बस्ती। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि जिस सत्ता पक्ष के जिलाध्यक्ष को मजबूत होना चाहिए, वह इतना कमजोर क्यों होता जा रहा है, कि अपने कार्यकर्त्ता का साथ न दे सकें। यह सवाल लाइफ लाइन हास्पिटल के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्त्ता सचिन सिंह के मामले में उठ रहा है। सवाल उठ रहा है, कि जब न जाने कितने बच्चों के मौत के जिम्मेदार लाइफ लाइन के डा. तारिक और उसके भाई डा. असलम के अनियमित कार्यो पर पर्दा डालने के लिए सीएमओ, डा. एसबी सिंह, डा. एके चौधरी और डा. बृजेष षुक्ल जैसे भ्रष्ट अधिकारी साथ दे सकते हैं, तो फिर भाजपा के जिलाध्यक्ष उस ईमानदारी कार्यकर्त्ता सचिन सिंह का साथ दे क्यों नहीं दे रहें हैं, जो मासूमों की मौत के सौदागरों को सजा दिलाने और भविष्य में होने वाले बच्चों की मौत को रोकने के लिए लड़ाई लड़ रहा है। सचिन का कहना है, कि वह सारे साक्ष्य लेकर कमीशनर, डीएम और सीएमओ से मिलकर अस्पताल को सील करने के लिए लिख चुका है, हर कोई जांच और कार्रवाई का भरोसा दिला चुके है। यहां तक कि डिप्टी सीएम और स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक से भी मिल चुका, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई, जिलाध्यक्ष से भी मिलकर कह चुका हूं कि जब भाजपा कार्यकर्त्ता के शिकायत पर कार्रवाई नहीं होगी तो एक आम आदमी के शिकायत पर क्या कार्रवाई होती होगी? इसे आसानी से समझा जा सकता है। अधिकारियों की तरह जिलाध्यक्ष ने भी कार्रवाई करवाने का भरोसा दिलाया। सचिन सिंह चाहते तो अन्य शिकायतकर्त्ता की तरह लाख दो लाख लेकर चुप हो जाते, लेकिन सचिन का भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने की जज्बा और इनकी ईमानदारी ने इन्हें समझौता करने से रोक दिया, ऐसा भी नहीं कि इन्हें चुप रहने की कीमत देने का आफर नहीं किया गया होगा, अवष्य दिया होगा। सचिन की नाराजगी भ्रष्ट व्यवस्था और भ्रष्ट अधिकारियों से नहीं हैं, बल्कि नाराजगी अपनी पार्टी के नेताओं से हैं, जो इनकी लड़ाई में साथ नहीं दे रहें हैं। कहते हैं, कि जिस हास्पिटल को सील और दोनों डाक्टरों को जेल होना चाहिए, आज वे आजाद घूम रहे हैं, कहते हैं, कि एनएचआरएम के डा. बृजेश शु क्ल तो यहां तक कह चुके हैं, कि डिप्टी सीएम ही नहीं योगी के पास भी जाओगे तो भी लाइफ लाइन वाले का कुछ नहीं होगा, क्यों कि हम लोग उसके साथ है। पैसे में कितनी ताकत हैं, यह लाइफ लाइन वाले डा. तारिक ने बता दिया, सीएमओ और उनकी भ्रष्ट टीम ने यह बताने और जताने का काम किया है, कि लोग चाहें जितना चिल्लाएगें तब तक कुछ नहीं होगा, जब तक हम और हमारी टीम नहीं चाहेगी। जिस अस्पताल को सील होने के बाद सीएमओ पुनः खुलवा सकते है। उस अस्पताल के डा. तारिक और डा. असलम को जेल कैसे हो सकता हैं? कहने का मतलब जिस अस्पताल के डाक्टर को न जाने कितने लोग कसाई और कातिल कह चुके है, अगर उसके बाद भी कार्रवाई नहीं होती तो समझ लेना चाहिए कि पूरा सिस्टम बिक चुका है। रही बात भाजपा के जिलाध्यक्ष की तो कहा भी जाता है, कि अगर किसी जिले का जिलाध्यक्ष कमजोर होता है, तो इसका खामियाजा पार्टी से लेकर आम जनता कोे भुगतना पड़ता है। जिस जिलाध्यक्ष में एक भ्रष्ट सीएमओ को हटवाने की कूबत न हो उसे इस्तीफा दे देना चाहिए। जो जिलाध्यक्ष अपने कार्यकर्त्ता का साथ न दे सके, उसे पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं होता। सचिन सिंह का कहना है, कि अब उनके सामने आमरण अनषन पर बैठने के आलावा और कुछ नहीं बचा, भले ही चाहें पार्टी के लोग इस भ्रष्टाचार की लड़ाई में उनका साथ दे या न दे, उनकी लड़ाई जारी रहेगी।
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