बस्ती। सदर ब्लॉक में एक एपीओ हैं, जिनका नाम नेहा गोलहानी हैं, इनके भीतर सेठानियों का शौक पैदा हो गया है। इन्हें भी किटी पार्टी करने में जाने का शौक हो गया है। कहने को तो यह स्थलीय सत्यापन करने जाती है, लेकिन किटी पार्टी में चली जाती हैं। यह किटी पार्टी उन महिला कर्मियों के लिए नहीं बना हैं, जो सरकारी कामकाज करती है, अगर किसी महिला कर्मी को यह चस्का लग ही गया, तो उसे अपनी शौक को पूरा करने के लिए पांच बजे के बाद का समय रखना चाहिए, ताकि कोई अगुंली न उठा सके,शौक पालना कोई बुरी बात नहीं हैं, लेकिन अगर इस शौक को पांच बजे के बाद पूरा किया जाए तो कोई सवाल नहीं करेगा। वैसे भी किसी कामकाजी महिला के पास इतना समय और इतना मानदेय नहीं मिलता कि वह सेठानियों के शौक को पूरा कर सके। किटी पार्टी अगर रोज होती है, तो इसे शौक नहीं बल्कि जुआ खेलना माना जाता है, और जुआ 20-25 हजार मानदेय पाने वाली महिला रोज नहीं खेल सकती है, वही खेल सकती है, जिसे मनरेगा का कमीशन मिलता हैं, फिर भी अगर वह खेलती है, तो उस पर वही आरोप लगते हैं, जो ब्लॉक के मनरेगा पीओ/बीडीओ पर लगता है। जिले की यह पहली ऐसी महिला पीओ होगी, जिनपर कमीशन का पैसा किटी पार्टी में लगाने का आरोप लग रहा है। इनके बारे में ब्लॉक और प्रधानों का कहना है, कि यह कार्यालय में बैठकर प्रधानों का इंतजार करती रहती है, कि कब कोई प्रधान मनरेगा की पत्रावली लेकर आए और सौदेबाजी, जो प्रधान कमीशन नहीं दे पाता या फिर यह कहता है, कि मैडम भुगतान करवा दीजिए, जैसे भुगतान होगा, आप का कमीशन मिल जाएगा, उसकी पत्रावली होल्ड करवा देती है, यानि जब तक कमीशन नहीं मिलेगा मैडम पत्रावली फीड करने के लिए मनरेगा आपरेटर को नहीं देगी, इसी बात को लेकर दो दिन पहले किटी पार्टी की शौकीन और मनरेगा आपरेटर फारहत जहां के बीच कार्यालय में ही नांेक झोंक हो गई, बात इतनी बढ़ गई, कि एक दूसरे पर व्यक्तिगत आरोप लगाने लगी, नेहा का कहना है, कि 10 हजार मानदेय पाने वाली आपरेटर कैसे मंहगा कपड़ा और मंहगें शौक रख सकती है। होता यह था, कि अधिकतर प्रधान कमीशन से बवने के लिए पत्रावली को सीधे मनरेगा आपरेटर को दे देते थे, यही बात एपीओ को नागवार लगी और जब उन्हें यह लगा कि मनरेगा आपरेटर के चलते उसकी कमाई बंद हो रही है, तो सबक सीखाना चाहा। एपीओ को तो मनरेगा आपरेटर का दस हजार मानदेय दिखाई देता है, लेकिन अपने 20 हजार मानदेय को नहीं देखती कि क्या इस 20 हजार में रोज किटी पार्टी में जाया जा सकता है। एपीओ ने जब यह देखा कि प्रधान पत्रावली उसके पास लाने के बजाए सीधे मनरेगा आपरेटर के पास ले जा रहे हैं, तो उन्होंने सभी रोजगार सेवकों को फरमान सुना दिया, कि अगर कोई प्रधान सीधे पत्रावली लाता है, तो कार्रवाई होगी, कहा कि पत्रावली पहले मेरे पास आएगी। नियम भी यही कहता है, कि पत्रावली प्र्रधान को नहीं बल्कि रोजगार सेवक को लेकर जाना चाहिए। इतना ही नहीं यह भी फरमान सुनाया कि बिना उनकी अनुमति के कोई भी रोजगार सेवक मनरेगा आपरेटर फरहत जहां के कमरे में नहीं जाएगा। सवाल उठ रहा है, कि जब एपीओ की मनमानी पिछले लगभग तीन से चल रही है, तो क्यों नहीं किसी बीडीओ और प्रमुख ने सवाल उठाया? क्यों एपीओ की मनमानी को रोकने का प्रयास नहीं किया, इसका सीधा सा जबाव है, कि जब सभी को मनरेगा में कमीशन चाहिए तो कौन एपीओ से सवाल जबाव करेगा, सवाल जबाव तो वही करेगा जो ईमानदार होगा। जब सब बेईमान हैं, तो सवाल कौन करें? एपीओ की तैनाती करने की सरकार की मंशा यह थी, कि वूंकि बीडीओ के पास समय का अभाव रहता हैं, और वह मनरेगा के स्थलीय निरीक्षण नहीं कर सकते हैं, इस लिए एपीओ को रखा गया, ताकि कोई फर्जी भुगतान न होने पाए। जब एपीओ की भर्ती हो रही थी, तो विकास भवन के एक बड़े अधिकारी ने यह कहा था, कि मनरेगा में एक और शेयर होल्डर आ गया। अधिकारी की बात में कितना दम था, आज वह सच साबित हो रहा है। मनरेगा में तो फर्जीवाड़ा नहीं रुका अलबत्ता एक और हिस्सा लग गया। पूरे जिले में जिस तरह मनरेगा में फर्जी भुगतान हो रहे हैं, उसे देश सरकार को एपीओ पद को ही समाप्त कर देना चाहिए।

‘विकास भवन’ ने जारी किया, ‘फर्जीवाड़ा’ करने का ‘फरमान’

मनरेगा में भ्रष्टाचार का यह आलम हैं, कि विकास भवन से सभी बीडीओ को यह मैसेज जा रहा है, कि अधिक से अधिक मस्टरोल निकाला जाए, भले ही चाहें फर्जी ही क्यों न हो? क्यों कि जितना अधिक फर्जी मस्टरोल निकलेगा उतना अधिक अधिकारियों का कमीषन बनेगा। विकास भवन का फरमान जब बीडीओ ने सचिवों को सुनाया तो सचिवों के हाथ पैर फूल गया, अनेक सचिवों का कहना है, कि जब खेतों में फसल खड़ी हैं, तो कहां से काम होगा, और कहां से मस्टरोल निकलेगा? यही वह फरमान हैं, जिसके चलते झमाझम बारिष में भी मजदूर कागजों में फावड़ा चलाते है। आप लोगों को भी लग रहा होगा, कि जिन अधिकारियों के जिम्मे मनरेगा की रखवाली हैं, अगर वही अधिकारी खुद फर्जी वाड़ा करने की अनुमति देता है, तो समझ सकते हैं, कि मनरेगा का क्या होगा? पैसे ही जिले में हर साल मनरेगा में पोंच अरब से अधिक खर्च होते हैं, फिर भी न तो एक भी ग्राम पंचायत और न एक भी क्षेत्र पंचायत माडल बन सका।