बस्ती। आज से ठीक एक माह पहले जब डीएम मैडम ने एडीएम से बीडीए के सचिव और स्थानीय निकाय का प्रभार हटाकर सीआरओ को इस विष्वास के साथ सौंपा था, कि कीर्ति प्रकाश भारती कभी उनके विष्वास को नहीं तोड़ेगें, क्यों कि जिस तरह मैडम ने एतिहासिक निर्णय लिया था, उसे देखते हुए लग रहा था, कि मैडम की कसौटी पर सीआरओ खरा उतरेगें। लेकिन मैडम को क्या मालूम था, कि जिस पर सबसे अधिक भरोसा किया, वही भरोसे को चकनाचूर कर देगा। सीआरओ, मैडम का विष्वास एक माह तक भी कायम नहीं रख सके। जिस दिन डीएम ने सीआरओ के पावर को बढ़ाने का निर्णय लिया था, उसी दिन ‘बदलने’ की ‘कूबत’ हो तो ‘व्यवस्था’ बदलिए, अधिकारी ‘नहीं’। नाम के शीर्षक से एक खबर प्रकाशित हुई थी, आज वह खबर लोगों को सही लग रहा होगा। कुछ लोगों को मानना हैं, कि सीआरओ के साथ साजिष हुई, जिसका समर्थन सोशल मीडिया पर इनके चाहने वालों ने किया। तभी तो कीर्तिप्रकाश भारती ने पोस्ट किया कि ‘हम तो गर्दिशो से घिरे हैं, संवर जाएगें, लेकिन ये जो नजरों से गिरे हैं, वे किधर जाएगें’ इस पोस्ट में सीआरओ साहब का दर्द झलकता है। अगर वाकई इनके साथ साजिश हुई तो उसे भी साजिश का शिकार होने के लिए तैयार रहना होगा, जिसने साजिश को अंजाम दिया। क्यों कि जिनके घर शीशे के होते वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकते। क्यों कि हमाम में सभी नगें होते हैं।
मीडिया और जिले की जनता का आज भी मानना है, कि अधिकारी बदलने से कुछ नहीं होगा, जब तक दूशित व्यवस्था नहीं बदलेगी। चूंकि आज के आईएएस अधिकारियों में इतना अहम भरा होता है, कि उन्हें लगता है, कि उनसे महान, बुद्विमान और ज्ञाता पूरी दुनिया में और कोई नहीं। सच तो यह है, कि अधिकारी इगो का त्याग ही नहीं कर पा रहे हैं, और आईएएस के होने के एहसास से बाहर ही नहीं निकल पा रहे है। इसी इगो के चलते चाहें वह कमिष्नर हों, चाहें डीएम हों, या फिर चाहें सीडीओ हों, कोई आइडिएल नहीं बन पाता, और जब यह आईडिएल नहीं बनेगें तो मंडल और जिला कैसे आइडिएल बनेगा? पहले के अधिकारी मीडिया रिपोर्ट को संज्ञान में लेते थे, लेकिन आज के अधिकारी संज्ञान में लेना तो दूर की बात मीडिया को देखना तक नहीं चाहते। कहना गलत नहीं होगा कि पहले के अधिकारी जिले में आते ही सबसे पहले मीडिया से रुबरु होते थे, क्यों कि उन्हें मालूम रहता था, कि मीडिया ही एक ऐसा वर्ग हैं, जो हम्हें सच का आइना दिखा सकती है। आज का अधिकारी उस मीडिया के लोगों से मिलना पसंद नहीं करते, जो व्यवस्था के खिलाफ हैमर करते रहते है। अधिकारी दूषित व्यवस्था को सुधारने के बजाए उस रिपोर्टर को सुधारने लगते हैं, जिसने भ्रष्टाचार का उजागर किया, ऐसा ही कुछ उस पत्रकार ‘अनुज प्रताप सिंह’ के साथ हो रहा, जिसने सीआरओ/प्रभारी डीडीसी के अर्दली के भ्रष्टाचार को उजागर किया। क्यों भ्रष्टाचार हुआ, इसकी तह में जाने के बजाए, अधिकारी, पत्रकार की कमियों को खंगालने में समय बर्बाद कर रहें हैं। इसके लिए जहां पत्रकार को धन्यवाद मिलना चाहिए, वहीं उसका इतिहास खंगाला जा रहा है। इसी लिए बार-बार कहा जा रहा है, कि अधिकारी बदलने या फिर पत्रकार को ठीक करने से व्यवस्था न तो ठीक होने वाली और न बदलने वाली है। अगर वाकई कोई अधिकारी व्यवस्था बदलने की इच्छा रखता है, तो उसे कोई रोक नहीं सकता। ऐसे अधिकारियों का मीडिया भी खूब साथ देती है।
