बस्ती। बहुत दिनों बाद डीएफओ, एसडीओ, और रेंजर भ्रष्टाचार की चपेट में आएं, इसके लिए एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह तो बधाई के पात्र है, ही वे भी हैं, जो विभाग में रह कर भ्रष्टाचार का विरोध करते है, अगर विरोध न करते तो इतना बड़ा भ्रष्टाचार के रैकेट का खुलासा न होता। जो भी सुनकर और देख रहा है, सभी कह रहे हैं, महिला डीएफओ और महिला रेंजर होकर भी इतना बड़ा घोटाला कर दिया, यह भी सवाल उठ रहा है, कि क्या यह महिलाएं हराम की कमाई से अपने बच्चों को पढ़ाएगी या फिर उन्हें भोजन कराएगी, डीएफओ मैडम, आप के कुरान में लिखा हैं, कि जो हराम का खाएगा, वह नर्क में जाएगा, तो क्या आप और आप का परिवार नर्क में जाना पसंद करेगीं? बात कड़वी जरुर हैं, लेकिन आप जैसी महिला अधिकारी को यह एहसास कराना भी जरुरी है। बहरहाल, दो दिन बाद मुख्यमंत्री का दौरा हर्रैया में प्र्रस्तावित हैं, अगर यह मामला योगीजी के समक्ष उठ गया तो मैडम, तब आप के खुदा भी नहीं बचा पाएगें। इसे लेकर भाकियू भानु गुट के मंडल प्रवक्ता चंद्रेश प्रताप सिंह ने प्रमुख सचिव,’ ’वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग,’ ’उत्तर प्रदेश शासन लखनऊ और निदेशक,’ ’सतर्कता अधिष्ठान, उ0प्र0, लखनऊ और बस्ती के डीएम को साक्ष्य के साथ भेजकर उनसे सरकारी धन को लूटने वाली डीएफओ डा. सीरीन सिद्वीकी, रेंजर सोनल वर्मा और एसडीओ देवेंद्र प्रताप सिंह को तत्काल निलंबित करने और चल अचल संपत्ति को जप्त और रिकवरी करने की मांग की है।
कहा कि इन तीनों ने मिलकर सिर्फ रामनगर रेंज में एक-एक व्यक्ति के नाम पर सात-सात फर्जी बिल बनाकर 50 लाख से अधिक की जूट की। उक्त प्रकरण तमाम संभ्रांत नागरिकों दिशा निगरानी समिति की बैठक में उठे वन विभाग बस्ती में हुए संगठित भ्रष्टाचार का अत्यंत गंभीर मामला संज्ञान में आया है, जो मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस नीति पर सीधा प्रहार है।
’घोटाले के बारे में बताया गया कि पौधों की सुरक्षा, पौधशाला में मिट्टी पाटन, लोडिंग-अनलोडिंग के नाम पर फर्जी बिल बनाए गए, जबकि इसका कोई बजट ही नहीं था। ’एक-एक व्यक्ति के नाम 7-7 फर्जी बिल’ बनाए गए। जैसे - दिव्यांशु यादव पुत्र काशीराम के नाम 13682, 13376, 18682, 18582, 18682, 11632 रुपये। रामसुब्बा पुत्र तुलसीराम के नाम 19035, 19035, 6697, 11985, 19035 रुपये। देवेंद्र कुमार पुत्र लाल बिहारी के नाम 18682, 10575, 14452, 18682, 18682 रुपये। ’कथित रेंजर क्लर्क’ ने वन रक्षक व वन दरोगा के नाम लगाकर कुल 50 लाख से अधिक’ का फर्जी दस्तावेज तैयार किया। ’साक्ष्य मिटाने का प्रयास और फर्जी बिलों का विरोध हुआ तो दोषी रेंजर क्लर्क का तबादला रामनगर रेंज से मुख्यालय कर दिया गया, जबकि वह अब भी रामनगर में पहले की तरह काम कर रहा है।
क्हा कि अगर 15 दिवस में ठोस कार्यवाही नहीं हुई तो विवश होकर माननीय उच्च न्यायालय में एवं लोकायुक्त में परिवाद दाखिल करना पड़ेगा। जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी वन विभाग की होगी। एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब रामनगर के प्रमुख को भ्रष्टाचार की जानकारी थी तो वह क्यों अब तक खामोष रहे, और क्यों नहीं इस मामले को ‘दिषा’ की बैठक में उठाया, और क्यों यह श्रेय हरीश सिंह को दिया?
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