बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि आखिर ब्राहृमण महासभा के राष्टीय अध्यक्ष की आडिट जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहे हैं? इसे लेकर ब्राहृमण महासभा में ही घमासान छिड़ा हुआ है, और आवाज उठ रही है, कि इसके लिए कोई तिथि घोषित की जाए और आडिट टीम की जांच में जो भी घोटाला सामने आया, उस पर चर्चा हो और दोषी लोगों के खिलाफ निष्कासन से लेकर विधिक कार्रवाई हो, यह भी कहा जा रहा है, कि दानदाताओं को यह पता होना चाहिए, कि उसके चंदे का उपयोग हुआ या दुरुपयोग? जांच रिपोर्ट पर अध्यक्षजी की चुप्पी से कई सवाल खड़े हो रहे है, कोई कह रहा है, कि दोषियों के बचाव का रास्ता निकाला जा रहा है, तो कोई यह कह रहा है, कि ब्राहृमण महासभा की बदनामी न हो इाके लिए जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा हैं, क्यों कि अगर इसे सार्वजनिक कर दिया गया, तो लोगों का विष्वास ब्राहृमण महासभा से ठीक उसी तरह उठ जाएगा, जिस तरह राम मंदिर से उठा। एक ने तो यहां तक लिखा कि अगर अध्यक्षजी यह कह दे कि कोई घपला नहीं हुआ, तो हम लोग मान लेगें कि कोई घोटाला नहीं हुआ, और फिर इस पर कभी न तो सवाल उठेगा और न घोटाले की बात होगी। जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक न करना यह बताता है, कि बड़े पैमाने पर घोटाला हुआ। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि आखिर अध्यक्षजी क्यों नहीं रिपोर्ट को सार्वजनिक कर रहे हैं? क्या यह रिपोर्ट अध्यक्षजी के लिए ही बनाई गई, रिपोर्ट को गोपनीय रखना और सार्वजनिक न करने के मामले में सबसे अधिक सवालों के घेरें में अध्यक्षजी ही आ रहे है। लोग अब तो खुलकर अध्यक्षजी पर अगंुली उठा रहे हैं, और कह रहे हैं, कि अध्यक्षजी की चुप्पी उन्हें ही संदेह के घेरें में जा रही है। कहा गया कि क्या आडिट के नाम पर आपस में ही संधि कर लिया गया। आडिट के नाम पर चाय और समोसा खाते हुए सफेदा लगा-लगाकर सिर्फ लीपापोती कर दी गई। बोफोर्स दलाली में इतना समय नहीं लगा, जितना आडिट टीम की रिपोर्ट को उजागर करने में लग रहा है। आखिर जांच रिपोर्ट को लेकर क्यों इतना इतना सन्नाटा छाया हुआ है? अध्यक्षजी को निषाना साधते हुए कहा गया कि वे अपने और दानदाताओं के प्रति कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हुए रिपोर्ट को सार्वजनिक करे, वरना समझा जाएगा, कि धन का दुरुपयोग हुआ है। जिस तरह अभी तक अध्यक्षजी को आरोपियों के प्रति जो नरम रुख रहा, उसह का नतीजा आज पूरे ब्राहृमण समाज को भुगतना पड़ रहा है। अगर 20 साल बाद आडिट जांच हो रही है, और उसके बाद भी जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा तो तो यह दानदाताओं और पूरे ब्राहृमण समाज के साथ धोखे जैसा माना जाएगा। जिस तरह दानदाताओं से चंदा लेकर ठगने का काम ब्राहृमण महासभा के कुछ पदाधिकारियों के द्वारा सालों से किया जा रहा है, और हिसाब भी नहीं बताया जा रहा है, वह किसी घोटाले की ओर ईषारा कर रहा है। कहीं ऐसा न हो कि आपस में बगावत हो जाए। अगर इतनी बड़ी संस्था चंद लुटेरों के ईषारों पर चलेगी तो संस्था के अध्यक्ष और राष्टीय कार्यकारिणी के होने का क्या औचित्य? रही बात मंदिर के निर्माण की तो उसे भूल ही जाना बेहतर होगा, क्यों कि जब तक चंदा चोर लोग रहेगें, मंदिर का निर्माण नहीं हो सकता। देखा जाए तो ऐसे कितने पदाधिकारी हैं, जो अपने दायित्वों का निवर्हन ठीक तरीके से कर रहे हैं, या करते आ रहे हैं, घोटाले का उजागर करना और बात हैं, और दोशियों को सजा दिलाना दूसरी बात हैं, और यह कहानी तब तक अधूरी रहेगी, जब तक चंदा चोरों को सजा नहीं मिलेगी।