बस्ती। गवर्नमेंट पालिटेक्निक गाजियाबाद से ‘हरिओम गुप्त’ और ‘अनिल कुमार त्यागी’ नामक दो व्यक्ति 1988 में एक साथ पास होकर निकलते हैं, इत्तफाक से दोनों की नौकरी एक साथ विकास प्राधिकरण में जेई के रुप में लगती है। यह भी इत्तफाक रहा है, कि दोनों की मुलाकात बीडीए में होती। एक ने ईमानदारी के रास्ते पर चलकर खूब नाम और इज्जत कमाया, और दूसरा जो पढ़ाई में कमजोर और पीछे था, वह भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलकर नाम ही नहीं बल्कि खूब पैसा कमाया, जो पढ़ाई में आगे था, उसे सात साल तक इस लिए निलंबित रहना पड़ा, क्योंकि उसने बेईमानी के रास्ते पर चलने से इंकार कर दिया था, चाहता तो यह सात हजार देकर बहाल हो जाते, लेकिन ठहरे ईमानदार, सात साल तक निलंबित रहना पसंद किया, लेकिन सात हजार बाबू को देना पसंद नहीं किया। इनकी ईमानदारी की सबसे अधिक सजा बस्ती में मिली, इन्हें एक बार नहीं दो बार नहीं, तीन-तीन बार मारापीटा गया, भवन स्वामियों से मरवाया, कार्यालय के लोग भी मारे मोबाइल तक छीन लिया, इन्हें हर संभव बस्ती से बिदा करने का प्रयास किया गया, एक गैस एजेंसी के गोदाम के निर्माण में तो तत्कालीन बीडीए के सचिव कमलेशचंद्र की ओर से इन्हें चार्जशीट तक दिया गया, फर्जी आरोप लगाए गए, लेकिन जब इसकी जांच षासन स्तर पर हुई तो खुद बीडीए के सचिव दोषी पाए गए, वह तो अधिकारी होने का लाभ इन्हें मिल गया, वरना, इनके खिलाफ कार्रवाई करने की संस्तुति की गई। इस ईमानदार अधिकारी का साथ किसी ने भी नहीं दिया, न तो भवन स्वामियों ने, न तो अधिकारियों ने, न तो नेताओं ने और न बीडीए के तीनों ईमानदार कहे जाने वाले सदस्यों ने साथ दिया, यह कब बस्ती से गए, किसी को भी पता ही नहीं चला, बिदाई तक इन्हें नहीं दी गई, और वहीं पर जब भ्रष्ट एक्सईएन गए तो उन्हें न सिर्फ शानदार बिदाई दी गई, बल्कि मंहगें-मंहगें तोहफे भी दिए गए। एक ईमानदार रोता हुआ गया, और दूसरा बेईमान नोटों की अटैची लेकर गया। सच तो यह है, कि त्यागीजी न सिर्फ भ्रष्टाचारियों के रास्ते का रोड़ा बन चुके थे, बल्कि अवैध निर्माण करने वाले बड़े-बड़े भवन स्वामी के लिए खतरा भी बन चुके थे। इसी लिए बार-बार कहा जाता है, कि बीडीए में बेईमानों का स्वागत किया जाता है, और ईमानदारों को दुत्कारा और मारा जाता है। बस्ती से त्यागीजी एक ऐसा दर्द लेकर गए, जिसे वह शायद कभी न भूल पाएगें, वहीं पर ऐसे लोग भी बस्ती से गए, जिन्होंने यह कहा कि उन्होंने बीडीए से जितना पैसा कमाया उतना पूरी नौकरी में नहीं कमाया। इसी लिए बीडीए में बेईमानों की पूजा इस लिए होती है, क्यों कि वह सबकी जेबें भरतें है, और ईमानदारों को हेय की नजर से ऐसा देखा जाता है, मानो इनसे लोगों को खतरा हो। बस्ती के नेताओं ने त्यागीजी की इस लिए कोई मदद नहीं किया, क्यों कि नेताओं की भी यह नहीं सुनते थे। रही सही कसर बीडीए में काम करने वालें नेताओं के आदमियों ने पूरा कर दिया। पांडेयजी के बाद जितने भी प्रभारी एक्सईएन रहे, सभी ने बीडीए को लूटा। अब आ जाइए, पढ़ाई में पीछे और भ्रष्टाचार में आगे रहने वाले प्रभारी एक्सईएन हरिओम गुप्तजी कीे, यह भी अपने समकक्ष साथियों के नक्षेकदम पर चल रहे है। इन्हें भी ईमानदारी से नहीं बल्कि बेईमानी से प्यार है। चूंकि यह जून 27 में रिटायर हो रहे हैं, इस लिए इनका टारगेट अधिक से अधिकबीडीए के साथ -साथ खुद के लिए भी धन अर्जित करने का है। यह चाहेगें कि जितना पैसा पांडेयजी बस्ती से लेकर गए हैं, उतना तो नहीं, लेकिन उसका आधा तो लेकर ही जाएं, वैसे पांडेयजी का रिकार्ड कोई नहीं तोड़ पाएगा। इनके टारगेट में अवैध कालोनी, अवैध प्लाटिगं और अवैध निर्माण के साथ-साथ उन 100 शपथ-पत्रों पर होगा, जिसके जरिए पांडेयजी रिकार्ड बना गए। गुप्ताजी का टारगेट पूरा करने में इनके सहयोगी रात दिन लगे हुए है। बेईमानी के रास्तें पर चलने वाले जेई से प्रभारी एक्सईन हो गये, और ईमानदारी के रास्ते पर चलने वाले जेई ही रह गए। यही है, विकास प्राधिकरण का मानक। कहना गलत नहीं होगा, कि अगर बीडीए के सचिव ईमानदार होते तो बीडीए कहां से कहां पहुंच जाता। रही बात अध्यक्ष और उपाध्यक्ष की तो अगर यह लोग भी ईमानदार होते तो कभी त्यागीजी को सजा नहीं मिल पाती, बल्कि उन्हें उनकी ईमानदारी का पुरस्कार मिलता। इसी लिए बार-बार कहा जा रहा है, कि बीडीए में ईमानदारों के लिए नो वोकेंसी, और बेईमानों के वोकेंसी ही वोकेंसी। सच तो यह है, कि मीडिया ने भी बीडीए के मामले में ईमानदारी नहीं दिखाया, इसका प्रमुख कारण, कमिष्नर, डीएम और एडीएम का बीडीए का हिस्सा रहना।