बस्ती। जो लोग अभी भी जिला पंचायत अध्यक्ष को अध्यक्ष और प्रमुखों को प्रमुख मान रहे हैं, उन लोगों को बताना चाहता हूं, कि अध्यक्षी और प्रमुखी का रुतबा उसी समय दोनों का समाप्त हो गया, जब सरकार ने इन्हें प्रशासक बनाया, वह तो भला हो ओमप्रकाश राजभर का जिन्होंने इनकी इज्जत बचा ली और प्रशासक बना दिया, वरना वाकई यह लोग पैदल हो गए होते, निवर्तमान होकर रह जाते। तब इन्हें सरकारी बंगला और लक्जरी कार दोनों को छोड़ना पड़ता। यह लोग अभी भी जनता और सरकार को बेवकूफ बना रहे हैं, और अपने वाहनों पर अध्यक्ष और प्रमुख का स्टीकर लगाकर घूम रहे है। जब कि नियमानुसार इन्हंें अपने वाहनों पर पहले प्रशासक/निर्वतमान जिला पंचायत अध्यक्ष या निवर्तमान प्रमुख लिखाकर चलना चाहिए। ऐसा लगता है, कि यह दोनों अभी भी अध्यक्षजी और प्रमुखी का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं, इन्हें प्रषासक कहलाना अच्छा नहीं लगता, बल्कि शर्म आती है। अध्यक्षी और प्रमुखी चली गई, लेकिन स्टीकर का मोह नहीं गया। अभी तक यह निर्णय नहीं हो पाया, कि इन्हें मानदेय भी मिलेगा या नहीं, लेकिन सरकार ने इनके कार्य और दायित्व दोनों का निर्धारण कर दिया, सब कुछ जानते हुए भी अगर कोई अपने आप को प्रशासक नहीं बल्कि अध्यक्ष और प्रमुख ही मान रहा है, तो इसे अनुशासनहीनता ही माना जाएगा।
प्रशासक के रुप में इन्हें सिर्फ रुटीन के कार्यो का ही निष्पादन करना होगा, पुराने कार्यो का पूरा करवाएगें और कोई भी नए कार्य का न तो प्रस्ताव लेगें और न ही उसकी स्वीकृति ही देगें, न टेंडर निकालेगें और न कोई भुगतान ही कर करेगें, बोर्ड की बैठक और क्षेत्र पंचायत के बैठक का न तो आयोजन करेगें और न बैठकों का संचालन ही कर पाएगें। किसी के खिलाफ कोई प्रशासनिक कार्रवाई भी नहीं कर पाएगें। जो भी कार्य होगें वे सभी डीएम के माध्यम से होगें। जो लोग बहाल होने का प्रचार कर अपने और अन्य जनपदों में अपना स्वागत करवा रहे हैं, उससे लगता है, कि मानो सरकार ने इन्हें फिर से जिला पंचायत अध्यक्ष बना दिया। स्टीकर लगाकर कोई अध्यक्ष और प्रमुख नहीं बन जाता। प्रशासक बनने का मतलब जिला पंचायत अध्यक्ष या प्रमुख बनना नहीं। जनता को बेवकूफ मत बनाइए, जो हैं, वही रहिए, और जितना जल्दी हो सके अपने वाहनों पर से जिला पंचायत अध्यक्ष और प्रमुख के स्टीकर के स्थान पर प्रशासक/निवर्तमान का स्टीकर लगाना शुरु कर दीजिए। बोलचाल की भाषा में आप अध्यक्ष और प्रमुख ही कहलाएगें। रही बात लूटपाट करने की तो उसके दिन लद गए, अब जब कभी प्रमुख या जिला पंचायत अध्यक्ष बनिएगा तो जितना चाहें उतना लूटिएगा, फिलहाल आप लोगों के लूट पर लगाम लग चुका है। पुराने कार्यो में चाहें जितना लूटपाट करिए, ठीक उसी तरह लूटपाट करिए जिस तरह प्रशासक के रुप में प्रधान कर रहे हैं। जिले और जिले वासियों का यह दुभार्ग्य रहा कि उसे कोई ऐसा प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष नहीं मिला, जिसने ब्लॉक और जिला को चमका दिया हो, लगभग सभी ने किसी ने कम तो किसी ने अधिक लूटपाट किया। इसी लूटपाट का नतीजा रहा कि एक जिला पंचायत, 14 क्षेत्र पंचायत और 1182 ग्राम पंचायत में से एक भी आइडिएल नहीं बन पाया, जब कि सरकार ने इन पांच सालों में सिर्फ मनरेगा में 22 अरब, जिला पंचायत में लगभग 250 करोड़, क्षेत्र पंचायतों में लगभग एक अरब और ग्राम निधि में लगभग पांच अरब यानि जिले में पिछले पांच सालों में लगभग 27 अरब रुपया गांव के विकास के नाम पर खर्च हो गया, और उसके बाद भी विकास कार्य अधूरा रह गया, सवाल उठ रहा है, कि आखिर इतना धन किसकी जेबों में गया है? है, को कोई हिसाब किताब देना वाला? कहां खर्च हा गया? अगर खर्च हुआ तो फिर गांव क्यों बदहाल है? इन सवालों का जबाव जिसे देना था, वह निर्वतमान हो गए। अब प्रशासक का कोई मतलब ही नहीं रहा। प्रदेष को भ्रष्टाचार की आग में झोंकने वाले पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर को प्रदेश की जनता कभी माफ नहीं करेगी, इसका खामियाजा 2027 में भाजपा को ही भुगतना पड़ेगा। जो मंत्री समय से चुनाव न करवा सके, और डीएम को प्रशासक बनाने के बजाए जिला पंचायत अध्यक्ष और प्रमुखों को नियम विरुद्व प्रशासक बनाने का प्रस्ताव दे, उस मंत्री से क्या उम्मीद की जाए, जो निजी लाभ के लिए तीनों पंचायतों को लूटने का केंद्र बना दिया। अब अध्यक्ष और प्रमुखों का चेंबर बैठकी बनकर रह जाएगा। अनेक प्रमुख फेसबुक पर अभी भी अपने आपको प्रमुख ही लिख और बता रहे है, जब कि प्रमुखी गए, लगभग आठ दिन हो गए।
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