बस्ती। अगर सीडीओ साहब इतना ही क्षमतावान हैं, कि वह सचिवों की वाट्सअप के जरिए हाजीरी भी लगवा ले रहें हैं, अकेले उर्वरक का आवंटन भी कर ले रहे हैं, और समितियों पर खाद भी पहुंचवा दे रहें है। तो फिर एआर, एसीडीसीओ और एडीओ का क्या काम? क्यों नहीं इन सभी को यह कर घर भेज दिया जाता कि सीडीओ साहब ने सब संभाल लिया है, आप लोगों की जब आवष्यकता होगी तो घर से बुलवा लिया जाएगा। कहा जा रहा है, कि अगर सीडीओ साहब इतना ही सक्षम होते, तो फिर समितियों पर ताला क्यों लगा रहता है? क्यों समितियों से खाद गायब रहती? क्यों किसानों को समय और उचित दर पर उर्वरक नहीं मिलता? सीडीओ साहब सब कुछ कर रहें, लेकिन विकास भवन के भ्रष्टाचार को नहीं रोक पा रहे है। जिस तरह जिले में इनकी यह कहते हुए इंटी हुई थी, कि यह पहले ऐसे आईएएस अधिकारी है, जिनकी पढ़ाई आक्सफोर्ड विष्वविधालय में हुई। आते ही इन्होंने जो ईमानदारी का जलवा दिखाया, और जिसके चलते अनेक बीडीओ ने मनरेगा में भ्रष्टाचार को कम कर दिया था, और जिसके तेवर से सबसे अधिक दहशत में विकास से संबधित अधिकारी रहे। जिस तरह ब्लॉकों और ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार थम सा गया था, उससे लगने लगा था, कि अगर यह रह गए तो कईयों के रोजगार बंद हो जाएगें। मीडिया तक यह कहने लगा था, कि सीडीओ साहब मोदीजी के उस तर्ज पर काम कर रहे हैं, जिसमें न खाउंगा और न खाने दूंगा की बात कही गई। जैसे-जैसे समय बीतता गया, अधिकारी पहले जैसा सामान्य होते गए, कोई डर नहीं रह गया, न खाउंगा और न खाने दूंगा का फारमूला न जाने कहां गुम हो गया, लोगों को पता ही नहीं चला। फिर ऐसा भ्रष्टाचार का सैलाब बहा कि मनरेगा में तीन अरब 12 करोड़ खर्च हो गया, लेकिन काम जमीन पर गांव वालों को नहीं दिखा, कहां गया तीन अरब 12 करोड़, किसी को पता नहीं। अगर यह परिणाम उस अधिकारी के कार्यकाल का है, जिसने न खाउंगा और खाने दूंगा का नारा लगाया था, तो ऐसे अधिकारी के ईमानदार होने या फिर आक्सफोर्ड में पढ़ने से जिले की जनता को क्या लाभ? सीडीओ साहब के बारे में जिन लोगों की राय पहले थी, उन सभी ने अपनी राय को बदल दिया।
अब आ जाइए, जिले की सबसे ज्वलंत और किसानों से जुड़ी खाद को लेकर। खाद के बारे में किसी से कुछ छिपा हुआ नहीं, किसानों के खाद के नाम पर तत्कालीन एआर, वर्तमान जिला कृषि अधिकारी और डीएस पीसीएफ, समितियों के सचिव, होलसेलर्स और रिटेलर्स कहां से कहां पहुंच गए, और जिसके नाम पर यह लोग पहुंचे यानि किसान वहीं का वहीं खड़ा रहा। पहले हम आपको वर्तमान उर्वरक की व्यवस्था के बारे में बताते है। वर्तमान में उर्वरक का आवंटन सीडीओ साहब करते, जबकि यह इनका कार्य नहीं है। सरकार की मंषा प्रत्येक समितियों पर एक-एक टक यूरिया और एक-एक टक फासफेटिक हर समय उपलब्ध रहना चाहिए, इसके लिए समितियों को सरकार जिला सरकारी बैंक के जरिए 10 लाख तक ऋण सीमा दिया गया। 10-10 लाख तो सचिवों ने ले लिया, लेकिन लगभग 80 फीसद समितियों पर खाद ही उपलब्ध नहीं है। जब कि इसके लिए एआर, डीएस पीसीएफ और जिला सहकारी बैंक जिम्मेदार है। 10-10 लाख देने के पीछे सरकार की मंषा कोई समिति खाद विहीन न होने पाए का रहा। जिले में किसानों को खाद उपलब्ध कराने की कमान सीडीओ ने खरीफ सीजन से ही संभाल रखा है। सवाल उठ रहा है, कि जब 10-10 लाख लिया तो खाद क्यों नहीं समितियों पर है? कहां गया खाद? पैसा कहां गया? सीडीओ बताइए, जब पैसे का गबन हुआ तो क्यों नहीं अभी तक एक भी समिति के सचिव के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाया गया? जब कि सीडीओ साहब प्रति दिन सचिवों की हाजीरी वाट्सअप के जरिए लेते हैं। सीडीओ साहब किसान पूछ रहे हैं, कि क्या हाजीरी ले लेने से किसानों के खेतों तक खाद पहुंच जाएगा? सीडीओ साहब खाद तो किसानों को उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं, और चले हैं, सचिवों की हाजीरी लेने। जब कि हाजीरी लेने की जिम्मेदारी शासन की ओर से एडीओ और एसीडीसीओ को आनलाइन के जरिए दे रखी है। सीडीओ साहब किसी के कार्य में दखलदांजी करने से अगर व्यवस्था में सुधार हो सकता है, तो कब का हो गया होता, बल्कि दखलंदाजी से व्यवस्था और भी पटरी से उतर जाती है। सीडीओ साहब की इतनी सक्रियता के बाद भी अगर किसानों को समय से उचित दर पर उर्वरक नहीं मिल रहा है, तो ऐसी सक्रियता से क्या लाभ? सीडीओ साहब की सक्रियता को देखकर विभाग के लोग कहने लगें, कि तो फिर एआर, एसीडीसीओ और एडीओ की क्या आवष्यकता? सीडीओ साहब पत्रकारों को बैठक से बाहर जाने के कहने के बजाए अपने कार्यो में ईमानदारी दिखाइए, वरना जाने के बाद कोई याद तक नहीं करेगा। सीडीओ साहब अगर वाकई आप किसानों को खाद दिलाना चाहते हैं, तो सबसे पहले उन समितियों के सचिवों की जांच करिए, जिन्होंने खाद का कारोबार करने के लिए 10-10 लाख तो ले लिया, लेकिन न खाद हैं, और न पैसा। सचिव खाद के पैसे को सूद पर चला रहे है। नीजि कारोबार कर रहे हैं।
0 Comment