बस्ती। सवाल उठ रहा है, जब चरित्रहीन व्यक्ति मंत्री, सांसद और विधायक बन सकते हैं, तो चरित्रवान क्यों नहीं बन सकतें? जिस तरह अपराधी, चरित्रहीन और भ्रष्टाचारी किस्म के लोग माननीय बनते जा रहे हैं, उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है, कि अब स्वच्छ छवि और निष्ठावान व्यक्तियों के दिन लद गए। ऐसे लोगों को सलाह दी जा रही है, कि वह जीविकोपार्जन के लिए स्टेशरी की दुकान खोल, अच्छा रहेगा, ईमानदारी और मेहनत के दो पैसे मिल जाया करेगें, ऐसे लोगों को अब माननीय बनने का सपना छोड़ देना चाहिए, क्यों कि व्यक्तित्व और चरित्रवान लोगों का स्थान चरण वंदना और परिक्रमा करने वालों ने ले लिया, राजनैतिक दलें भी अब बेदाग छवि वाले को न तो टिकट देती और न ही उन्हें किसी काम लायक ही समझती है। इनकी सारी योग्यता चरण वंदना करने वालों के सामने धरी की धरी रह जाती है। पार्टियां भी उन्हीं लोगों को टिकट देती है, जो चरण वंदना और परिक्रमा करते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो भाजपा नेता राजेंद्रनाथ तिवारी भी आज मंत्री, सांसद और विधायक होते, इनके भीतर वे सभी गुण और योग्यता है, जो ईमानदार नेता में होना चाहिए। ऐसा व्यक्ति जिसने अपनी पूरी जिंदगी आरएसएस और भाजपा की सेवा में बीता दिया हो, और उसके बाद भी अगर इन्हें सेवाओं का पुरस्कार नहीं मिलता, तो इसे तिवारीजी की नहीं बल्कि उन लोगों की गलती मानी जाएगी, जिन्होंने इनकी उपेक्षा की। कहा भी जाता है, कि अगर यह चरण वंदना और परिक्रमा करते रहते तो आज यह भी सांसद और विधायक कहलाते और मलाई काट रहे होते। इनके आर्शिवाद से न जाने कितने एमपी और एमएलए बन गए, लेकिन यह जहां 40 साल पहले खड़े थे आज भी वहीं खड़े। इनका कोई पैर नहीं छूता। यही कारण हैं, कि आज कोई तिवारीजी जैसा नेता नहीं बनना चाहता, बल्कि रामप्रसाद चौधरी, राजकिशोर सिंह और अजय सिंह जैसा बनना चाहता है। यह लोग इस मुकाम पर कैसे पहुंचे यह किसी से छिपी हुई है। आज यही लोग सफल हैं। ऐसे लोगों के पास सबकुछ हैं, लेकिन यह लोग षानदार व्यक्तित्व और बेदाग चरित्र के मालिक नहीं है। तमाम ऐसे मंत्री, सांसद और विधायक बने घूम रहे हैं, जो अपराधी प्रवृत्ति के हैं, जिनके उपर तमाम आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं, और जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। ऐसे लोगों की सबसे बड़ी खूबी यह होती है, कि इनके पास परिक्रमा और चरण वंदना करने की पीएचडी की डिग्री होती है। ऐसे लोग जिस भी दल में जाते हैं, उनका स्वागत दामाद की तरह होता हैं, वहीं पर अगर कोई स्वच्छ छवि वाला जाता है, तो उसे साइड में कर दिया जाता है।
वर्तमान की राजनीति इतनी निष्ठुर हो गई हैं, कि यहां बड़े छोटे का सम्मान समाप्त हाकता जा रहा है। व्यक्ति का व्यक्तित्व भले ही चाहें जितना बड़ा क्यों न हो, अगर वह परिक्रमा और वरण वंदना करना नहीं जानता तो उसे कोई नहीं पूछेगा। टिकट मिलना तो दूर किसी कोने में स्थान भी नहीं मिलेगा। अब नेताओं की पहचान उसके व्यक्तित्व से नहीं बल्कि परिक्रमा और चरण वंदना से होने लगी है। अगर व्यक्तित्व से सबकुछ मिल जाता तो राजेंद्रनाथ तिवारी जैसे अनेक लोगों की उपेक्षा नहीं होती। वहीं पर उन्हीं के पार्टी के कई लोगों जो न तो व्यक्तित्व के धनी है, और न चरित्रवान ही है, फिर फारचूनर और डिफेंडर जैसी महंगी गाड़ियों में घूम रहे हैं। षानदार व्यक्तित्व, चरित्रवान और विचारधारा से जुडे़ लोग जिंदगीभर तक इस लिए मंत्री, सांसद और विधायक नहीं बन पाते क्यों कि उनके पास परिक्रमा और चरण वंदना करने की पीएचडी की डिग्री नहीं होती। यह पीएचडी की डिग्री ही एक अपराधी को मंत्री, सांसद और विधायक बनाती है। परिक्रमा और वरण वंदना का सबसे अधिक समावेष भाजपा और सपा में हुआ। इसका एहसास एक दिन पहले सपा के समारोह में देखने को मिला। चरित्रवान और व्यक्तित्व के धनी बस्ती के नेता को यह एहसास करा दिया गया, कि जब तक आपके पास परिक्रमा और चरण वंदना की पीएचडी की डिग्री नहीं होगी, टिकट मिलना तो दूर मंच पर भी स्थान नहीं मिलेगा। वहीं पर कल के एक ऐसे व्यक्ति को मंच पर बैठाया गया, जिसका आपराधिक रिकार्ड भरा पड़ा है। पता नहीं क्यों नेताओं को इस बात का एहसास होता कि हम्हें उनका भी सम्मान करना है, जो व्यक्तित्व के धनी हैं, और बेदाग छवि के हैं, और जिसे क्षेत्र की जनता बहुत प्यार करती है। कहा भी जाता है, कि अगर स्वच्छ छवि वाले नेताजी ने परिक्रमा और चरण वंदना करना शुरु नहीं किया, तो उनका राजनैतिक भविष्य अंधकार मय हो सकता है।
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