बस्ती। सदियों से जिन बाबू साहबों की पहचान गरीबों और मजलूमों की मदद करने की रही हो, अगर वही समाज के गरीब तबकों को सताने लगेंगे और सभ्य समाज और कानून का दुष्मन बन जाएगें तो सवाल उठेगा ही। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि आखिर यह लोग अपराध की ओर क्यों बढ़ रहें? क्यों अपने भविष्य को बर्बाद कर रहे हैं? क्या इन्हें इस बात का जरा सा भी एहसास नहीं कि उनके कृत्यों से गरीब लोगों को कितनी पीड़ा और तकलीफ होती होगी? क्यों यह लोग अपनी पहचान खोते जा रहे हैं? क्यों अपने पुरखों का नाम मिटटी में मिलाते जा रहे है? भगवान ने इन्हें इस लिए सबल नहीं बनाया कि यह निर्बल को सताएं, गरीबों का जीवन स्वर्ग बनाने के बजाए नरक बनाए। परिवार को भय और डर के साए में जीवन जीने पर मजबूर होना पड़े।

खास तौर से यह सवाल थाना लालगंज के ग्राम तेनुआ के उन बाबू साहब यानि पाल साहब लोगों पर उठ रहे हैं, और पूछा जा रहा है, आखिर यह लोग समाज के गरीब तबकों के दुष्मन क्यों और कैसे बनते जा रहे है? हाल ही दो गंभीर घटनाओं में जिस तरह तेनुआ के पाल साहबों का नाम सामने आया, और एफआईआर दर्ज हुआ, उससे पूरे बाबू साहबों की विरादरी को शर्मसार होना पड़ रहा है। आरोप सही है, यह गलत, यह अलग बात हैं, गंभीर बात यह है, कि इस तरह की घटनाओं में बाबू साहबों का नाम सामने आना। किसी दलित या गरीब की इतनी हिम्मत नहीं होगी कि वह बाबू साहबों पर झूठा आरोप लगा सके, जिन दलितों के पास ठीक से खाने की व्यवस्था न हो और जो पहले से ही अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहा हो, क्या उस वर्ग के लोग बाबू साहबों पर झूठा आरोप लगा सकते हैं? और मुकदमा दर्ज करा सकते है? कहा भी जाता है, कि किसी गरीब को इतना भी मत सताइए कि वह आपके सामने सीना तानकर खड़ा हो सके। बगावत पर उतारु हो जाए। कहना गलत नहीं होगा कि बाबू साहबों का मन और किसी ने नहीं बल्कि नेता और पुलिस वाले बढ़ाते हैं, अगर नेता गलत लोगों की पैरवी करना बंद कर दे और पुलिस पीड़ितों की मुकदमा लिखने लगे, तो किसी भी बाबू साहब या पंडितजी की इतना हिम्मत नहीं पड़ेगी, कि वह कोई अपराध कर सके। अगर फारचूनर से चलने वाला व्यक्ति गरीब लोगों पर अत्याचार करेगा तो उसकी भी सजा उसे ही एक न एक दिन भुगतना ही पड़ेगा, यह प्रकृत्ति का नियम भी है। इस लिए मीडिया भी उन लोगों से अपील करती है, जो निर्बल को सताते हैं। जमाना निर्बल को सताने और उन पर अत्याचार करने का नहीं रहा। बाबू भईया कहकर काम निकालने का रहा है। वह जमाना चला गया, जब कोई दलित, बाबू साहब या फिर पंडितजी के घर से गुजरता था, तो चप्पल को सिर पर उठा कर चलता था।

अब हम आप लोगों को उन दो बड़ी घटनाओं के बारे में बताते हैं, जिनमें तेनुआ के बाबू साहबों यानि पाल साहबों का नाम सामने आया। पहली घटना सात अक्टूबर 26 को घटी, जब थाना लालगंज के ग्राम टुकटुइया निवासी रतन लाल पुत्र बेचू लाल ने तेनुआ के निवासी उमेश पाल पुत्र अज्ञात, निखिल उर्फ आनंदपाल पुत्र विष्वनाथ पाल और मथौली निवासी प्रदीप पाल पुत्र राजाराम पाल पर सूदखोरी का आरोप लगाकर सनसनी फैला दिया, पहली बार तेनुआ और मथौली के बाबू साहबों पर सूदखोरी का आरोप लगा। इन सभी पर दस फीसद के दर से माह में सूद पर पैसा देने का आरोप लगा, यानि एक साल में 120 फीसद सूद देना पड़ता। आरोप लगाया गया, कि आठ लाख के बदले 14 लाख दिया, फिर भी 10 लाख और मांग रहे हैं, मामला थाने तक पहुंचा। मीडिया के जरिए लोगों को तेनुआ के सूदखोंरों के बारे में पता चला, तेनुआ के बाबू साहबों की खूब बदनामी हुई। उसके बाद दिल को दहला देने वाला घटना सामने आया। यह घटना है, तो 18 मई 26 की है, लेकिन एफआईआर तीन नवंबर 26 को दर्ज हुआ, और वह भी न्यायालय के आदेश पर। इन्द्रमोहन पुत्र सियाराम निवासी बारीघाट थाना लालगंज ने ग्राम नेतुआ के अभिषेक पाल पुत्र पप्पू पाल, रत्नेश पाल उर्फ अंशु पुत्र राजन पाल, प्रभात पाल उर्फ सूरज पाल पुत्र विश्वजीत पाल, आलोक पाल पुत्र पप्पू पाल एवं विनय पाल पुत्र बब्लू पाल के खिलाफ एससीएसटी और लूट सहित अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करवाया है। आरोप में कितनी सच्चाई हैं, इसका पता तो पुलिसिया जांच के बाद ही पता चलेगा। बहरहाल, जो मुकदमा दर्ज हुआ। अगर वह सही है, तो नितांत निंदनीय और मानवता को तार-तार करने वाला है। इस घटना की जानकारी होने के बाद लोगों को लगा कि आज भी सामांतों का राज हैं, जिसमें एक दलित के साथ कुछ भी किया जा सकता है, उसे नंगा करके कील लगे बेंत से बेरहमी से मारा जा सकता है, बेहोशी की हालत में छोड़ा जा सकता हैं, मोबाइल और चार हजार रुपया छीन लिया जा सकता हैं, मोटरसाइकिल को क्षतिग्रस्त करके उसे गढ़ढे में गिरा दिया जा सकता है। जातिसूचक गांलियां दी जा सकती है। कनपटी पर पिस्टल सटाया जा सकता है। इन दोनों घटनाओं को देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि बाबू साहबों ने जो किया वह सही किया, मीडिया में आने के बाद इसकी भी पहले वाली घटना की तरह खूब निंदा हुई।