बस्ती। योगीजी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है, कि 2027 का चुनाव कैसे और किन कंडिडेट के सहारे जीता जाए? क्यों कि यह चुनाव न सिर्फ योगीजी के लिए बल्कि भाजपा के लिए भी अति महत्वपूर्ण हैं। बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि योगीजी यह चुनाव संगठन के सहयोग से जीतना चाहेंगे हैं, या फिर अपनी रणनीति के सहारे। जिस तरह योगीजी की ओर से जो संदेश दिया जा रहा है, उससे तो यही लगता है, कि योगीजी को हर हाल में जीताउ कंडिडेट चाहिए। अब जीताउ कंडिडेट के लिए कौन सा मानक होगा? इसकी व्याख्या अभी नहीं की गई। अगर मानक रोबिन हुड वाली छवि जैसा होगा, तो इसके दायरे में बहुत कम लोग आ पाएगें, क्यों कि राबिन हुड जैसी छवि वाला वही हो सकता है, जिसके पास पैसा होगा, और पैसा उसी के पास होता है, जिनकी छवि अपराधी और भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति की होती। कहना गलत नहीं होगा कि अधिकतर यही लोग अपने आपको आज के समाज में स्थापित कर पाते है। सिद्वांतवादी कार्यकर्त्ता या नेता ईमानदार होने के कारण पैसे से कमजोर हो जाते हैं, और पैसे से कमजोर लोगों को न तो पार्टी टिकट देती है, और न ही इन्हें जीताउ कंडिडेट ही मानती है, लेकिन यह टिकाउ अवष्य होते हैं। लेकिन पार्टी को तो टिकाउ नहीं बल्कि जीताऊ चाहिए। आज के परिवेष में बहुत कम ऐसे सांसद और विधायक होगें, जो बिना दल बदले निष्ठा से एक ही दल में रहकर बराबर चुनाव जीत रहे है। ऐसे नेताओं में योगीजी के साथ प्रतिपक्ष नेता माता प्रसाद पांडेय और भाजपा के प्रदेष अध्यक्ष पंकज चौधरी का नाम प्रमुखता लिया जा रहा है।

जीताऊ कंडिडेट ही अगर टिकट देने का मापदंड हो जाएगा, तो राजनीति का अपराधीकरण और भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाएगा। देखा जाए तो अपराधी किस्म और माफिया के लोग चाहें जिस दल से चुनाव लड़ते हैं, वही जीतते है। ऐसे लोगों के सामने स्वच्छ छवि वाले कंडिडेट कहीं टिक नहीं पाते, जमानत बचाना मुस्किल हो जाता है। भाजपा के लोग आउबाउ हो गएं हैं, उनकी समझ में ही नहीं आ रहा है, कि संगठन बड़ा होता या सरकार। पुराने भाजपाई कहते हैं, कि कार्यकर्त्ता ही पार्टी की रीढ़ होता है, लेकिन सूबे के मुखिया कार्यकर्त्ता की नहीं बल्कि जीताउ कंडिडेट की बाते कर रहे है। जीताउ कंडिडेट का फारमूला क्या होगा, पहले इसे निर्धारित करना होगा। क्यों कि लोग उसी हिसाब से अपने आप को तैयार करें। कहा भी जाता है, कि अगर पार्टी के रीढ़ को सहेज कर रखना है, तो जीताउ कंडिडेट के फारमूले पर पुनः विचार करना होगा, और उन खाटी कार्यकर्त्ताओं को टिकट देना होगा, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी दरी बिछाने और झंडा ढ़ेने में बीता दिया। हालांकि वैसे ही कार्यकर्त्ता के रीढ़ की हडडी कमजोर होती जा रही है। कमजोर हो नहीं रही है, बल्कि उन्हें कमजोर किया जा रहा है, जो किसी भी दल के लिए घातक होगा। यह सही है, कि हर दल सरकार बनाना चाहती है, और सरकार तभी बनेगी, जब सांसद और विधायक जीतेगें। इसी सरकार बनाने और जीतने के चक्कर में दलंे अपने कार्यकर्त्ताओं और वफादार नेताओं को खोती जा रही है। अगर ऐसा ही चलता रहा, तो एक दिन एक भी कार्यकर्त्ता के घर का पता नहीं मिलेगा, और न एक भी वफादार और निष्ठावान नेता ही मिलेगें। इसी लिए मीडिया बार-बार कह रही है, कि जीतने की चाहत में खाटी कार्यकर्त्ताओं की बलि मत चढ़ाइए। पार्टियां अच्छी तरह जानती है, कि जो जीताउ होता है, वह टिकाऊ नहीं होता, बल्कि बिकाउ होता है। ऐसा न जाने कितनी बार देखा और सुना जा चुका है। ऐसा लगता है, कि मानो किसी दल को अपने कार्यकर्त्ताओं और नेताओं पर भरोसा ही नहीं रह गया। जीताउ कंडिडेट का फारमूला अपनाने वाली पार्टियां कभी सफल नहीं रही। अगर सूबे में 10 साल सरकार चलाने के बाद भी भाजपा के नेताओं को जीताऊ कंडिडेट का फारमूला अपनाना पड़े तो समझ लेना चाहिए, कि भाजपा सरकार चलाने और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में विफल रही। आज की तारीख में कोई भी सांसद या विधायक दावे के साथ नहीं कह सकता कि वह विकास के नाम पर चुनाव जीतने जा रहे। जब सरकार तक यह दावा नहीं कर सकती तो विधायक और सांसद क्या करेंगें?