बस्ती। सीएमओ कार्यालय के प्रेम बहादुर सिंह के माता-पिता ने इनका नाम यह सोचकर रखा होगा, कि उनका बेटा एक दिन ईमानदारी में खूब नाम रोशन करेगा, विभाग से ईमानदारी में मेडल प्राप्त करेगा, बहादुर बनेगा, गरीबों और मजलूमों की मदद करेगा, दुख-सुख में काम आएगा, बिना घूस लिए काम करेगा, सभी से प्रेम करेगा, लेकिन इनके माता-पिता को क्या मालूम था, उनका बेटा एक दिन ईमानदारी में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार में नाम रोशन करेगा। बिना घूस लिए कोई काम नहीं करेगा। सवाल उठ रहा है, कि क्या कोई मां-बाप यह कल्पना कर सकता है, कि उसका बेटा भ्रष्टाचारी बने, और बिना घूस के कोई काम न करें, और भ्रष्टाचार में रिकार्ड कायम करें, कोई भी अभिभावक, प्रेमबहादुर सिंह जैसे लोगों का मां-बाप कहलाना और बनना पसंद नहीं करेगें। अगर तत्कालीन डीएम, ईमानदारी दिखाए होते तो लाखों रुपये के गबन के आरोप में यह तत्कालीन सीएमओ डा. चंद्रशेखर के साथ तीन साल पहले जेल में होते, तत्कालीन सीआरओ नीता यादव ने जब आयूष कांस्टकशन की शिकायत पर जांच किया तो एक करोड़ 49 लाख के फर्जी आर्डर और भुगतान करने का मामले पकड़ा, जिसके लिए तत्कालीन सीएमओ डा. चंद्रशेखर और प्रेमबहादुर सिंह को दोषी करार देते हुए विधिक और प्रशासनिक कार्रवाई करने की संस्तुति की थी, इस मामले में 65 लाख के गबन का मामला सामने आया, लेकिन जब यह मामला तत्कालीन डीएम के पास कार्रवाई के लिए पहुंचा तो कार्रवाई करने के बजाए सौदा हो गया, और जांच रिपोर्ट को रददी की टोकरी में डाल दिया गया। हालांकि तत्कालीन सीएमओ डा. आरएस दूबे ने प्रेमबहादुर सिंह से स्पष्टीकरण भी मांगा।

सवाल उठ रहा है, कि जब अनुबंध आयूष कांस्टक्षन के मनोज कुमार के नाम सिविल कार्य का था तो कैसे और क्यों उस कार्य को कोटेशन के आधार पर दिवाकर कांस्टक्षन, रोज इंटरप्राइजेज, एलाइड इंटरप्राइजेज जैसे अन्य फर्म को 10-10 लाख के आर्डर के जरिए कार्य और भुगतान कर दिया, जबकि टेंडर, आयूष कांस्टक्षन के नाम था, बताते हैं, एक करोड़ 49 लाख में से लाख दो लाख का भी कार्य नहीं हुआ होगा, एक-एक कमरे को पांच-पांच बार मरम्मत और निर्माण करवाया गया, यह फर्जीवाड़ा जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, टीबी एवं सीएमओ के यहां किया गया, जिस ठेकेदार के नाम अनुबंध था, वह देखता रह गया, और जिसके नाम अनुबंध नहीं था, उसे फर्जी आर्डर पर आर्डर दिए गए, जिस ठेकेदार का पंजीकरण ही नहीं, हैसियत और चरित्र प्रमाण नहीं, पंजीकरण तक नहीं, उसे मालामाल कर दिया, और जिसके नाम अनुबंध हैं, उसे भिखारी बना दिया। इस पूरे मामले में एक करोड़ से अधिक का बंदरबांट हुआ, लगभग 30 लाख के जीएसटी और आईटी की चोरी की गई, इस चोरी को तत्कालीन सीएमओ और प्रेमबहादुर सिंह एवं ठेकेदारों ने मिलकर किया। जैसे ही  इतने बड़े घोटाले का पता तत्कालीन सीएमओ डा. चंद्रशेखर को चला तो वह बिना चार्ज दिए जिले से फरार हो गए। इसी लिए कहा जाता है, कि अगर डीएम की ओर से एफआईआर दर्ज करवा दिया जाता तो तत्कालीन सीएमओ डा. चंद्रशेखर और प्रेमबहादुर सिंह को जेल जाना पड़ता। जेल जाने से बचने के लिए ही सौदा हुआ। ठेकेदारों के हिस्से में 60 लाख से अधिक आया। यह पहला मामला नहीं जब अनुबंध किसी और ठेकेदार के नाम और काम किसी और को दिया गया, इससे पहले मां लक्ष्मी टेडिगं के घनष्याम मिश्र के साथ वहीं हुआ जो आयूष कांस्टक्षन के मनोज कुमार के साथ हुआ। खासबात यह है, कि यह फर्जीवाड़ा पिछले 2021 से चल रहा है, षिकायतंे होती, जांच होता, जांच में गबन पाया जाता, लेकिन जब कार्रवाई की बारी आती है, तो सौदा हो जाता, सौदा किसी छोटे मोटे अधिकारी स्तर से नहीं बल्कि जिले के सबसे अधिकारी स्तर से होता, इस पूरे मामले में वह ठेकेदार ठगा जाता है, जिसके नाम अनुबंध होता, और जिसके नाम अनुबंध नहीं होता, उसे प्रेमबहादुर सिंह जैसे लोग अमीर बना देते है। जीएसटी की चोरी करना/करवाना सबसे बड़ा अपराध माना जाता है, लेकिन सौदा करने वाले अधिकारियों को जब चढ़ावा मिल जाता है, तो उसे भी अनदेखी कर देते है। यही कारण है, कि प्रेम बहादुर सिंह और फर्जी ठेकेदारों का मनोबल बढ़ता जा रहा है।