बस्ती। जनपद गोरखपुर के थाना बेलघाट के एसओ साहब का एक असंवेदनषील मामला सामने आया। खून से सटे हुए 12 साल के लड़के की मां जब थाने में मारने वालों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाने गई, तो एसओ संदीप यादव ने महिला से कहा कि बचा मरा थोड़े ही हैं, जाओ दवा कराओ, ठीक हो जाएगा, कहा कि बच्चा अगर मर गया होता तब मुकदमा दर्ज कर देते है। बच्चें की मां मारते हुए वीडियो भी दिखाया, लेकिन एसओ साहब न जाने क्यों पीड़िता की रिपोर्ट हलखने को तैयार नही। पीड़िता बस्ती जिले के थाना लालगंज के ग्राम रामपुर रेवटी की संगीता पत्नी विक्रम रहने वाली है। 12 साल के बच्चे का नाम अनिल है। जो अपनी मां के साथ जख्मी हालत में कचहरी आई थी। महिला ने इसकी शिकायत पहले मुख्यमंत्री के पोर्टल पर किया, उसके बाद आईजी जोन, एसएसपी और एसपी गोरखपुर को करते हुए एफआईआर दर्ज कर न्याय दिलाने की मांग की है। जब इस मामले में एसओ संदीप यादव के मोबाइल नंबर 9838393683 पर पक्ष लेने का प्रयास किया तो कोई जबाव नहीं मिला। प़क्ष मिलने पर एसओ साहब का पक्ष लिख दिया जाएगा।
मुख्यमंत्री सहित अन्य अधिकारियों को भेजे गए पत्र में संगीता देवी ने कहा कि उसका नाबालिग 12 साल का लड़का अनिल गांव के ही विरेंद्र पुत्र त्रिलोकी नाथ के विवाह की बारात में सात मई 26 को जनपद गोरखपुर के ग्राम त्रिलोकपुर थाना बेलघाट गया था। रात लगभग 12 बले जब द्वार पूजा होने जा रहा था, तभी पुरानी रंजिश में गांव के ही धमेंद्र पुत्र राममिलन, रोहित पुत्र राममिलन, मनीष पुत्र धमेंद्र और अमरजीत पुत्र अमरेंद्र, मेरे बेटे की हत्या करने की नीयत से उसका गला पकड़कर अपने बराबर उठाकर जमीन पर पटक दिया, और चारों लोग मोटा लकड़ी का डंडा से बुरी तरह मारने लगे, जिससे अनिल का सिर बुरी तरह फट गया, और वह लहुलुहान होकर जमीन पर तड़फड़ाने लगा, बेहोश हो गया, नाक से खून गिरने लगा। मौके पर मॉजूद लोगों ने बीच-बचाव किया, लिखा कि तभी से वह लड़के का खून से सना कपड़ा लेकर कभी एसओ तो कभी कचहरी तो कभी अधिकारियों के चक्क्र काट रहें है। अगर कोई नाबालिग बच्चे की मां खून से सना कपड़ा लेकर थाने मुकदमा दर्ज कराने जाती है, और उसका मुकदमा दर्ज करने के बजाए यह कहा जाता है, कि जब बच्चा मर जाएगा तब मुकदमा दर्ज कर लेगें। ऐसे में एक गरीब करे तो क्या करें? और किसके पास जाए कि उसे और उसके बेटे को न्याय मिल जाए। ऐसे मौके पर जब पुलिस से मदद की उम्मीद होती है, तो एसओ साहब मदद करने के बजाए यह कह देते हैं, कि जब बच्चा मर जाएगा तब मुकदमा लिख देगें। सवाल उठ रहा है, कि क्या पुलिस वालों में संवेदनशीलता नहीं होती? क्या उनका परिवार नहीं होता? क्या उन्हें मद की आवष्यकता नहीं पड़ती? यह कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका जबाव यूपी की पुलिस को तलाशना होगा।
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