बस्ती। आज के साहबों ने अपने स्तर को इतना नीचे गिरा दिया है, कि चाहकर भी उठ नहीं सकते। यही कारण है, कि आज बड़े से बड़े अधिकारियों का जनता वह मान और सम्मान नहीं देती, जिसके वे हकदार होतें है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि अगर किसी साहब का अर्दली और पेशकार साहब के नाम पर हक में फैसला करने के लिए पैसा लेता है, तो साहब सबसे पहले उस अर्दली और पेशकार की नजर में गिरेगें, जिसके जरिए पैसे लिया, उसके बाद उस व्यक्ति की नजर में गिरेगें, जिनसे पैसा लिया। अंदाजा लगाइए कि अगर कोई साहब इतने लोगों की नजर में गिरेगें तो क्या वह उठ पाएगें? क्या वह अर्दली और पेषकार से नजरें मिला पाएगें? क्या अर्दली और पेशकार के खिलाफ कार्रवाई कर पाएगें? ऐसे साहबों का सबसे अधिक अपमान उनके घर में होता, बेटा-बेटी भी सोचेगा कि उसके पापा तो चोर है। अगर कोई बाप अपने बेटे की नजर में चोर हो जाए तो समझ लेना चाहिए, कि दुनिया में कुछ भी नहीं बचा। इतना कड़वा सच इस लिए कहा जा रहा है, कि पैसे के पीछे मत भागिए। वरना यही पैसा एक दिन आप को रुसवा कर देगा। न्यायधीश की कुर्सी की इज्जत करिए।
रही बात राजस्व और चकबंदी न्यायालयों में न्याय बिकने की तो यह पुरानी परम्परा है। इन दोनों विभागों के न्यायालयों में उसी के पक्ष में अधिकांश इच्छित फैसले होते हैं, जो अधिक बोली लगाता है। यानि अगर कोई सबल हैं, तो उसके लिए कोई भी चीज कठिन नहीं हैं, कठिन तो उन लोगों के लिए हैं, जिनके पास इतने पैसे नहीं होते कि चप्पल घिसने के बाद दूसरा खरीद सके। इसके बाद भी उसे साहब की ओर से न्याय नहीं मिलता, न्याय पाने की आस में न जाने कितनों की सांसें उखड़ चुकी है। ऐसा है, हमारा राजस्व और चकबंदी का न्यायालय। ऐसे में कोई कीर्तिप्रकाश भारती जैसे अधिकारी से भी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती, एक बार चकबंदी अधिकारियों ने हड़ताल कर दिया, उस हड़ताल में तत्कालीन एसओसी पांडेयजी भी शामिल थे, डीएम थे सौरभ बाबू, जब मीडिया उनसे मिलने गई, और पूछा सर इतने दिन से यह लोग हड़ताल पर बैठे, क्यों नहीं हड़ताल समाप्त करवा देते, कहने लगे कि यह लोग जितने दिन तक हड़ताल पर रहेंगें कम से कम उतने दिन भ्रष्टाचार तो नहीं होगा। यह है, इस विभाग के अधिकारियों के बारे में एक डीएम की राय। इस विभाग को काजल की कोठरी भी कहा जाता हैं, कीर्ति प्रकाश भारती जैसे न जाने कितने डीडीसी ऐसे हुए जो काजल की कोठरी में प्रवेश करते ही उनके दामन पर का दाग लग चुका है। एक डीडीसी बाजपेई रहें, जो यह कहते थे, कि जब हम्हंे सही काम करने के लिए पैसे मिलते हैं, तो फिर गलत क्यों करें? चकबंदी के इतिहास में बस्ती में ऐसा डीडीसी न कोई आया और न कोई आएगा। जब तक रहें, शान और इज्जत के साथ रहें, यहां से जाने के बाद लोग इन्हें याद करते रहें। इन्होंने कभी उन गरीब काष्तकारों से पैसा नहीं लिया बल्कि अगर किसी के पास किराए या फिर भोजन के लिए पैसा नहीं होता था, तो उसे अपनी जेब से देते थे, पूछते थे, कि खाना खाया कि नहीं, घर वापस जाने के लिए किराया है, कि नहीं? इनके रहते न तो किसी अर्दली की चली और न पेशकार की। चूंकि अधिकारी के साथ यह साहित्यकार भी रहे, इस लिए इनका लगाव मीडिया से अधिक रहा। अगर इनकी तुलना में आज के अधिकारियों को देखा जाए तो खाना और किराया पूछना तो दूर की बात हैं, जेब में जितना है, सब निकाल लेने का प्रयास करते है। जिस अधिकारी से मिलकर फरियादियों को खुश होकर जाना चाहिए, उस अधिकारी से मिलकर उसे रोते हुए जाना पड़ता है। अब तो साहब लोग पैसा भी लेते हैं, और काम भी नहीं करते, मांगने के बाद भी पैसा वापस नहीं करते, जाहिर सी बात हैं, कि अगर को फरियादी किसी अधिकारी से पीड़ित होगा तो वह व्यक्ति अधिकारी का तो भजन गाएगा नहीं। यही काम उस व्यक्ति ने किया, जिससे अर्दली ने काम के बदले 20 हजार लिया था, इसी लिए उसने बातचीत को टेप किया, और उसे वायरल कर दिया। इस व्यक्ति ने अर्दली के मुंह से कहलवा लिया कि उसने पैसा सीआरओ साहब को दिया। अधिकारियों को ईमानदारी और बेईमानी का पाठ कोई नहीं पढ़ता, बल्कि अधिकारी पढ़कर आता है। इसी लिए कहा जाता है, कि ईमानदारी कोई बाजार में बिकने वाली चीज नहीं, बल्कि यह तो विरासत में मिलती है। कोई मां-बाप अपने बच्चे को बेइमान नहीं बनाता, बल्कि बच्चा खुद बेईमान और ईमानदार बनता है। जब भी कोई बेटा पहली बार नौकरी पर जाता है, तो उसके मां-बाप यह कह कर बिदा करते हैं, कि बेटा ईमानदारी और मेहनत से काम करना, ऐसा कोई भी काम मत करना जिसके चलते मां-बाप का सिर नीचा हो। आज भी अधिकांष मां-बाप अपने बच्चों को वही सीखाते हैं, जो पहले सिखाते थे, मां-बाप तो पहले जैसे ही हैं, लेकिन बेटे बदलते जा रहे है। इनमें कोई बेईमान बनता तो कोई बेईमान।
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