बस्ती। एक तरफ जीवन रक्षक दवाओं के नाम पर हर साल करोड़ों का गोलमाल हो रहा है, और दूसरी तरफ जिले भर के अस्पतालों से दवाएं पिछले कई माह से गायब है। गायब नहीं बल्कि चोरी कर ली गई। अब जरा अंदाजा लगाइए कि सुगर और बीपी की दवाएं भी पीएचसी और सीएचसी में मरीजों को नहीं मिल रही है। मरीजों को अधोमानक और 50 फीसद कमीशन वाली दवांए खरीदनी पड़ रही है, जिसके चलते मरीज को फायदा ही नहीं हो रहा है। सुगर और बीपी के मरीजों की संख्या 50 फीसद से अधिक बताई जाती है। जीवन रक्षक दवाओं को तो छोड़ दीजिए डिस्पोजल सीरींज और वीगो तक अस्पताल से गायब है। मरीजों के खून की जांच इस लिए नहीं हो रही है, क्यों कि अस्पतालों को रिजेंट की आपूर्ति ही नहीं की जा रही है। हैंड ग्लब तक के डाक्टरों को लाले पड़े है। सवाल उठ रहा है, कि जब सरकार हर साल इसके लिए करोड़ों रुपये देती तो फिर अस्पतालों को जीवन रक्षक दवाएं क्यों नहीं मिल रही? आखिर इन दवाओं की चोरी कौन कर और कौन करवा रहा है? बिडंबना यह है, कि डीएम की अध्यक्षता में होने वाली जिला स्वास्थ्य समिति की बैठक में अगर किसी अस्पताल के अधीक्षक ने दवाओं एवं अन्य उपकरणों की कमी का रोना रोकर यह कह दिया कि साहब जब अस्पताल में जीवन रक्षक की दवाएं ही नहीं रहेंगी तो वह लोग सुगर और बीपी के मरीजों का इलाज कैंसे करेगें? उन्हें दवाएं कहां से देगें? ऐसे कहने वाले अधीक्षक को सबलोग निशाने पर ले लेते हैं, उन्हें सबक सिखाने लगते हैं, ताकि अन्य कोई अधीक्षक दवाओं की कमी का रोना न रो सके। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि पिछले दो सालों से सीएमओ जिलेभर के होमयोपैथिक अस्पतालों को दवाएं नहीं उपलब्ध करा पा रहे है। जबकि  धन भी उपलब्ध है। मामला एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह के जरिए दिशा की बैठक में उठाया भी जा चुका हैं, फिर भी आज तक दवाएं उपलब्ध नहीं कराई गई। जबकि बैठक में सीएमओ ने एक सप्ताह में दवाएं उपलब्ध कराने का भरोसा सदन को दिया था। डीएचसी की बैठक में भी डीएम और सीडीओ, सीएमओ से यह नहीं पूछते कि जब बजट उपलब्ध हैं, तो क्यों नहीं होम्योपैथ की दवाएं खरीदी गई। मीडिया जब भी पूछती, तो बताया जाता हैं, खरीद प्रक्रिया में है। आखिर यह प्रक्रिया कब पूरी होगी, यह कोई निर्धारित नहीं कर पा रहा है। इसी तरह पीएचसी और सीएचसी में कोई भी अधिकारी यह निरीक्षण करने नहीं जाता, कि आखिर अस्पतालों में क्यों नहीं जीवन रक्षक दवांए उपलब्ध है। ऐसा लगता हैं, कि मानों किसी भी अधिकारी को मरीजों की कोई चिंता नहीं हैं, जो अधीक्षक चिंता करते हैं, उन्हें देख लेने को कहा जाता है। ईषारा साफ रहता है, कि जो भी उपलब्ध हो, उसी में अस्पताल चलाओं, अगर उपलब्ध नहीं हैं, तो चिल्लाओं मत, चिल्लाओगें तो देख लिया जाएगा। कहना गलत नहीं होगा, कि अगर यह लोग कमीषन के बजाए मरीजों की चिंता करने लगें तो आज सरकार की जयजयकार होने लगें। अनेक अधीक्षक ने बताया कि किस तरह दवाओं के अभाव में अस्पताल को संचालित किया जाता हैं, वही लोग जानते हैं, दवा की चोरी करे कोई और कमीशन खाए कोई और मरीज को लगता हैं, कि डाक्टर कमीशन के चक्कर जानबूझकर बाहर की दवाएं लेने का सुझाव देते है।

अगर किसी रिपोर्टर या अधिकारी को पीएचसी और सीएचसी में उपलब्ध दवाओं के बारे में जानना हो तो वह जिले के किसी भी पीएचसी और सीएचसी में जाकर दवाओं की उपलब्धता को देख सकता है, जाने पर उसे पता चलेगा कि अरे यहां पर सुगर और बीपी की दवा ही कई महीनों से नहीं आ रही है, जबकि सबसे अधिक मरीज यानि 50 फीसद मरीज सुगर और बीपी के ही आते हैं, मरीजों को यह दोनों दवाएं नियमित लेनी पड़ती है। आप को देखकर हैरानी होगी कि खून की जांच करने वाली मशीन तो हैं, लेकिन उसमें उपयोग होने वाला रिजेंट ही नहीं है। बिना रिजेंट के कोई भी जांच नहीं हो सकती है। टेबलेट वी12 इंजेक्षन वी12, आईवी सेट और सीरींज तक नहीं आप को मिलेगा। अब जरा अंदाजा लगाइए कि डाक्टर बिना सीरींज और बिना इजेंक्षन के कैसे मरीजों का इलाज करेगा? मरीज 400 सेट और इंजेक्षन 10-20 दिए जाते हैं, और कहा जाता है, कि जितना मिल रहा उसी में काम चलाओ। सुगर जांच करने वाली किट तक उपलब्ध नहीं कराया जाता है। मान लिया जाए कि दवाएं खरीदने और उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी मेडिकल कारपोरेशन की है, और इसके लिए मंडलीय औषधि भंडार साउंघाट सीएचसी में खुला हुआ हैं, और यह औषधि भंडार एडी हेल्थ के अधीन हैं। लेकिन आईवी सेट, ग्लब्स और डिस्पोजल सीरींज की खरीद और उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी तो सीएमओ की हैं, और सरकार इसके लिए बजट का 20 फीसद यानि लगभग सवा करोड़ का बजट हर साल देती है। कागजों में तो बजट का इस्तेमाल हो जाता, उपकरण खरीद भी लिए जाते हैं, सीएमएसडी स्टोर वाले इसे प्राप्त भी कर लेते हैं, लेकिन अस्पतालों तक नहीं जाता, अगर जाता तो उपलब्ध रहता। सवाल उठ रहा है, कि अगर डीएम, सीडीओ और सीएमओ मिलकर पीएचसी और सीएचसी को दवांए और उपकरण नहीं उपलब्ध करा पा रहे हैं, तो कराएगा कौन? योगीजी को उपलब्ध कराने आएगे नहीं। आजतक डीएम और सीडीओ ने कभी सीएमएसडी स्टोर और मंडलीय औषधि भंडार का निरीक्षण नहीं किया, अगर करते तो कमियां पता चलती है, तब सुधार भी होता। रही बात एडी हेल्थ और सीएमओ के निरीक्षण करने की बात तो यह इस लिए नहीं करते क्यों कि इन्हें अच्छी तरह मालूम रहता हैं, कि सीएमएसडी और मंडलीय औषधि भंडार में कौन सा खेल हो रहा हैं?