बस्ती। जारी भाजपा जिला कार्यकारिणी समिति से हर्रैया और महादेवा विधानसभा से महिलाओं की उपेक्षा कहीं भाजपा को 27 में भारी न पड़ जाए। 23 पदाधिकारियों में से एक भी महिला पदाधिकारी का नाम न होना चर्चा का विषय बना हुआ हैं, पूछा जा रहा है, कि आखिर इन दोनों विधानसभाओं से महिलाओं को क्यों उपेक्षित किया गया? इसे लेकर महिलाओं ने असंतोष जताया है, सवाल उठ रहे हैं, कि क्या भाजपा नारी शस्तीकरण को भूल गई? कहने को तो भाजपा में महिलाओं को बहुत सम्मान देने की बातें कही जाती है। उन्हें बराबर का दर्जा देने की बात कही जा रही है, लोकसभा में महिला आरक्षण बिल लाया जा रहा है, लेकिन जब महिलाओं को पद देने की बारी आती है, तो न जाने भाजपा के सारे नारे और दावे कहां चले जाते है? महिलाओं की उपेक्षा का इससे बड़ा और क्या सबूत होगा कि आज तक पार्टी ने किसी महिला को जिलाध्यक्ष नहीं बनाया। रही सही कसर हर्रैया और महादेवा में पूरी हो गई, जारी सूची में संतुलन का अभाव रहा। आखिर भाजपा 2027 में दोनों विधानसभाओं का चुनाव बिना किसी महिला पदाधिकारी के कैसे लड़ेगी? इसे लेकर जो आवाज हर्रैया की किरन सिंह ने उठाई, उसकी गूंज दिल्ली तक सुनाई दे रही है। इन्होंने अमित शाह और राष्टीय अध्यक्ष को भी प्रदेश अध्यक्ष की तरह पत्र लिखा है। इनके कथन का समर्थन मंडल अध्यक्ष हर्रैया सिरीन खान ने भी किया। सूची को लेकर अनेक लोगों ने कहना षुरु कर दिया कि जब तक पाकेट के लोगों को पुरस्कार देने की परम्परा रहेगी, तब तक असंतोष का स्वर उठता रहेगा। इससे किसी को नुकसान हो या न हो, लेकिन जिलाध्यक्ष की छवि को अवष्य नुकसान हो रहा है। अधिकांष भाजपाई इन्हें अब तक सबसे अधिक कमजोर जिलाध्यक्ष मान रहे है। सत्ता पार्टी के जिलाध्यक्ष की हैसियत जिले में एक कैबिनेट मंत्री की तरह होती है। मजाल है, कि कोई अधिकारी उपेक्षा कर जाए। ऐसे-ऐसे अध्यक्ष भी देखे गए, जिन्होंने अधिकारियों को भरी बैठक में दिखा दिया कि जिलाध्यक्ष क्या होता है? महेष षुक्ल ने डीएम प्रियंका निरंजन को जिलाध्यक्ष होने का एहसास करा चुके है। जिले की जनता और कार्यकर्त्ता इसी तरह के जिलाध्यक्ष होने की कामना करते है। कहा भी जाता है, कि जिस भी जिलाध्यक्ष ने कार्यकर्त्ताओं के मान और सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी और उनका ख्याल रखा, वह अध्यक्ष हीरो बन गया। सत्तापक्ष का जिलाध्यक्ष राजकपूर यादव जैसा होना चाहिए, जिसने जो चाहा वही हुआ, जिसे चाहा वह जिले में रहा, और जिसे नहीं चाहा वह एक मिनट चला गया। इन्होंने नाम षोहरत, पद और पैसा खूब कमाया। हर कार्यकर्त्ता इनके कार्यकाल में खुद को जिलाध्यक्ष मान रहा था। यहां बात एक अध्यक्ष की हो रही है। भाजपा के वर्तमान जिलाध्यक्ष की कार्यषैली से हर कोई परिचित है। अगर कोई अध्यक्ष किसी का कृपा पात्र बनकर रहेगा, तो उसका खामियाजा सबसे अधिक उसी को ही भुगतना पड़ेगा, जिलाध्यक्ष रहते और न रहते दोनों समय लोगों की बाते उसे सुननी पड़ेगी। जिलेभर में जो संदेश इनके बारे में गया हैं, उससे इनकी छवि बनने के बजाए और बिगड़ती जा रही है। इन्हें मीडिया को बुरा भला कहने के बजाए उस पर विचार करना चाहिए, कि आखिर उन्हें क्यों लोग किसी का कृपा पात्र कहते है। जो तेवर और जो हनक सत्तापक्ष के जिलाध्यक्ष में होनी चाहिए, वह क्यों नहीं वर्तमान में दिख रहा है? किसी को इतना भी सीधा नहीं होना चाहिए, कि लोग उसे ही कमजोर समझने लगे। इन्हें इस बात का ख्याल रखना होगा कि कोई इन्हें अपने फायदे के लिए इस्तेमान न करे। पद आज हैं, कल नहीं रहेगा, लेकिन पद की गरिमा हमेशा बनी रहनी चाहिए।