बस्ती। क्षेत्र के लोगों को पिछले कई सालों से उनके उन सवालों का जबाव नहीं मिला, जिसमें यह पूछा गया था, कि क्या वाकई कुदरहा के पत्रकारों का जमीर मर चुका? यहां के लोग यह भी जानना चाहते हैं, कि आखिर इनकी क्या मजबूरी है? जिसके चलते इन्हें अपना जमीर बेचना या गिरवी रखना पड़ा? अगर यह लोग इतने ही कमजोर हैं, तो फिर पत्रकारिता क्षेत्र में क्यों कदम रखे? क्यों नहीं चाय और पान की दुकान खोल लिया? यही कारण है, कि पीड़ित भी अब यहां के पत्रकारों को अपना दर्द नहीं सुनाना चाहते है। क्योंकि उन्हें भी पता है यहां के लोग बिकाऊं हो चुके हैं। कभी दो किलो टमाटर पर तो कभी चौकी के लिट्टी पर अपनी कलम गिरवी रख देते हैं। प्रमुख के चाय की तो बात ही अलग है। बस इन्हें तीज त्यौहारी बराबर मिलती रहे। अगर कहीं उक्त सुविधाओं में कमी हुई तो इनका पूरा हुजूम कलम से आग उगलने लगता है। खुद को चौथा स्तभ होने का नाज करते है, लेकिन ब्लाक, चौकी व अस्पताल की सच्चाई लिखने में इनकी कलम सूख जाती है। इन्हें बस माल मिल जाए पूरी खबर की खा जाते हैं। हाल ही में एक बड़ी कार्रवाई को निगल गए। गनीमत रहा कि यह बात किसी विभागीय ने जिले तक पहुंचाने दी।
कुदरहा चौकी इंचार्ज को वायरलेस सेट पर ही एसपी द्वारा निलंबित कर दिया। इस बात की चर्चा पूरे क्षेत्र में हैं, लेकिन किसी ने एक भी लाइन की खबर नहीं लिखी। जब यहां के पत्रकार चौकी पर लिट्टी चोखा खाएंगे तो भला उनके खिलाफ खबर कैसै चालाएं? यदि यह पीड़ितों की सुनते और उनकी मदद ही करते तो लोगों को जिला मुख्यालय तक नहीं आना पड़ता। कुदरहा क्षेत्र में हफ्ताभर पहले एक परिवार की बेटी के साथ छेड़खानी होती है। परिवार के लोग इसकी शिकायत चौकी पर करते हैं। चौकी इंचार्ज महेश शर्मा और पत्रकारों से न्याय की गुहार लगाया। लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई। खुद को पत्रकार कहने वालों ने दो लाइन लिखना तक उचित नहीं समझा। यदि वह लिखे होते तो चौकी इंचार्ज महेश कुमार शर्मा मोटी रकम लेकर मामले को दबा नहीं पातेे। लेकिन शुक्र है, पुलिस अधिक्षक डा. जयवीर सिंह का व क्षेत्राधिकारी रुधौली कुलदीप सिंह यादव का। हताश और निराश पीडिता का परिवार एसपी से मुलाकात कर न्याय का गुहार लगाया। एसपी ने क्षेत्राधिकारी रुधौली को मामले की जांच सौपी। जिसमें शिकायतें सही मिली। पुलिस अधीक्षक ने तत्काल वायरलेस सेट पर ही कुदरहा चौकी इंचार्ज के निलंबन का फरमान जारी कर दिया। इसके बाद भी यहां के पत्रकारों की कलम नहीं चली। अब जरा सोचिए यदि एसपी साहब, पीडिता के परिवार की बात न सुने होते और क्षेत्राधिकारी साहब भी कुदरहा के पत्रकारों कई तरह बिकाऊं होते तो भला न्याय मिल पाता? जब सुबह-शाम चौकी, ब्लाक, अस्पताल के चाय की चुस्की लेंगे तो भला उनके ही खिलाफ कैसे कलम चलाएंगे? इनके अंदर एक तो खासियत है, यह नमक हरामी नहीं करते हैं। बस इन्हें बराबर टाटा का नमक मिलता रहे और समय-समय पर छोटा सा लिफाफा भी। यहां मंहगाई के दौर में दो किलो टमाटर पर भी मान जाते हैं। यह कई छिनैती, छेड़खानी व भ्रष्टाचार की कई खबरें खा चुके हैं। यह कोई नया मामला नहीं था। शर्मा जी भी इनकी कमजोरी पकड़ चुके थे, तभी तो चौकी इंचार्ज अधिकांश मामले चौकी पर ही लिफाफा लेकर निपटा देते थे। गलत सही नहीं बस लिफाफे से मतलब रहता था। जो नहीं मानता था, उसे समझाने के लिए कुछ प्रधान और पत्रकार भाई रहते थे। हर शाम यहां इनकी भीड़ और पार्टी चलती थी। इसका हेडिंग बताना हिंदी में
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