बस्ती। जनता को क्यों ‘कल्पनाथ सोनकर’ जैसा नेता ‘चाहिए’, क्यों नहीं ‘रवि सोनकर’ जैसा? इस सवाल के जबाव में आज के नेताओं का सच छिपा हुआ है। जनता पत्रकारों से पूछ रही है, कि बताइए वे नेता कहां गुम हो गए, जो पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कभी धरने पर बैठ जाते थे, उन नेताओं के बारे में भी जनता जानना चाह रही है, जो पीड़ितों को साथ में लेकर अफसरों के पास जाते थे, और अफसरों से तब तक लड़ते रहते थे, और कार्यालय नहीं छोड़ते थे, जब तक कि पीड़ित को न्याय नहीं मिल जाता था। इसी लिए आज जिले की जनता ‘कल्पनाथ सोनकर’ जैसे नेता को खूब याद कर रही है, और कह रही है, कि हम्हें कल्पनाथ सोनकर जैसा नेता चाहिए, आज के जैसा नहीं। कहती है, कि नेता हो तो कल्पनाथ सोनकर जैसा। आज का नेता पीड़ितों के लिए अधिकारियों से लड़ने भिड़ने और साथ में ले जाने को कौन कहें, बड़ी मुस्किल से मिल पातें हैं, और सुनते भी बड़ी मुस्किल से। मोबाइल से ही पीड़ितों को न्याय दिलाने का दिखावा प्रयास करतें है। अब इन नेताओं को कौन समझाने जाए कि अगर मोबाइल से ही पीड़ितों को न्याय मिल जाता तो क्यों जनता नेताओं को बुरा भला कहती, और क्यों हराती? और यह न कहती कि जिस नेता की बात अधिकारी न माने वह नेता कैसा? एक तरह से कल्पनाथ सोनकर जनता के हीरो रहे, जो पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए किसी भी हद तक चले जाते थे, सांसद बनने से पहले यह दक्षिण दरवाजा पर फल बेचते थे, और सांसद बनने के बाद भी बेचते रहे। आज की नेताओं की तरह यह अपने आप को कभी नहीं भूले। पीड़ितों को न्याय न देने वाले अधिकारियों को यह अपनी भाषा में पहले समझाते थे, और जो अधिकारी इनकी नहीं समझ पाते थे, समझो उसकी खैर नही। फिर वह अपनी भाषा में समझाते, मेज तक पलट देते थे, इनके साथ में इतना हूजूम जाता था, कि चेंबर में घुसते ही अधिकारी डर जाते थे, और किसी अनहोनी की आशंका को देख अधिकारी सारे काम छोड़कर इनके साथ आए पीड़ितों का काम करते थे, इन्होंने कभी आज के नेताओं की तरह गलत लोगों का न तो साथ दिया और न पैरवी ही किया। जनता ने यही सोचकर कल्पनाथ सोनकर के पुत्र रवि सोनकर को विधायक बनाया ताकि यह भी अपने पिता के पद चिन्हृों पर चलकर पीड़ितों को न्याय दिलाएगें, और अपने कार्यो से अपने पिता का नाम रोशन करेगें, नाम रोषन करने को कौन कहे, यह अपने पिता की परछाई तक नहीं बन पाए। इसी लिए जनता ने इन्हें भी भूला दिया। पिता और पुत्र में इतना अंतर है, कि जनता ने पिता को दो बार सांसद बनाया, और पुत्र को दूसरी बार हरा दिया। असली जमीनी और गरीबों के नेता कल्पनाथ सोनकर ही थे। आज के नेताओं की तरह नहीं जो विधायक और सांसद बनते ही सबसे पहले उसी को भूल जाते हैं, जिसने सांसद और विधायक बनाया।
सवाल उठ रहा है, कि क्या जिले में ऐसा कोई नेता है, जो पीड़ितों के लिए एसी कमरा छोड़कर धरने पर बैठे या अधिकारियों के पास जाए। जबाव न में ही मिलेगा। यह भी सवाल उठ रहा है, कि आखिर आज का नेता क्यों नहीं कल्पनाथ सोनकर जैसा बनना चाहता? कौन सी ऐसी बाधा हैं, जो आज के नेताओं को कल्पनाथ सोनकर जैसा नेता बनने से रोकती है। जिन नेताओं की असली पहचान ही पीड़ितों के हक की लड़ाई लड़ने की होती है, वही नेता अपनी पहचान खोते जा रहे है। आज के नेताओं की पहचान उनके कार्यो से नहीं बल्कि ‘फारचूनर’ और ‘डिफेंडर’ से होने लगी है। जाहिर सी बात हैं, जब यह फारचूनर और डिफेंडर से चलेगें तो वह पीड़ितों की आवाज कैसे सुनेगें? गाड़िया फर्राटा भरते हुए सड़क से निकल जाती है, और पीड़ित नेताजी को आवाज देता रहता है, नेताजी इस नहीं सुन पाते क्यों कि उनके कार का शीशा बंद रहता है, कार का शीशा इस लिए बंद रखते हैं, ताकि कार ठंडा रहे। ऐसे में कैसे नेता पीड़ितों के हक के लिए लड़ पाएगा? पीड़ितों के हक के लिए लड़ने के लिए पीड़ित जैसा बनना पड़ेगा, जो आज के नेता नहीं बन पा रहे हैं, जिसके चलते वे जनता से दूर होते जा रहें है। आज का नेता अधिक से अधिक अमीर बनने में लगा हुआ है। टिकट कैसे मिले? उसके लिए भागदौड़ कर रहा है। जिसके पास जाना चाहिए, नेता उसके पास नहीं जा रहे है। जाहिर सी बात हैं, कि ऐसे में नेताओं के पास पीड़ितों का दर्द सुनने या फिर उनकी मदद करने के लिए न तो समय है, और न उनके भीतर पीड़ितों के लिए कुछ करने का जज्बा ही है। यही कारण हैं, कि नेता जनता का दिल नहीं जीत पाते है।
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