बस्ती। इतिहास गवाह है, कि जिन ‘छोटे साहबों’ ने ‘बड़े साहबों’ के खिलाफ जब भी साजिश रची, उन्हें उसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। इतना ही नहीं अगर छोटे साहब ने नेताओं ओैर पत्रकारों के साथ अधिक बैठकी लगाई, तो भी उन्हें उसकी कीमत चुकानी पड़ी। कोई भी बड़ा साहब यह कभी बर्दास्त नहीं करेगें, कि उसका अधीनस्थ उसके खिलाफ ही साजिश रचे, ऐसे में अगर किसी छोटे साहब ने साजिश रचने का प्रयास किया तो उसे पैदल कर दिया गया, उसके पर कतर दिए गए, मलाईदार विभागों को छीनकर किसी और को दे दिया गया। एक तरह से पहचान ही समाप्त कर दी गई। अगर किसी छोटे साहब को इतनी बड़ी सजा मिलती है, तो मानसिक रुप से परेशान होना लाजिमी है। जाहिर सी बात कि जिन साहब का रुतबा ही छीन लिया जाए, उस साहब के परेशानी का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। छोटे साहब के साथ ऐसा हुआ, जिसे वह चाहें तो भी पूरी जिंदगी भूल नहीं पाएगें, भरी बैठक में बड़े साहब के द्वारा यह बताया जाना कि यही वो छोटे साहब हैं, जो हमारे खिलाफ साजिश रच रहे थे, इससे अधिक बदनामी किसी छोटे साहब की और नहीं हो सकती, इसी लिए कहा भी गया है, कि सबकुछ कीजिए, चाहें जितना भ्रष्टाचार कीजिए, फर्जीवाड़ा कीजिए, मगर बड़े साहबों के खिलाफ साजिश मत रचिए, नहीं तो आपके साथ उन अधीनस्थों को भी सजा भुगतनी पड़ेगी, जो अपने छोटे साहब को यह सलाह दे रहे थे, कि साहब हम आपके साथ हैं, आवष्यकता पड़ने पर पूरे संगठन को आपके साथ खड़ा कर देगें। यही वफादारी अगर बड़े साहब के प्रति दिखाई होती तो आज अन्य तहसीलों में मक्खी और मच्छर न मार रहे होते। इसे एक तरह से छोटे साहब के साथ मिलकर बड़े साहब के खिलाफ बगावत करना ही माना जाएगा। पूरे जिले ने देखा कि पिछले दिनों क्या हुआ? वह हुआ जिसकी कोई कल्पना ही नहीं कर सकता, लेकिन जो कुछ भी हुआ, ठीक हुआ, ऐसा जिले के लोगों का कहना भी है। अनुषासन बनाए रखने और जिला चलाने के लिए बड़े साहबों को अगर कठोर से कठोर भी निर्णय लेना पड़े उसे लेना चाहिए, जेकिन किसी भी अधीनस्थ को इतनी आजादी नहीं देनी चाहिए, कि वह अपने सीनियर को ही चुनौती देने लगे, अगर ऐसा होने लगा तो अनुशासन नाम की कोई चीज ही नहीं रह जाएगी। यह कार्रवाई आने वाले छोटे साहबों के लिए एक सबक होगा, जो बड़े साहब के खिलाफ साजिश रचने की मंशा रखते है। बड़े साहब को कमजोर और नीचा दिखाने का मतलब पूरे जिले को कमजोर करना, इससे उन छोटे साहब के अधीनस्थों को भी सबक मिलेगा, जो बड़े साहब के खिलाफ साजिश रचने वाले छोटे साहब का साथ देने की मंषा रखते है। किसी छोटे साहब को कभी इस बात का भी गुमान नहीं होना चाहिए, कि जिला उनके कारण चलता, वह ही जिले को चला रहे है।
वैसे तो बस्ती में कोई छोटा बड़ा अधिकारी आना नहीं चाहता और आ जाता है, तो जाना भी नहीं चाहता। जो भी जिले से गया, वह बैग में नोट भरकर गया, तभी तो एक एडीएम रैंक के छोटे साहब, जिले से जाने लगे तो यहकर गए, कि उन्होंने जितना पैसा बस्ती से कमाया, उतना पूरी नौकरी में नहीं कमाया, पहले तो यह छोटे साहब जिले में आना नहीं चाहते थे, और जब इनका तबादला हुआ, तो जाना नहीं चाहते थे, तबादला रोकवाने के लिए इन्होंने भरसक प्रयास किया, जाने से आनाकानी भी किया, लेकिन जब सीएम कार्यालय से यह कहा गया, कि अगर जिला नहीं छोड़े तो कार्रवाई हो जाएगी, तब मजबूरी में इन्हें जिला छोड़ना पड़ा, ऐसा है, हमारा जिला। कहना गलत नहीं होगा, कि अधिकांष छोटे और बड़े साहबों ने जिले का विकास कम और भ्रष्टाचार अधिक किया, एक तरह से जिले को लूटकर ले गए। साहब चाहें विकास वाले हों या फिर प्रशासन वाले सभी ने अपनी मर्जी से जिले को लूटा और चलाया। यही कारण रहा कि न जिला आईडिएल बन पाया, और न जिले के बड़े साहब ही आइडिएल बन पाए।
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