-सीओ सदर की जांच रिपोर्ट में उन आधा दर्जन से अधिक होटलर्स का नाम दिया गया, जो पंजीकृत ही नहीं और जहां पर अनैतिक कार्य होता, इनमें रोडवेज और पटेल चौराहा के भाजपा नेताओं का होटल भी शामिल

-पुलिस का कहना है, कि हमने तो जांच करके रिपोर्ट प्रशासन को दे दिया, कार्रवाई करना या न करना प्रशासन का काम, कार्रवाई के मामले में प्रशासन अगर सहयोग मांगता तो दिया जाएगा

-इस तरह की अधिकांश जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का खुलासा नहीं हो पाता, आम जनता को पता ही नहीं चल पाता, कि उसे परिवार सहित किस होटल में जाना चाहिए और किसमें नहीं?

-प्रशासन इससे पहले भी सराय एक्ट के तहत अंपजीकृत होटल के प्रोपराइटर को कई बार नोटिस थमा चुका, नोटिस थमाने की जानकारी तो सभी को हो जाती, लेकिन कितनों ने पंजीकृत करवाया, और कितनों ने नहीं, और जिन्होंने नहीं करवाया, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, पता नहीं चलता

बस्ती। जिन होटलों का नाम अनैतिक कार्य में लिप्त होते पुलिस को मिला, उनमें आज से नहीं बल्कि सालों से गैर कानूनी और अनैतिक कार्य होना पाया गया। इसकी पुष्टि सीओ की जांच रिपोर्ट से भी होने का दावा किया जा रहा है। सवाल उठ रहा है, अगर इन होटलों में सालों से गैर कानूनी कार्य हो रहें हैं, तो अभी तक प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और कार्रवाई न होने का जिम्मेदार कौन? कार्रवाई करना तो दूर की बात, इतने सालों में प्रशासन इन होटलों को सराय एक्ट के तहत न तो पंजीकृत करा पाया, और न होटलों के नामों का खुलासा ही किया। रोडवेज स्थित जो होटल जहां पर सालों से अनैतिक कार्य होते पुलिस को मिला, वह होटल वीआईपी कहे जाने वाले भाजपा के नेता का है। जांच रिपोर्ट में सबसे अधिक इसी होटल को बदनाम बताया गया। उसके बाद पटेल चौराहा स्थित एक अन्य भाजपा नेता के होटल का नाम शामिल है। पुलिस का कहना है, कि हमने तो जांच करके रिपोर्ट प्रशासन को दे दिया, कार्रवाई करना या न करना प्रशासन का काम, कार्रवाई के मामले में प्रषासन अगर सहयोग मांगता तो दिया जाएगा, वैसे एक अधिकारी ने होली बाद बड़ी कार्रवाई करने की बात कही है। अक्सर देखा गया है, कि इस तरह की अधिकांश जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का खुलासा नहीं हो पाता, ऐसा लगता कि मानो प्रशासन ऐसे होटलों के खिलाफ कार्रवाई करने से बचता/डरता है। वरना, बदनाम होटल के मालिक, प्रशासन को अनैतिक कार्य करके न चिढ़ाते। सबसे बड़ी बिंडबना यह है, कि आम जनता को यह पता ही नहीं चल पाता, कि उसे परिवार सहित किस होटल में जाना चाहिए और किसमें नहीं? कहा भी जाता है, कि ऐसी जांच रिपोर्ट का क्या मतलब? जिसके कार्रवाई की जानकारी मीडिया और जनता को न हो।  

जाहिर सी बात है, कि यूंही नहीं जांच रिपोर्ट को डस्टबिन में डाल दिया जाता रहा है। डस्टबिन में डालने वाली अब तक कि जांच रिपोर्ट के बारे में कहा जाता है, कि जो जांच रिपोर्ट डस्टबिन में डाली जाती है, वह होटल मालिकों और भाजपा के नेताओं के प्रभाव में आकर डाली जाती। एक तरह से देखा जाए तो जीत प्रशासन की नहीं बल्कि हमेशा बदनाम होटल मालिकों की होती है। प्रशासन पिछलों दस सालों में ना जाने कितनी बार अंपजीकृत होटल मालिकों को सराय एक्ट के तहत पंजीकरण कराने के लिए नोटिस थमा चुका है, और हर नोटिस में यह चेतावनी दी जाती रही है, कि अगर निष्चित तिथि तक पंजीकरण की कार्रवाई पूरी नहीं की गई, तो होटल को सील करके एफआईआर दर्ज करवा दिया जाएगा। नोटिस का निष्चित समय भी बीत जाता, डीएम और एडीएम भी बदल जाते हैं, लेकिन न तो पंजीकरण होता और न होटल को सील ही जाता। क्लार्क इन होटल को तब सील किया गया, जब उसके कुछ हिस्से में अनजान कारणों से आग लग गयी, प्रशासन को लगा कि अगर उसने कार्रवाई नहीं की तो जबाव देना पड़ेगा। मीडिया, हर आने वाले डीएम को यह आगाह करती आ रही है, कि अगर कहीं अंपजीकृत होटल और मैरिज हाल में आगजनी की घटना मेरठ की तरह हो गई, और कोई कैजुअल्टी हो गई, तो सारी जबावदेही प्रशासन की होगी। एक-दो डीएम ने इसे संज्ञान में लिया भी, लेकिन उनकी भी कार्रवाई नोटिस जारी करने तक ही रही। सारी कार्रवाईयां एडीएम कार्यालय में दफन हो जाती है। आम लोगों और मीडिया का कहना हैं, कि कार्रवाई भले ही न कीजिए, लेकिन उन होटलों के नामों का तो खुलासा कीजिए, जहां पर अनैतिक कार्य होतें हैं, ताकि सभ्य परिवार के लोग उस होटल में न जा सके। मालवीय रोड स्थित एक नामचीन होटल में हो रहे अनैतिक कार्यो का खुलासा बस्ती की उस महिला ने न्यायालय में किया, जहां पर मुंबई का एक विधायक उसके साथ रगंरेलियां मनाने मुंबई से बस्ती आता था, मीडिया के दबाव में पुलिस ने रिपोर्ट भी विधायक, उसकी पत्नी और सहयोगी भाई के खिलाफ दर्ज किया, लेकिन जब महिला को यह पता चला कि पुलिस चार्जशीट लगाने के बजाए एफआर लगा दिया तो उसकी न्याय मिलने की सारी उम्मीद समाप्त हो गई, पुलिस अगर अपना काम ईमानदारी से करती तो आज वह नामी होटल सील होता। इस लिए बार-बार कहा जाता है, कि अभाव ईमानदारी से काम करने का है।