बस्ती। जिले में एक सांसद और तीन विधायक होते हुए भी विपक्ष को इस लिए कमजोर माना जा रहा है, क्यों कि भाजपा की तरह सपा में भी एक दूसरे को पटकनी देने की होड़ लगी हुई है। जनता ने तो विपक्ष को पक्ष से अधिक मजबूत बनाया, लेकिन अगर विपक्ष ही मजबूत नहीं होना चाहेगा तो इसमें जनता का क्या दोष? इसी लिए कहा जा रहा है, सिर्फ हाथ मिलाने या फिर मंच पर एक साथ फोटो खिचाने और माला पहन लेने से दिल नहीं मिलता, दिल तो तभी मिलेगा जब एक दूसरे के लिए धड़केगा है, जब तक एक दूसरे के लिए कुछ करने का जज्बा नहीं होगा, तब तक दिल मिले या न मिले कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी लिए कहा जाता है, कि जब तक दिल नहीं मिलेगा, तब तक दल मजबूत नहीं होगा। दिल का मिलना जरुरी हैं, ताकि दल मजबूत हो सके, अगर दल कमजोर होगा तो उसके नेता भी कमजोर होगें, और जब दल मजबूत होगा तो नेता भी मजबूत होगें। सवाल उठ रहा है, कि इतना मजबूत होने के बाद भी विपक्ष क्यों इतना कमजोर और बटा-बटा सा नजर आ रहा है? आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं? वे लोग जिम्मेदार हैं, जो चुनाव तो जीतते हैं, साइकिल पर चढ़कर लेकिन उनका मन हाथी पर सवारी करने को करता है। अगर देखा जाए तो सिर्फ महेंद्रनाथ यादव ही खाटी सपाई हैं, जो छात्र राजनीति से एक ही दल और एक ही विचारधारा से जुड़े रहें, यही कारण है, कि इनकी गिनती पार्टी के सबसे अधिक वफादार कार्यकर्त्ता के रुप में होती है। रही बात सांसद और अन्य विधायकों की वे चारों धाम की यात्रा कर चुके है। एक विधायक जो उनके वारिष है, बाकी इन्हीं के पीछे दो-तीन धाम की यात्रा पूरी कर चुके है। यही कारण है, कि सपाई बटा-बटा सा नजर आ रहा है, और इसका प्रभाव 2027 पर पड़ सकता है। इस बात का एहसास सपा के मुखिया को भी है। सपा के मुखिया को एहसास होगा कि बस्ती में सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है, खिचड़ी पक रही है। क्यों कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो पार्टी को कमजोर करके खुद को मजबूत करना चाहते है। यह वही लोग जिनकी विचारधारा पार्टी से अलग है। इनमें कुछ ऐसे लोग भी है, जो कपड़े की तरह झंडा बदलते रहते है। कहा भी जाता है, जो सपाई के नर्सरी से नहीं निकला, उसकी जड़े कैसे पार्टी में मजबूत होगी। इस लिए नर्सरी से निकलना आवष्यक हैं, ताकि जड़े मजबूत हो सके। पिछले कई सालों से देखा जा रहा है, कि जब लड़ाई लड़ने की बारी आती है, तो महेंद्रनाथ यादव को आगे कर दिया जाता है, और जब मलाई खाने की बारी आती है, तो चारों धाम के यात्री सामने आ जाते है। यह ऐसे लोग होते हैं, न तो इनकी कोई विचारधारा होती है, और न तो इनकी निष्ठा दल के प्रति होती है।