बस्ती। हाईकोर्ट ने भले ही सरकार और चुनाव आयोग को तीन माह के भीतर पंचायत चुनाव कराने का डायरेक्षन दिया हो, लेकिन भाजपा सरकार कभी नहीं चाहेंगी कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के पहले हो, अगर ऐसा चाहती तो समय से ओबीसी का जनगणना करा सकती थी, और आरक्षण को भी लागू कर सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जब कि चुनाव आयोग समय से चुनाव कराने के लिए तैयार बैठा हुआ था, और आज भी उसकी पूरी तैयारी हैं, बस मतगणना की व्यवस्था करना अवषेष है। सरकार और भाजपा के लोग यह नहीं चाहते थे, कि पंचायत चुनाव समय से हो, क्यों कि इन्हें डर है, कि अगर विधानसभा से पहले पंचायत चुनाव हो गया तो कहीं सत्ता न हाथ से निकल जाए। सरकार चाहती तो समय से पंचायत चुनाव करा सकती थी, क्यों कि चुनाव कराने के लिए उसके पास पर्याप्त समय था, अगर 2027 का चुनाव न होता तो सरकार को समय से चुनाव कराने में कोई दिक्कत नहीं होती और न कोई रिस्क ही रहता, लेकिन अब तो रिस्क ही रिक्स हैं, और भाजपा सरकार पंचायत चुनाव करवा कर 2027 के चुनाव को किसी भी कीमत पर दांव पर लगाना नहीं चाहेगी। चुनाव टालने के लिए भाजपा सरकार के पास एक नहीं अनेक बहाने हैं, इनमें ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट को मुद्वा बनाकर सरकार हाईकोर्ट के आदेष को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकती है। क्यों कि ओबीसी कमीशन की रिपोर्ट को आधार मानकर सरकार आरक्षण नियमावली बनाएगी, उसके बाद आरक्षण की प्रक्रिया प्रारभ होगा, और जब आरक्षण जारी हो जाएगा तो उसके बाद चुनाव आयोग अधिसूचना जारी करेगा। जनगणना को भी सरकार बहाना बना सकती है। जाहिर सी बात हैं, कि इस प्रक्रिया को अपनाए बिना चुनाव नहीं हो सकता है, और प्रक्रिया को पूरा करने में तीन माह से अधिक का समय लग सकता है, यानि हाईकोर्ट के डायरेक्षन के बाद भी सरकार के पास तीन माह के भीतर चुनाव न करवाने के अनेक बहाने का है। वैसे भी अधिवक्ताओं का कहना है, कि सरकार इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट मंे जाने की तैयारी कर रही है। सच तो यह है, कि भाजपा समय से चुनाव कराना ही नहीं चाहती, क्यों कि उसे अच्छी तरह मालूम हैं, कि अगर विधानसभा से पहले पंचायत का चुनाव हो गया तो विधानसभा चुनाव का परिणाम प्रभावित हो सकता है। इसे भाजपा के लोगों का सत्ता खोने का डर भी कहा और माना जा सकता है।

हाईकोर्ट ने सिर्फ चुनाव कराने का ही डायरेक्षन दिया है, कोर्ट ने उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें प्रशासक की नियुक्ति को निरस्त करने की मांग की गई। सरकार अपने लाभ के लिए क्या-क्या करती है, और कर सकती है, इसे सभी लोग देख रहे है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि सरकार ने ग्राम पंचायत पर पिछले पांच सालों में विकास के नाम अरबों रुपया खर्च किया, उसके बाद भी सरकार को यह डर हैं, कि कहीं वह पंचायत चुनाव करवाकर विधानसभा को न खो दें। सरकार में बैठे और भाजपा के लोगों को अच्छी तरह मालूम हैं, उनके प्रमुखों, जिला पंचायत अध्यक्षों और प्रधानों ने पिछले पांच साल में लूटपाट करने के आलावा और कुछ नहीं किया, यही कारण रहा कि भाजपा सरकार में किसी भी जिला पंचायत अध्यक्ष और क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ अविष्वास लाने ही नहीं दिया गया, अगर हाईकोर्ट का आदेश न होता तो संतकबीरनगर में अविष्वास प्रस्ताव न आता, जैसे ही अविष्वास प्रस्ताव आया, वैसे ही भाजपा प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा। सरकार को मिली गोपनीय रिपोर्ट में भी जिला पंचायत अध्यक्षों, क्षेत्र पंचायत अध्यक्षों और प्रधानों के द्वारा किए गए भ्रष्टाचार और अनियमितता की जानकारी दी गई। देखा जाए तो सबसे अधिक भ्रष्टाचार पंचायत विभाग में ही हुआ, और इसके लिए पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर को पूरी तरह जनता दोषी मान रही है। पंचायती राज मंत्री ने तो भ्रष्टाचार के जरिए अपनी और अपने पार्टी की आर्थिक स्थित को तो मजबूत कर लिया, लेकिन जिला वंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायतों को खोखला कर दिया। इनका अधिकतर समय अनापषनाप बयानों में ही बीता। इनके पार्टी का एक विधायक एक भ्रष्ट महिला ग्राम पंचायत अधिकारी का तबादला तक नहीं करवा सके, मंत्रीजी से भी दुखड़ा रोए, क्षेत्र में हो रही बदनामी का भी हवाला दिया, लेकिन डीपीआरओ ने मंत्री की भी नहीं सुनी, विधायक तो बहुत दूर की बात।  अब आप लोग समझ गए होगें कि भाजपा सरकार क्यों नहीं विधानसभा से पहले पंचायत चुनाव करवाना चाहती। यह डारेक्षन दषरथ बनाम सरकार के मामले में दिया गया। इसकी जानकारी हाईकोर्ट के अधिवक्ता केएल तिवारी और बस्ती के दुर्गा प्रसाद उपाध्याय ने दिया।