बस्ती। अगर अस्पताल खाली रहेगा और अस्पताल का सारा सामान सरकारी मकान में भरा रहेगा तो इसे आप क्या कहेंगें। यह हाल 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल का है। इस अस्पताल के सरकारी आवास में लगभग 10 परिवार रहता है। जिस डीएम और एसपी के बंगले में सबकुछ सरकारी होता है, ठीक उसी तरह अस्पताल के आवास में रहने वाले की सभी चीजें सरकारी है। साबुन से लेकर तौलिया तक बेड से लेकर विस्तर तक बाल्टी से लोटा तक गैस सिलेंडर से लेकर गैस चूल्हा तक टेबुल फैन से लेकर सीलिगं फैन तक, इंवर्टर से लेकर बैटरी तक सभी कुछ ‘वेल फर्नीस’ मिलता है। आप लोग सोच रहे होगें, कि ऐसी सुविधा अन्य सरकारी आवासों में रहने वालों को क्यों नहीं मिलती? तो आप लोगों को बता दें कि यह सरकारी सुविधा नहीं हैं, बल्कि अस्पताल से चोरी की गई सामान हैं। इस अस्पताल के भ्रष्टाचार का अंदाजा आप लोग इस बात से लगा सकते हैं, कि मरीजों की सुविधा के लिए लगा गैस प्लांट खराब रहता है, इसे इस लिए ठीक नहीं कराया जा रहा, ताकि कमीषन न बंद हो। खुले बाजार से कमीशन वाला गैस सिलेंडर खरीदा जाता, इसी तरह जनरेटर तो लगा है, लेकिन चलता नहीं, मगर जनरेटर चलाने के नाम पर ईधन अवष्य खरीदा जाता है। तेल खरीदने का लागबुक भी फर्जी भरा जाता है। यह सारी व्यवस्था बजरंगी प्रसाद बाबू का है। इनसे जिसने भी दोस्ती की वह फायदे में रहा, चाहें बाहर का हो या फिर चाहें अंदर का। इनका और इनके मैडम सीएमएस का एक ही उद्वेष्य हैं, अस्पताल को अधिक से अधिक खोखला करना। इस अस्पताल में एक भी ऐसा कोई ईमानदार नहीं, जो भ्रष्टाचार का विरोध कर से, जो भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं है, वह भी खिलाफत नहीं करता, दो-दो एलटी और पैथालाजिस्ट हैं, लेकिन कोई इस बात का विरोध नहीं करता कि क्यों सरकारी पीओ सीटी लैब के रहते प्राइवेट पीओसीएल लैब का संचालन हो रहा है, और क्यों प्राइवेट से रिजेंट खरीदा जा रहा है। जो नवयुवक कर्मी हैं, जिन्हें बेईमानी से कोई मतलब नहीं होना चाहिए, और जिसे भ्रष्टाचार का पुरजोर विरोध करना चाहिए, वह भी चुप है। ऐसा लगता है, कि मानो सभी का जमीर मर चुका है। पैसे के खातिर सभी ने अपने ईमान तक को बेच दिया, अगर बेचा न होता तो भ्रष्टाचार होते न देखते। जिस अस्पताल के सीएमएस, डाक्टर्स, फार्मासिस्ट और बाबू का जमीर मर और बिक चुका हो, उस अस्पताल के लोगों को तो चुल्ली भर पानी में डूब मरना चाहिए। जो लोग गरीब मरीजों के इलाज और आपरेशन के नाम पर अपनी जेबें भरते हो, उस अस्पताल के लोगों से अच्छा तो वे लोग हैं, जो भीख मागंकर अपना पेट भरते, कमसे कम यह लोग चोरी और बेईमानी तो नहीं करते। देखा जाए तो इन लोगों की हालत भिखारियों से भी बततर हो गई।

 

