बस्ती। जिस तरह मोदीजी के बारे में कहा जाता है, कि मोदी हैं, तो सबकुछ संभव है। ठीक उसी तरह सीएमओ डा. राजीव निगम के बारे में कहा जाता है, कि निगमजी है, तो भ्रष्टाचार भी है, और भ्रष्टाचारी भी है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि दिवाकर कांस्टक्षन एंड सप्लार्य, एलाइड इंटरप्राजेज, रोज कांस्टक्षन और रवींद्र सिंह के पास न तो हैसियत प्रमाण-पत्र है, न चरित्र-प्रमाण और न इनका पजींयन ही है, फिर इन चारों को जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और टीबी अस्पताल के टेंडर बाबू प्रेम बहादुर सिंह, आकाश पांडेय और अशोक कुमार सिंह सैंथवार एवं अनिल चौधरी फार्मासिस्ट और सीएमओ एवं दोनों अस्पतालों के सीएमएस मिलकर सालाना कोटेषन के नाम पर एक करोड़ से अधिक का काम एक बार नहीं बल्कि कई बार दिया, जबकि साल में कोटेषन पर एक फर्म को एक बार ही सिविल कार्य करने का आर्डर दिया जा सकता है। जबकि इसका टेंडर मां लक्ष्मी के नाम हो चुका है, उसे काम न देकर ऐसे फर्मो को काम दिया गया, जिसने 30 से 40 फीसद कमीशन दिया। चूंकि एक करोड़ में से मुस्किल से 20-25 फीसद ही कार्य होता हैं, यानि अगर चारों फर्मो ने मिलकर एक करोड़ का काम किया तो 25 लाख खर्चा हुआ, और 75 लाख बचा, इसमें साढ़े सात लाख सीएमओ एवं सीएमएस को मिल गया, बचा 67 लाख, इनमें आधा ठेकेदार ने ले लिया और आधे में तीनों अस्पतालों के टेंडर बाबू ने ले लिया। अगर यही काम अनुबंधित मां लक्ष्मी फर्म को दिया जाता, जिसे नियमानुसार देना चाहिए था, तो कुल 10 फीसद कमीषन मिलता, वह भी सीएमओ और सीएमएस को, लेकिन चारों फर्मो के ठेकेदार दीवानचंद्र पटेल, करामत और करामत के भाई षफाक एवं रवींद्र सिंह 40-40 फीसद कमीसझन दे रहे है। कमीशन के चक्कर में यह भ्रष्टाचारी अपनी नौकरी तक को दांव पर लगाने को तैयार हो जाते है। टेंडर बाबू लोग अनियमित रुप से काम देने के लिए कोटेशन के नियमों का पालन तक नहीं करते, नियमानुसार फर्म के पास हैसियत और चरित्र प्रमाण पत्र के साथ पंजीयन भी होना चाहिए, और कोटेशन के 15 दिन पहले इसका नोटिस डीएम, सीएमओ और पीडब्लूडी कार्यालय पर चस्पा होना चाहिए। कमेटी गठित होती है, लेकिन यह लोग कहीं भी चस्पा नहीं करते, कमेटी के सदस्यों को उनका हिस्सा दे दिया जाता है। क्यों कि तीनों फर्म आपस में काम बांट लेते हैं। खासबात यह है, कि बिल का सत्यापन जेई नहीं बल्कि टेंडर बाबू करते है। रही बात सीटीओ के अनियमित भुगतान करने की तो इन्हें अगर इनका चार फीसद हिस्सा मिल गया, तो यह पूरे जिले को बेच दें। इसे लेकर इनकी जांच भी चल रही है। अब जरा फर्जीवाड़ा देखिए, टेंडर मां लक्ष्मी के नाम हुआ और इसकी वैधता 31 मार्च 26 तक है। नियमानुसार जिले के अगर किसी भी अस्पताल में सिविल का कार्य होता है, वह कार्य मां लक्ष्मी को मिलना चाहिए, मगर मां लक्ष्मी को कार्य न देकर चारों अनियमित फर्म को आर्डर कोटेषन पर दे दिया जाता है। मां लक्ष्मी को काम इस लिए नहीं दिया, क्यों कि वह कमीषन कम देता है। जिला अस्पताल के टेंडर बाबू प्रेम बहादुर सिंह ने अंबेडकरनगर के भतीजे रवींद्र सिंह को अनियमित से तीन फर्जी बिल के जरिए दो लाख 23 हजार 325 रुपये का भुगतान किया, और यह भुगतान 13 फरवरी 26 को 52240 रुपया, 11 दिसंबर 25 को 97726 रुपया और 17 जनवरी 26 को 73359 रुपये का भुगतान किया। इसी तरह दीवानचंद्र पटेल के फर्म दीवाकर कांस्टक्षन एंड सप्लार्य को चार बिलों के जरिए तीन लाख 74 हजार 052 रुपये का भुगतान किया, यह भुगतान 16 सिंतबर 25 को 88877 रुपया, 27 अक्टूबर 25 को 96770 रुपया, 31 फार्च 25 को 90869 रुपया और 16 सितंबर 25 को 97536 रुपया का भुगतान हुआ। अब जरा अंदाजा लगाइए कि वित्तीय साल के अंतिम यानि 31 मार्च 25 को दिवाकर कांस्टक्षन एंड सप्लार्य को 90869 रुपये का भुगतान हुआ।
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