स्वच्छ पानी, और न ही उचित चिकित्सा व्यवस्था। बरसात में कीचड़ और गर्मी में तपती जमीन पर जानवर तड़पते दिखाई देते हैं। कई गायें कुपोषण और बीमारी से दम तोड़ देती हैं, जबकि जिम्मेदार अधिकारी केवल फाइलों में “सब ठीक” का दावा करते रहते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन गायों को बचाने के नाम पर उन्हें गौशाला में लाया जाता है, वही गौशाला उनके लिए यातना गृह बन जाती है। भूख से कमजोर पशु, गंदगी से भरे परिसर और कर्मचारियों की कमीकृयह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को विचलित कर सकता है। लेकिन प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता इतनी गहरी हो चुकी है कि अब इन हालातों पर किसी को शर्म तक महसूस नहीं होती।
गौशाला की समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि नीयत और जवाबदेही की कमी है। यदि सरकारें वास्तव में गौसंरक्षण के प्रति गंभीर हैं, तो सबसे पहले गौशालाओं की पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित करनी होगी। स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गौशालाएँ केवल राजनीतिक नारों का माध्यम न बनें, बल्कि वास्तव में पशु संरक्षण का केंद्र बनें। समाज की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। अक्सर लोग सड़क पर घूमती गायों को पकड़कर गौशाला भेज देने को ही अपना कर्तव्य समझ लेते हैं, लेकिन उसके बाद उन पशुओं की स्थिति जानने की कोशिश नहीं करते। यदि नागरिक समय-समय पर गौशालाओं का निरीक्षण करें, दान के उपयोग पर प्रश्न उठाएँ और सेवा कार्यों में भाग लें, तो हालात बदले जा सकते हैं।
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