जिला महिला अस्पताल और हर्रैया महिला अस्पताल के भ्रष्टाचार का मामला सोमवार को कमिश्नर साहब के पास मीडिया की ओर से पहुंचा, उन्हें बताया गया कि किस तरह दोनों अस्पतालों के सीएमएस, फार्मासिस्ट मिलकर सरकारी पीओ सिटी लैब रहते हुए प्राइवेट पीओसीएल लैब का संचालन नियम विरुद्व करवा रहे हैं, प्राइवेट लैब जो आन लाइन न तो मरीजों का पंजीकरण करती है, और न मरीजों को कंप्यूटराइज्ड रिपोर्ट ही देती है। फिर भी इस प्राइवेट लैब से रिजेंट खरीद के नाम पर दो करोड़ महिला जिला अस्पताल और 89 लाख 100 बेड एमजीएच हर्रैया में भुगतान किया। जब कि सरकारी लैब को हर्रैया में दस लाख और बस्ती में 35 लाख किया गया। यह भी बताया गया कि सरकारी लैब सिर्फ रिजेंट का पैसा लेती हैं, लेकिन प्राइवेट से जांच पेपर से लेकर रिजेंट और काटेज तक खरीदा जा रहा है, जबकि यह सब सरकारी लैब फ्री दे रही है। यह भी बताया गया कि महिला जिला अस्पताल में सरकारी पीओ सिटी लैब में पिछले 8-10 दिन से रिजेंट नहीं हैं, और न खरीदा जा रहा। यह भी बताया गया कि जिला महिला अस्पताल में 2016 से 2024 के बीच किसी साल 25 तो कभी 35 लाख का रिजेंट सरकारी लैब से खरीदा गया, जब कि प्राइवेट पीओसीएल लैब से एक साल में दो करोड़ का रिजेंट खरीदा और भुगतान किया। यह भी बताया कि जो रिजेंट डीजी हेल्थ के पोर्टल से आन लाइन खरीद करनी चाहिए, उसे यह लोग जेम पोर्टल से अपने चहेते ठेकेदार से मंहगें दामों पर खरीद रहे हैं, डीजी हेल्थ पोर्टल पर इसी लिए बजट दिया जाता ताकि इसी पोर्टल के जरिए खरीद हो, और उसे खारिज किया जा सके। जबतक बजट नहीं चढ़ेगा तब तक आर्डर नहीं बनेगा। यहां पर भी दोनों सीएमएस की ओर से अधिक कमीशन के लिए दो व्यवस्था बनाया गया। डीजी हेल्थ का स्पष्ट निर्देश हैं, कि अगर किसी कारणवश आफलाइन खरीदने की आवष्यकता पड़ती है, तो उसी रेट में खरीदा जाए, जिसे डीजी हेल्थ ने आन लाइन किया, लेकिन दोनों सीएमएस ने कमीशन के चक्कर में जेम पोर्टल पर अपने ही तीन लोगों को बिड में षामिल कर दिया, और जिसे टेंडर देना होता है, उसी का बिलो डाल दिया, जब कि बिलो रेट भी डीजी हेल्थ के रेट से अधिक होता है। कहा गया कि दोनों सीएमएस डायरेक्ट खरीद कर रहे है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि दोनों सीएमएस को पीओसीएल लैब, क्यों इतना प्यारा और दुलारा हैं, जो जांच रिपोर्ट आफलाइन देती और जिसका पंजीकरण भी आफलाइन होता, जिसका कोई रिकार्ड नहीं रहता, जब चाहों जांच रिपोर्ट बदल दो, इनकी रिपोर्ट मरीज के मोबाइल पर नहीं जाती, वही यह दोनों सीएमएस उस पीओसिटी को कोई भाव नहीं देते जो पेपर भी फ्री देती है, आन लाइन पंजीकरण करती है, और मरीज के मोबाइल पर आनलाइन रिपोर्ट भी भेजती है। इससे साफ पता चलता है, कि प्राइवेट पीओसीएल लैब को इस लिए अनैतिक रुप से करोड़ों का भुगतान किया, ताकि अधिक से अधिक कमीशन मिल सके। सोमवार को सीडीओ ने हर्रैया अस्पताल का जांच भी किया। अनेक कमियां पाई गई, मरीजों ने जमकर शिकायत किया। दोनों लैब भी देखा। दोनों अस्पतालों में लगे प्राइवेट पीओसीएल लैब का अभी तक किसी को इंचार्ज तक नहीं बनाया। बिना इंचार्ज के लैब कैसे और क्यों संचालित हो रहा?