बस्ती। पद का दुरुपयोग किस तरह किया जाता है, अगर इसका सच देखना हो तो मुख्यकोषाधिकारी कार्यालय में देखा जा सकता है। आरोप हैं, कि सीटीओ साहब और उनके बाबू कुबेर का खजाना खाली कर रहे है। अनियमित रुप से भुगतान करके जिस तरह सरकारी खजाने का दुरुपयोग हो रहा है, उससे सीटीओ पर सवाल उठ रहे है। गाइड लाइन के अनुसार आहरण और वितरण की पूर्ण जिम्मेदारी सीटीओ की होती है, अगर कोई अनियमित रुप से भुगतान हो रहा है, तो उसकी भी जिम्मेदारी सीटीओ की है। कहना गलत नहीं होगा, कि जिस सीटीओ की जिम्मेदारी अनियमित भुगतान को रोकने की है, वही अनियमित भुगतान कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं, यही सवाल बना हुआ है? सीटीओ साहब पर सबसे अधिक अनियमित भुगतान करने का आरोप स्वास्थ्य विभाग के ठेकेदारों को करने का लग रहा है। बिल बनाकर प्रस्तुत करने वाले सीएमओ, एसआईसी और सीएमएस पर भी उतना आरोप लग रहा है, जितना सीटीओ पर। कहा जा रहा है, कि ठेकेदार की मिली भगत से अब तक दो से ढ़ाई करोड़ का भुगतान हो चुका है। सीटीओ पर यह भी आरोप लग रहा है, कि इनके द्वारा अभी तक किसी भी ठेकेदार और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के खिलाफ न तो अनियमित भुगतान कराने के मामले में एफआईआर दर्ज कावाया गया, और न रिकवरी ही करवाई गई, इससे स्पष्ट होता है, कि जो भी अनियमित तरीके से भुगतान हुआ, वह सीटीओ की जानकारी में हुआ। क्यों हुआ यह लिखने की नहीं बल्कि समझने की बात है? सबसे बड़ा सवाल सीटीओ पर यह उठ रहा है, कि क्यों यह ठेकेदारों का भुगतान साल के अंतिम माह मार्च के आखिरी दिनों में करतें? ऐसा इस लिए कर रहे हैं, ताकि न तो कोई जांच हो सके और न कोई शिकायत। जबकि बजट बहुत पहले आ जाता है। चूंकि अधिकांश भुगतान बिना कोई काम कराए किया जाता है, इस लिए मार्च का अंतिम दिन चुना जाता है। कहने का मतलब सरकार ने जिस अधिकारी के हाथों में खजाने की चाबी सौंपी है, वही खजाने का दुरुपयोग कर रहा है। एक तरह से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों की मिली भगत से सरकारी खजाने पर डांका डाला जा रहा है।

अनियमित रुप से किए गए भुगतान के इधर के जो मामले सामने आ रहे हैं, वह काफी चौकानें वाले है। नियमानुसार कोटेशन एवं वर्क आर्डर साल भर में किसी एक ही फर्म को दिया जा सकता, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने न सिर्फ एलाइड, रोज, दिवाकर, बाबा, सर्जिकल लखनऊ फर्म को सिविल, दवा, सर्जिकल एवं प्रिटिगं में पिछले दो सालों से कई बार दिया, बल्कि लगभग 15 करोड़ का अनियमित भुगतान भी हुआ। सवाल उठ रहा है, कि क्या सीटीओ साहब को नियम कानून की जानकारी नहीं हैं, अगर नहीं है, तो यह सीटीओ की कुर्सी पर बैठने के लायक नहीं है। जो भुगतान टेंडर के जरिए होना चाहिए, उसे कोटेशन और वर्क आर्डर के जरिए कैसे कर दिया गया? और केैसे बिल बन गया। कोटेशन से प्राप्त बिल की समीक्षा किए बिना भुगतान कर दिया गया। जबकि सीटीओ के पास बजट की प्रति भी उपलब्ध रहती है। सीटीओ साहब अच्छी तरह जानते और समझते हैं, फिर भी अनियमित रुप से भुगतान पर भुगतान किए जा रहे है। क्यों किए जा रहे हैं, और किस लालच में कर रहे हैं, यह सवाल बना हुआ है। किसके दबाव में अनियमित भुगतान कर रहे हैं, यह बहुत बड़ा सवाल है। यह विभाग डीएम के अधीन हैं, और सीटीओ को डीएम के सबसे करीबी और वफादार माना जाता है, अगर ऐसे विभाग में यह सबकुछ चल रहा है, तो यह जांच का विषय है। सीटीओ साहब की सबसे बड़ी खूबी यह है, कि यह उस मामले में भी भुगतान कर दे रहे हैं, जिसके यह जांच अधिकारी हैं, और अभी तक इन्होंने जांच को पूरा नहीं किया, जांच पूरा हुए बिना अगर कोई सीटीओ भुगतान करते हैं, तो सवाल तो उठेगा ही। सीटीओ साहब को अच्छी तरह मालूम था, कि ‘मां काली टेडर्स’, जिसका हैसियत प्रमाण पत्र गोरखपुर से बना और चरित्र प्रमाण-पत्र बस्ती से, नियमानुसार ऐसे फर्म को भुगतान नहीं किया जा सकता हैं, जिस फर्म का हैसियत और चरित्र-प्रमाण अलग-अलग जनपदों के डीएम के द्वारा जारी किया गया हो, फिर भी सीटीओ ने इस फर्म को विधुत का मार्च के अंतिम दिन लगभग तीन करोड़ का भुगतान कर दिया। यह भी नहीं कहा जा सकता है, कि सीटीओ साहब को इस नियम कानून की जानकारी न हो। कहा भी जाता है, कि जिन मामलों में अनियमित भुगतान करना होता है, उसके नियम और कानून के बारे में सीटीओ साहब भूल जाते है। चूंकि विधुत में अधिकांश फर्जी बिल बनता और भुगतान होता, जिला महिला अस्पताल में एक करोड़ का काम  विधुत का नहीं,  फिर भी एक करोड़ का बिल भी बन गया और भुगतान भी हो गया। इसे कहते हैं, बखरा का कमाल। कहने का मतलब बखरा दीजिए और जितना चाहे अनियमित बिल बना कर भुगतान ले लीजिए। यह हैं, उस टेजरी का सच जिस पर सबसे अधिक भरोसा होता है। यहां के बाबू और साहब कर्मचारियों के वेतन पर तो आपत्ति लगाते हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अनियमित बिल पर आपत्ति नहीं लगाते।