बस्ती। गुजरात के कारोबारियों को दुनिया का सबसे सफल कारोबारी इस लिए माना जाता है, क्यों कि वह एक रुपया में 20 रुपया कमाना चाहते है। यानि अगर वह एक रुपया खर्चा करते हैं, तो वह चाहते हैं, कि उन्हें 20 रुपया मिले। वैसे भी दुनिया में ऐसा कोई भी ईमानदारी का कारोबार नहीं जो एक रुपया लगा कर 20 रुपया कमाया जा सकें, यह तभी हो सकता है, जब कारोबार, बेईमान और चोरी का हो, जो अपने मरीजों को इलाज के नाम पर धोखा दें। ऐसे ही एक बड़े हास्पिटल में जब जिला अस्पताल के रिटायर डाक्टर को मैनेजर बनाया गया, तो उनसे कहा गया कि उन्हें एक रुपया में 20 रुपया मुनाफा चाहिए। मैनेजर साहब ने बहुत प्रयास किया, कि हास्पिटल के मालिक को एक रुपये का 20 रुपया कमाकर दिया जा सके। डाक्टर साहब मैनेजर के रुप में लगभग पांच-छह माह रहे, लेकिन वह एक रुपया में 20 रुपया कमाकर नहीं दे पाए, इस लिए उन्हें वहां से हटना पड़ा। एक रुपया का 20 रुपया तब कमाया जा सकता है, जब डा. तारिक का फारमूला अपनाया जाए। इसी लिए कहा जाता है, कि कोई एनआईसीयू तो कोई आईसीयू में भर्ती के नाम पर एक रुपया का 20 रुपया कमा रहा है। जब बड़े-बड़े अस्पतालों में मरीज को जबरिया 15-20 दिन तक आईसीयू और एनआईसीयू में रखा जाएगा तो एक का 20 कमाया जा सकता है। जिस अस्पताल में बिना किसी बीमारी के आधा दर्जन टेस्ट करवाया जाएगा, तो उस अस्पताल में एक रुपये का 20 रुपया कमाया जा सकता है। यह उन सफेद पोश लोगों का सच हैं, जो हास्पिटल की आड़ में गरीब मरीजों को चूस रहे है। ऐसे अस्पतालों को ही खूनचुसवा कहा जाता है। इस तरह के अस्पताल में 15-20 हजार के वेतन पर कुछ बेरोजगारों को रखा गया, इन लोगों से कहा गया कि आप लोग गांव-गांव घूम-घूमकर छोला छाप डाक्टरों से संपर्क करिए, और उन्हें हमारे हास्पिटल में भेजिए, इसके लिए आप को पांच हजार प्रति मरीज मिलेगा। इसी तरह आशाबहुओं से भी अनुबंध हैं, और उन्हें भी एक केस लाने पर पांच हजार दिया जाता है। जिस अस्पताल में इस तरह का कारोबार हो उस अस्पताल का मालिक एक रुपया लगाकर बीस रुपया तो कमाएगा ही। ऐसे ही अस्पताल और अस्पताल के मालिक दिन रात तरक्की करते है। कहना गलत नहीं होगा कि डा. गौड़ और डा. तारिक जैसे न जाने कितने डाक्टर होगें जो मरीजों का खून चूस-चूसकर महल खड़ा किया। क्या आप लोग ऐसे डाक्टर और अस्पताल के मालिक को भगवान का दर्जा देगें? जो पैसों के लिए मरीजों को एनआईसीयू और आईसीयू में इस लिए जबरिया भर्ती करते हैं, ताकि मरीजों से अधिक से अधिक धन कमाया जा सके। इस तरह के लोग इतना असवेंदनशील होते हैं, कि मरे हुए बच्चे या मरीज को एनआईसीयू और आईसीयू में रखते हैं, ताकि एक का 20 रुपया बनाया जा सके। इसके बाद भी अगर कोई अपने आप को सबसे बड़ा समाजसेवी कहे तो हंसी भी आती है, और षर्म भी आती। एक का 20 रुपया कमाने वाले अस्पताल से कई पत्रकारों की रोजीरोटी भी चलती है।