बस्ती। जिस तरह शिक्षा व्यवसाय बनता जा रहा हैं, और इससे जुड़े लोग कुछ ही सालों में करोड़पति बन जा रहे हैं, उससे शिक्षा का तो अपमान हो ही रहा है, शिक्षा का स्तर भी गिरता जा रहा। एक अमीर व्यक्ति तो कान्वेंट स्कूल के मार को तो झेल सकता है, लेकिन गरीब नहीं है। इसके लिए नेपाल जैसा फारमूला अपनाना चाहिए, ताकि सभी के बच्चे सरकारी स्कूलों में एक साथ और एक समान शिक्षा प्राप्त कर सके। नेपाल दुनिया का पीला ऐसा देश होगा, जिसने प्राइवेट स्कूलों को बंद करने का निर्णय लिया। नेपाल के पीएम के इस साहसिक निर्णय की पूरी दुनिया में सराहा जा रहा है। भारत जैसे गरीब देश में नेपाल जैसी शिक्षा की व्यवस्था अतिआवष्यक है। तभी शिक्षा का स्तर उंचा होगा, और गरीब बच्चें पढ़ सकगें।
देश में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। एक समय था जब शिक्षा को सेवा और समाज निर्माण का माध्यम माना जाता था, लेकिन अब कई जगहों पर यह एक बड़े व्यवसाय के रूप में उभरती दिख रही है। खासकर प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती संख्या और उनकी मनमानी फीस ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। अभिभावकों का आरोप है कि निजी स्कूलों में एडमिशन के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती है। इसके अलावा हर साल फीस में बढ़ोतरी, महंगी किताबें, यूनिफॉर्म और अन्य शुल्क मिलाकर शिक्षा का खर्च आम परिवार की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। कई मामलों में स्कूल प्रबंधन द्वारा निर्धारित दुकानों से ही किताबें और ड्रेस खरीदने का दबाव भी बनाया जाता है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों का बौद्धिक और नैतिक विकास होना चाहिए, लेकिन जब यह पूरी तरह मुनाफे पर आधारित हो जाए, तो गुणवत्ता प्रभावित होती है। बाहरी सुविधाओं और दिखावे पर जोर देकर कई स्कूल वास्तविक शिक्षण गुणवत्ता से ध्यान भटका देते हैं। सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिए विभिन्न नियम और कानून बनाए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका पालन अक्सर अधूरा नजर आता है। अभिभावकों की मांग है कि फीस नियंत्रण के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए और स्कूलों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाई जाए। वहीं कुछ निजी स्कूल यह तर्क देते हैं कि बेहतर सुविधाएं और योग्य शिक्षकों को बनाए रखने के लिए खर्च बढ़ता है, इसलिए फीस भी उसी अनुसार तय की जाती है। हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह बढ़ोतरी उचित और पारदर्शी है? शिक्षा को व्यवसाय बनने से रोकना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा के क्षेत्र में संतुलन कायम किया जाए, ताकि हर वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा मिल सके।
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