बस्ती। अगर दुनिया की सबसे बड़ी सामाजिक सेवा के नाम से मशहूर रेडक्रास सोसायटी के सभापति का पद एक माह से खाली रहेगा, तो सवाल उठेगा ही, और सबसे अधिक सवाल उन कार्यकारिणी के सदस्यों पर उठेगा, जिन्होंने सभापति डा. प्रमोद कुमार चौधरी को उनके पद से हटाने के लिए एड़ीचोटी लगा दिया, अविष्वास प्रस्ताव तक लाए। सवाल यह उठ रहा है, कि आखिर अविष्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले सदस्यों का क्या मकसद रहा? क्या डा. प्रमोद चौधरी को पद से हटाना, या फिर सभापति का पद हासिल करना? हटाने का तो मकसद सफल हो गया, लेकिन सभापति पद हासिल करने का मकसद क्यों नहीं सफल हो रहा? आखिर क्यों नहीं सभापति पद के लिए सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी के नाम पर अभी तक सहमति बनी? अगर सहमति नहीं बननी/बनानी थी, तो फिर क्यों पप्पू सरदार को योग्य सभापति मानकर लड़ाई लड़ते रहे? कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी और के मन में सभापति पद हासिल करने का लालच समा गया?

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब पहले सहमति बनी थी, तो अब क्यों नहीं बन रही? डा. प्रमोद चौधरी के इस्तीफा देने से पहले बागी सदस्य यह कहते रहें, कि चाहें जो हो जाए, सभापति को हटाना है, और पप्पू सरदार को सभापति की कुर्सी पर बैठाना है। हालांकि इसके लिए सभी ने मिलकर प्रयास भी किया, बस्ती से लेकर लखनउ तक दौड़ लगाई, लड़ाई भी खूब लड़ी, रोज कहीं न कहीं एक साथ मिलकर सभापति को हटाने की रणनीति बनाते रहें। अब जब कि सबकुछ रणनीति के तहत हुआ तो फिर क्यों नहीं सभापति के नाम पर सहमति बन पा रही? क्यों नहीं पहले की तरह सब लोग एक साथ मिलकर बैठते और सभापति पर निर्णय लेते? पूरा जिला जानता है, कि पप्पू सरदार और उनकी टीम का रेडक्रास सोसायटी में क्या और कितना योगदान रहा, कोरोना काल को कौन भूल सकता, जब इनकी टीम जान को जोखिम में डालकर पीड़ितों की मदद की, यहां तक कि बंदर जैसे अन्य जानवरों को भी जिंदा रखने में टीम का योगदान रहा। कहने का मतलब, लोग रेडक्रास सोसायटी का मतलब, सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी ही समझते। अब कौन सी ऐसी बात हो गई, कि सरदार कुलवेंद्र सिंह के नाम पर सहमति नहीं बन पा रही है? और क्यों नहीं वे लोग आगे आते, जो लोग सरदार पप्पू के योगदान की सराहना करते हुए नहीं थकते थे? इससे यह साफ हो गया, कि रेडक्रास सोसायटी में पारदर्शीत लाना मकसद नहीं बल्कि डा. प्रमोद चौधरी को ऐनेकेन प्रकरण पद से हटाना था। सवाल उठ रहा है, कि अब जब कि डा. प्रमोद चौधरी को हटाने का मकसद पूरा हो गया तो विलंब क्यों? अब कौन सा मकसद पूरा होना बारी रह गया? आखिर क्यों नहीं सभापति पर किसी के नाम पर सहमति बन पा रही है? वैसे समय अनुसार बहुत कुछ बदल गया, जो पहले साथ में थे, अब वे आपस में बात तक नहीं करते, जो पहले सरदार पप्पू को सभापति बनाने के लिए जीजान लगा रहे थे, अब वह लोग सन्न मारे पड़े है। एक व्यक्ति को इस लिए सदस्य बनाया गया, ताकि वह सभापति बनाने में सहयोग करेगें, लेकिन अब वे खुद सभापति के लिए दावा ठोंक रहे है। देखा जाए तो इतने कम समय में बहुत कुछ बदल गया, लोग बदल गए, उनकी निष्ठाएं बदल गई, समर्पण की भावना समाप्त हो गई। यह भी सही है, कि डा. प्रमोद चौधरी के साथ में जो लोग पहले खड़े थे, वे आज भी खड़े हैं, लेकिन यही बात पप्पू सरदार के बारे में नहीं कही जा सकती। अब इनके लिए किसी के पास समय तक नहीं रहा। लिखित में देने के बाद भी डीएम की ओर से अभी तक कार्यकारिणी की बैठक नहीं बुलाई गई, और न वे लोग डीएम के पास एक साथ गए, जो अविष्वास प्रस्ताव के समय गए थे। एक घटना ने अपनों को पराया कर दिया। कहना गलत नहीं होगा, कि न पहले जैसी दोस्ती रही और न पहले जैसे दोस्त रहे। अगर इसी तरह चलता रहा तो यह रेडक्रास सोसायटी के इतिहास में लिखा जाएगा, कि बस्ती का रेडक्रास सोसायटी, बिना सभापति के कार्यकाल पूरा कर लिया। इस लिए यह सभी कि जिम्मेदारी है, कि रेडक्रास सोसायटी को इतिहास बनने से बचाए। अगर कहीं इतिहास बन गया तो इतिहास उन लोगों को कभी भी माफ नहीं करेगा, जो इसमें शामिल रहे। किसी को भी सभापति बनाए, लेकिन रेडक्रास सोसायटी को सभापति विहीन होने से बचाए। किसी को भी सभापति बनाइए, लेकिन योग्य को ही बनाइए।