बस्ती। मीडिया बार-बार उन अधिकारियों को सचेत कर रही है, जो नेताओं के झांसे में आकर अपनी नौकरी को भी दांव पर लगा बैठते है। इतिहास गवाह है, कि फंसने पर कोई भी नेता काम नहीं आता, अधिकारियों को ही सबकुछ झेलना पड़ता। तब अधिकारियों का मान और सम्मान के साथ पैसा भी चला जाता है। कुछ इसी तरह का मामला सामने आया, जहां पर बाबूजी के दबाव में ‘जय कांस्टक्षन’ को सिविल कार्यो का ठेका देने के मामले में सीएमओ के बाद अब एडी हेल्थ फंसते नजर आ रहे है। धीरे-धीरे एक-एक करके सभी के चेहरे पर से नकाब उठने लगा है। सवालो के घेरें में आते जा रहे है। पहले सीएमओ आए और अब एडी हेल्थ। एडी हेल्थ साहब उस फर्म के अभिलेखों को भी सही नहीं मान रहे हैं, जो फर्म फैजाबाद और बस्ती दोनों जनपदों में काम कर रही है, और दोनों जनपदों का जेई एक ही है। सवाल उठ रहा है, कि आखिर ‘जनेष्वर चौधरी’ ने सीएमओ और एडी हेल्थ के लिए क्या कर दिया होगा, और क्या दे दिया होगा कि जो दोनों नौकरी को दांव पर लगाने को तैयार हो गए। अगर यही ठेका नियम से जय कांस्टक्षन को मिला होता तो सवाल न उठता, सवाल तो अनियमित तरीके से किए गए अनुबंध को लेकर सीएमओ और जांच करने वाले एडी हेल्थ पर उठ रहे है। यह माना जा रहा हैं, कि अनुबंध करने का दबाव बाबूजी का सीएमओ पर था, लेकिन क्या यही दबाव बाबूजी का एडी हेल्थ पर भी था, जिन्होंने सीएमओ के अनियमित अनुबंध पर मोहर लगा दिया, यानि जो आख्या दी गई, उसमें शिकायतकर्त्ता दीपक कुमार मिश्र को ही गलत साबित कर दिया, और जो सीएमओ गलत थे, उन्हें सही ठहरा दिया। एडी हेल्थ ने जो एक दिन में ही रिपोर्ट दे दिया उस पर भी सवाल उठ रहे हैं, और पूछा जा रहा है, कि एडी साहब जो जांच रिपोर्ट आप तीन माह में भी नहीं दे सके, उसे एक ही दिन में कैसे और क्यों दे दिया? पूछा जा रहा है, कि एडी साहब आपने जो जांच रिपोर्ट दी हैं, उसे देखकर एक केजी क्लास वाला बच्चा भी कह देगा कि यह रिपोर्ट ठेकेदार को लाभ और सीएमओ को बचाने के लिए दिया गया। जिस एडी हेल्थ को यह तक नहीं मालूम कि आईसीआईसीआई बैंक राष्टीयकृत नहीं बल्कि प्राइवेट हैं, और जो बैंक खूद प्राइवेट लि. लिख रहा हो, उसे कैसे एडी हेल्थ ने राष्टीयकृत बैक बता दिया। ऐसे एडी हेल्थ की ईमानदारी पर षिकायतकर्त्ता विष्वास करे तो कैसे और क्यों करें? एडी हेल्थ साहब के उस ज्ञान पर भी संदेह होता हैं, जिसमें इन्होंने बीएमसी फर्म के हैसियत प्रमाण-पत्र को वैध बता दिया, जब कि इस फर्म के हैसियत प्रमाण-पत्र की वैधता टेंडर निकलने के एक माह पहले ही समाप्त हो गया, टेंडर निकला 12 फरवरी 26 को और हैसियत प्रमाण-पत्र की वैधता आठ जनवरी 26 को ही समाप्त हुआ। जबकि निविदा शर्त में स्पष्ट लिखा हुआ है, कि हैसियत प्रमाण-पत्र निविदा खुलने की तिथि तक वैध होना चाहिए, लेकिन यहां पर तो निविदा खुलने के एक माह पहले ही अवैध हो गया था। एडी हेल्थ और सीएमओ ने जय कांस्टक्षन के उस निविदा फर्मा को पूर्ण माना जो अपूर्ण है, न जाने कैसे एडी हेल्थ और सीएमओ को वह निविदा फार्म पूर्ण लगा, जिसमें स्वंय के पते के प्रमाण-पत्र पर पता ही नहीं लिखा