बस्ती। कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा के लोग ही भाजपा के लोगों को पचा नहीं पा रहे है। इसी तरह सपा के लोग भी सपा के लोगों को पचा नहीं पा रहें है। सवाल उठ रहा है, कि ऐसे में जनता की लड़ाई कौन लड़ेगा? वे लोग लड़ेगें जो ‘अर्न्तकलह’ और ‘अर्न्तजलन’ से ‘जूझ’ रहे है। जब यह लोग अपनी ही लड़ाई नहीं जीत पा रहे हैं, तो जनता की लड़ाई कैसे जीत पाएगें? सपा के नेता इस लिए परेशान है, कि हर्रैया और महादेवा विधानसभा के विधायकों को विकास के लिए नौ-नौ करोड़ मिल गया, और सपा के तीनों विधायक इस लिए परेशान है, कि उन्हें क्यों एक-एक करोड़ मिला? क्यों सत्ताधारी विधायकों को लूटने के लिए भारी भरकम बजट मिला, और हम्हें क्यों कटोरा थमा दिया गया? यह लोग इस लिए भी परेशान है, कि क्यों सत्ता पक्ष के नेताओं को 40-40 फीसद कमीशन मिलता और विपक्ष के नेताओं को 20-20 फीसद मिलता। कुल मिलाकर नेता जनता की परेशानी से नहीं परेशान है, बल्कि इनकी परेशानी कोई अधिक लूट रहा है, से है। सबके अपने-अपने गठजोड़ है। जिन नेताओं को विभागों को पत्र तक लिखना नहीं आता, वह जनता की समस्याओं का निस्तारण कैसे करेगें? इनके नकली प्रतिनिधियों का तो और भी बुरा हाल है। यह कलकुलेटर लेकर यह जोड़ने घटाने में लगे रहते हैं, कि कौन सी कार्यदाई संस्था निधियों में अधिक कमीशन देगी। यही कारण है, कि एकाध को छोड़कर कोई भी असली/नकली प्रतिनिधि जनता का कोई सीधा चुनाव नहीं जीत पाया। चार साल से अधिक बीतने को है। लेकिन एक भी ऐसा नेता नहीं जो अपने दम पर 27 का चुनाव जीत सके। ऐसा लगता है, कि मानो पक्ष और विपक्ष जनता की लड़ाई लड़ना ही भूल गए। कहीं ऐसा न हो कि जनता भी इन्हें 2027 में भूल न जाए। नेताओं के प्रति जनता में इतना आक्रोष है, कि अगर जनता का बस चले वह 27 तक इंतजार न करें, बल्कि आज ही निपटा दें। न जाने क्यों नेता जनता के हमदर्द नहीं हो पा रहे हैं, जब कि उन्हीं के कारण नेताओं को मान सम्मान और पैसा कमाने का मौका मिलता है। इतिहास गवाह हैं, जिन नेताओं ने जनता जनार्दन को भूला दिया, उसे जनता ने घर बैठा दिया। आज जिस तरह गुटबाजी हो रही है, नेता उसी में परेशान हैं, गुटबाजी भी ऐसी कि जो जनता को स्पष्ट दिखाई दे रही है, इतना झटका खाने के बाद भी नेता गुटबाजी से बाज नहीं आ रहे है। एक केजी क्लास का बच्चा भी यह समझ जा रहा है, कि गुटबाजी से किसी को फायदा होने वाला नहीं हैं, नुकसान पार्टी का होगा। जो लोग गुटबाजी को हवा दे रहे हैं, असल में वह किसी के हितैशी नहीं हैं, ऐसे लोग उस पार्टी के भी हितैशी नहीं हैं, जिनकी बदौलत इनकी शान है। गुटबाजी के चलते जनता को समझ में ही नहीं आ रहा है, कि टिकट ‘अजय सिंह’ को मिलेगा या ‘राजकि शोर सिंह’ को। मिलना किसी एक को ही है, और इनमें कोई इतना महान भी नहीं कि अगर नहीं टिकट मिला तो जिसे मिला उसे जीताने के जीजान से लग जाए, जीताने को कौन कहे, हराने के लिए पूरी टीम के साथ लग जाएगें। चुनाव तो दोनों को ही लड़ना है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल निष्ठा का होगा। जिस तरह से आजकल सोशल मीडिया पर राय शुमारी हो रही है, उससे भी लोगों को अपनी मन की बात कहने का मौका मिल रहा है। कोई नेता या फिर उनके षुभ चिंतक यह न समझे कि रायशुमारी में जो परिणाम आ रहे हैं, वह प्रायोजित है। रायशुमारी किसी भी हालते में प्रायोजित नहीं हो सकता, प्रायोजित सर्वे हो सकता है, लेकिन रायशुमारी नहीं। इस लिए रायशुमारी को किसी भी नेता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्यों कि सोशल मीडिया में जो भी कमेंट या फिर अपना वोट किसे दिया जाता है, वह काफी सोचकर दिया जाता है। कमेंट वही करता है, जो लोगों के दिलों में रहता है। इस लिए नेताओं और उनके शुभ चिंतकों को कमेंट से नहीं घबड़ाना चाहिए, और न कमेंट के बदले कमेंट ही करना चाहिए, बल्कि इस बात की समीक्षा करनी चाहिए, कि आखिर जनता ने उसके बारे में क्यों कमेंट किया? जिस दिन नेताओं ने इसकी समीक्षा करनी शुरु कर दी, यकीन मानिए, उन्हें अपनी कमियों को सुधारने का मौका मिल जाएगा। र्पािर्टयों को भी प्रत्याशी के बारे में भ्रम की स्थित पैदा नहीं करनी चाहिए, अभी से उन्हें बता देना चाहिए, कि जाइए क्षेत्र में मेहनत करिए। अंतिम समय में जब प्रत्याषी का निर्णय होगा तो कैसे कोई जीत पाएगा? प्रत्याषी को कम से कम एक साल पहले यह पता होना चाहिए, कि उसे चुनाव लड़ना है। भाजपा के लिए हर्रैया सीट को बचाना एक चुनौती होगा, और अगर वहां पर परिणाम विपरीत आया तो इसके लिए पार्टी को ही जिम्मेदार माना जाएगा। हर्रैया में अजीब स्थित पैदा हो गई, महत्वपूर्ण यह नहीं है, कि सीटिगं एमएलए का टिकट पार्टी काटना चाहेगी या नहीं, महत्वपूर्ण यह है, कि वर्तमान की गुटबाजी को देखते हुए क्या भाजपा वहां से सीट निकाल पाएगी?
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