बस्ती। भाजपा की सरकार हर संभव प्रयास कर रही है, कि पंचायत चुनाव विधानसभा चुनाव के बाद हो, ताकि उसका प्रभाव 2027 के चुनाव में न पड़े। वहीं पर जिला पंचायत आध्यक्ष और क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने वाले अधिकांष चाहते हैं, कि पंचायत का चुनाव भाजपा के सत्ता में रहते हो, ताकि वे कुर्सी पर बैठकर पांच साल तक मलाई काटते रहे। ऐसे लोगों को अच्छी तरह मालूम हैं, कि सत्ता के दम पर जिस तरह पिछली बार प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष बने थे, उसी तरह इस बार भी बने, और यह तब होगा कि जब भाजपा की सरकार होगी। ऐसे लोगों को इस बात का अभी से डर सता रहा है, कि भाजपा की सरकार 2027 में बनेगी या नहीं, और जब भाजपा की सरकार नहीं रहेगी तो कुर्सी कैसे मिलेगी? ऐसा सोचने वाले वही लोग हैं, जिसे भाजपा से कोई मतलब नहीं, इन्हें तो कुर्सी से मतलब हैं, कुर्सी चाहे सपा सरकार में मिले या चाहंे बसपा में मिले। इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, चूंकि ऐसे लोग कुर्सी पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, कुर्सी तक खरीद सकते है। ऐसे लोगों की विचारधारा किसी भी पार्टी से नहीं मिलती। निष्ठावान होना तो बहुत दूर की बात है। बिडंबना यह है, कि ऐसे लोगों को कुर्सी मिल भी जाती है, कैसे मिल जाती है, इसकी जानकारी सभी को है, और जो 25-30 साल से भाजपा की सेवा कर रहा है, उसकी उपेक्षा आयातित लोगों के सामने कर दी जाती है, बेचारा देखता रह जाता है, और अंत में अपने आप को ठगा महसूस करता है। यह बात इस लिए कही जा रही है, क्यों कि ऐसा होते हुए खाटी कार्यकर्त्ता इससे पहले वाले प्रमुखी, जिला पंचायत अध्यक्ष और नगर पंचायत के चुनाव में देख चुके है। ऐसे-ऐसे असली और नकली लोगों के सिर पर ताज पहना दिया गया, जो भाजपा के किसी भी मानक पर खरा नहीं उतरते थे। जिन लोगों ने सपा की सरकार में मलाई काटा उन्हीं लोगों को कुर्सी पर बैठा दिया गया। हालांकि इसका खामियाजा पूरे जिले के लोगों को भुगतना पड़ा, और आज जो जिला भ्रष्टाचार की आग में जल रहा है, उसका कारण वे लोग हैं, जिन्होंने ऐसे लोगों को कुर्सी पर बैठाया, जो लोग कभी भाजपा और भाजपा के नेताओं को सार्वजनिक रुप से गाली देते थे। हालांकि इसका खामियाजा पार्टी के साथ उन लोगों को भी भुगतना पड़ा, जिन्होंने खाटी कार्यकर्त्ताओं की उपेक्षा करके मनइ-तनई को कुर्सी पर बैठाया। जब नकली लोग ब्लॉक और नगर पंचायत का संचालन करेगें तो भ्रष्टाचार बढ़ेगा ही।
देखा जाए तो आज सबसे अधिक भीड़ भाजपा में ही है। एक-एक कुर्सी के लिए पांच-पांच दावेदार हैं, और यह ऐसे दावेदार हैं, जो कुर्सी पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, और कोई भी कीमत देने को तैयार हैं। इसी तरह जिला पंचायत अध्यक्ष के लिए पांच से छह मजबूत दावेदार है। भले ही ऐसे लोगों की छवि बहुत अच्छी न हो लेकिन इन्हें लगता है, जब संजय चौधरी जैसा व्यक्ति जिले के प्रथम नागरिक की कुर्सी पर बैठ सकता है, और भ्रष्टाचार का रिकार्ड बना सकता है, तो हम क्यों नहीं? देखा जाए तो सबसे अधिक मारामारी जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी के लिए होगी, क्यों कि अब लोगों को लग गया कि अगर एक बार इस कुर्सी पर बैठने का मौका मिला तो वह सात पुष्तों का इंतजाम करके ही कुर्सी से उतरेगे। इसके लिए सबकी नजर हरीश द्विवेदी पर लगी हुई है। क्यों कि सभी को मालूम हैं, कि अगर कोई कुर्सी पर बैठा सकता है, तो वह सिर्फ और सिर्फ हरीश द्विवेदी। पता नहीं क्यों लालची लोगों को यह एहसास हो रहा है, कि बिना हरीष द्विवेदी के उनकी नैया पार होने वाली नहीं हैं, अब सवाल उठ रहा है, कि हरीशजी कितने के नाव का खेवनहार बनेगें, और कितनों की नैया पार लगाएगें। हरीष द्विवेदी के प्रति लोगों का ऐसा विष्वास किसी और नेता में नहीं देखा जा रहा है, और अब तो हरीशजी पहले से अधिक राजनैतिक रुप से मजबूत हो गए है। सबसे अधिक दबाव इन्हीं पर होनेे वाला है। कुछ ऐसे लोगों को यह कहते सुना गया कि वर्तमान समय में हरीष द्विवेदी से अधिक पावरफुल नेता पूरे प्रदेश में और कोई नहीं है। यही कारण है, कि प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने का सपना देखने वाले 2027 का इंतजार नहीं कर रहे हैं, और चाहते हैं, कि पंचायत चुनाव 2027 से पहले हो जाए, ताकि उनका सपना पूरा हो सके। पता नहीं क्यों कुर्सी का लालच करने वालों को यह लगता है, कि अगर उन्होंने 2027 का इंतजार किया तो उनका सपना पूरा नहीं हो सकता। भाजपा का एक वर्ग ऐसा भी है, जो यह कह रहा है, कि अगर पंचायत चुनाव 2027 से पहले हो गया तो कुर्सी पर बैठने का मौका तो एक को ही मिलेगा, बाकी चार तो नाराज होगें, और यही उनकी नाराजगी 2027 में दिखाई देगी, और तब भाजपा का जीता हुआ प्रत्याषी हारता हुआ दिखाई देगा। इसी लिए भाजपा 2027 के बाद पंचायत चुनाव कराना चाहती है, ताकि सत्ता खोने का डर कम रहे। यह तो माना जा रहा है, कि अगर 2027 से पहले पंचायत चुनाव हुआ तो अधिकांष ब्लाकों और जिला पंचायत में भाजपा के लोग ही दिखाई देगें, लेकिन भाजपा को इसका नुकसान 2027 में उठाना पड़ सकता है। यही वह गणित और रणनीति हैं, जिसके चलते भाजपा पंचायत का चुनाव 2027 के चुनाव के बाद कराना चाहती है।
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