गया, संबधित फार्म पर तिथि ही नहीं डाली गई, इसके बाद भी अगर एडी हेल्थ और सीएमओ ऐसे निविदा फार्म को पूर्ण मानते हैं, तो दोनों के ज्ञान और बुद्वि पर तरस आता है। क्या इसे आप सीएमओ और एडी हेल्थ की ईमानदारी कहेंगें? या फिर जय कांस्टक्षन के प़ा में की गई बेईमानी मानेगंे? पक्षपात अधिकारी दो ही सूरतों में करता है, पहला लाभान्वित होने की दशा में दूसरा बास और नेता के दबाव में। अधिकांश पक्षपात लाभान्वित होने की दशा में ही होते हैं, अगर किसी नेता या बास का दबाव भी होता है, तो वह पक्षपात तो कर देते हैं, लेकिन लाभांश लेने के बाद, यानि पक्षपात करने वाला हेडी हेल्थ और सीएमओ जैसा अधिकारी हो तो वह दोनों लाभ उठाता, लाभांश भी लेता हैं, और नेता एवं अधिकारी पर एहसान भी जताता। कहने का मतलब पक्षपात करने वाले अधिकारियों के दोनों हाथों में लडडू होता है, लेकिन जब कहीं मामला फंस जाता है, या फिर हाईकोर्ट में चला जाता है, तो प़क्षपात करने वाले अधिकारियों को यह जिंदगीभर अफसोस रहता है, कि क्यों उसने नेता और बास का कहना माना और लाभांश लिया। इसी लिए कहा जाता है, कि उतना ही पक्षपात कीजिए, जितना चल जाए, नौकरी फंसा कर पक्षपात करना बहुत बड़ी बेवकूफी और गलती मानी जाती है। जैसा कि ‘जय कांस्क्टशन’ के मामले में होने वाला है। आज एडी हेल्थ और सीएमओ को यह मामला भले ही मामूली लग रहा होगा, लेकिन जैसे ही यह मामला हाईकोर्ट जाएगा, सांस फूलने लगेगा, तब न नेता बचाने आएगें और न बास ही मदद करेगें, जो लाभांश मिला रहेगा, वह भी कोर्ट कचहरी और वकील साहब में चला जाएगा। यह मामला उस दिन से ही चर्चा में रहा, जब डीएम ने मंडलीय स्तर के अधिकारी एडी हेल्थ को जांच सौंपा, जबकि टेंडर का मामला था, और यह जांच पीडब्लूडी के अधिकारियों की टीम से करनाी चाहिए थीं, जब इसी तरह एक मामला तत्कालीन डीएम प्रियंका निरंजन के पास गया तो शिकायतकर्त्ता ने डीएम से कहा कि इसकी जांच एडी हेल्थ से करा ली जाए, जब डीएम ने कहा कि वह मंडलीय स्तर के अधिकारी हैं, और वह किसी मंडलीय स्तर के अधिकारी से जांच नहीं करवा सकती, यह अधिकार कमिश्नर साहब को है। लेकिन यहां पर तो जांच उस विभाग के अधिकारी से करवाई जा रही है, जिस विभाग के अधिकारी पर अनियमितता बरतने का आरोप है। जो शिकायत साक्ष्य के साथ की जाती है, उसे यह कहकर पूरी तरह नहीं झुठलाया जा सकता है, कि शिकायत निराधार हैं, और सीएमओ ने जो अनुबंध किया वह नियम से किया। शिकायतकर्त्ता का कहना है, कि एडी हेल्थ ने भी वही किया जो सीएमओ ने किया, एक तरह से एडी हेल्थ ने सीएमओ के अनियमित कार्य पर अपनी मोहर लगा दी। एडी साहब पर एक और सवाल उठ रहा है, कि जो जांच रिपोर्ट शिकायतकर्त्ता के मांगने के बावजूद नहीं दिया, वह जांच रिपोर्ट इनके कार्यालय से बाहर कैसे आ गई? इसका मतलब एडी हेल्थ कार्यालय से कुछ भी हासिल करना कठिन नहीं है। इसका सबूत जांच रिपोर्ट। शिकायतकर्त्ता का यह भी कहना हैं, कि बाबूजी के कहने पर एडी हेल्थ ने सीएमओ के भ्रष्टाचार पर एक तरह से पर्दा डालने का काम किया।
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