आज के अधिकारियों को न जाने क्यों उन्हें मीडिया रिपोर्ट झूठी और बकवास लगती हैं, झूठी और बकवास इस लिए लगती हैं, क्यों कि मीडिया सच को दिखाना और बताना चाहती है, जो साहब लोग नहीं देखना चाहते। मीडिया बार-बार अधिकारियों से कहती आ रही है, कि आप लोग भलें ही मीडिया रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई न करें, लेकिन कम से कम उसे संज्ञान में लेकर उसकी जांच तो करा लें, हो सकता है, कि मीडिया रिपोर्ट सही हो। पहले भी कहा था, और फिर कह रहा हूं, कि जब तक अधिकारी अपने इगो से बाहर नहीं आएगें, तब तक सीआरओ जैसे लोग डीएम के भरोसे को तोड़ते रहेगें। अगर किसी अधिकारी का निलंबित अर्दली जय सिंह यह कहे कि साहब से इस तरह का काम वह कई बार करा चुका तो उस साहब की ईमानदारी और बेईमानी के बारे उच्चाधिकारियों को पुनः विचार करना चाहिए। अर्दली का यह कहना कि उसने सीआरओ साहब को इच्छित फैसला करने के लिए 50 हजार दिया, और यह बात वह सीआरओ के सामने भी कह सकता है, से व्याप्त भ्रष्टाचार का पता चलता है। इसी लिए बार-बार कहा जा रहा है, कि अधिकारियों को पत्रकारों को सुधारने के बजाए अपने अधीनस्थों को सुधारने की अधिक आवष्यकता है। जिले की जनता और मीडिया की ओर से पहले ही यह आषंका व्यक्त की जा चुकी है, कि जो जिम्मेदारी सीआरओ साहब को दह गई, क्या उसमें वह उसमें सफल हो भी पाएगें कि नहीं? अगर अधिकारी बदलने से ही व्यवस्था बदल जाती तो अब तक न जाने कितने कमिष्नर, डीएम, सीडीओ और एडीएम बदले जा चुके है।
बाक्स में
पैसा ‘वापस’ नहीं हुआ, इस लिए हुई ‘सीआरओ’ की ‘बदनामी’
आज के दौर में उन साहबों को ईमानदार माना जाता है, जो पैसा लेकर काम कर देते है। बेईमान तो उन साहबों को माना और कहा जाता है, जो पैसा भी लेते हैं, और काम भी नहीं करते, और पैसा भी वापस नहीं करते। आरोप हैं, कि अगर सीआरओ/तत्कालीन प्रभारी डीडीसी कीर्ति प्रकाश भारती बकौल अर्दली 20 हजार लेकर काम कर दिए होते तो वह बदनामी से बच जाते, और साजिश करने वाले सॅफल भी नहीं होते। अगर पैसा भी वापस कर दिए होते तो भी कम से कम इज्जत बच जाती। क्यों कि आडियो में अर्दली को पैसा देने वाला काष्तकार यह रहा है, कि अरे अब तो साहब भी बदल गएं हैं, पैसा तो वापस दिला दो। वह साहब ही क्या जो पैसा लेकर वापस कर दे। चंूकि ठहरे साहब, खुद तो पैसा लेते नहीं, इस लिए जब इस तरह का मामला सामने आता है, तो कह देते हैं, कि हम्हें नहीं मालूम अर्दली से पूछिए। अधिकतर अधिकारी ऐसा यह कर आरोप से बरी होना चाहते हैं। डीडीसी न्यायालय में यह पहली बार नहीं हुआ, जब न्याय बिकने का मामला सामने आया। चकबंदी विभाग में फैसले बोली लगाकर बेची जाती है। अब चूंकि डीडीसी का प्रभार एडीएम साहब के पास है, तो यह भी आरोप से नहीं बच सकते, बचना है, तो पैसा लेकर काम कर देना होगा, वरना एडीएम साहब पर भी वही आरोप लगेगा जो सीआरओ पर आज लग रहा है।
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