बस्ती। वन विभाग प्रदेश का पहला ऐसा विभाग होगा जहां पर वन रक्षकों और वन दरोगा को ईमानदारी की सजा उन्हें 50 फीसद कमीशन के रुप में देकर भुगतना पड़ता है। अब आप सोच रहे होगें कि जब काम सही किया तो क्यों 50 फीसद  कमीशन देना पड़ता है? और अगर वन दरोगा और वन रक्षक कमीशन देते हैं, तो वह कहां से देते हैं? और वह इसकी भरपाई कहां से करते होगें? जाहिर सी बात है, कि कोई भी अधिकारी या कर्मचारी अपने वेतन से तो कमीशन देगा नहीें, अगर देता है, तो यह माना जाता है, कि या तो वह चोरी कर रहा है, या फिर उसे कार्रवाई का डर हो। इन सारे सवालों का जबाव एक वन दरोगा ने देते हुए कहा कि सही काम करने के बाद भी इस लिए रेजर मैडम को 50 फीसद कमीशन देना पड़ता है, क्यों कि अगर नहीं दिया तो पौध रोपण से लेकर अन्य कार्यो में कोई न कोई कमी निकालकर कार्रवाई कर देती है। इस लिए निलंबन, तबादला और अटैच जैसी कार्रवाई से बचने के लिए उन्हें 50 फीसद कमीशन देना पड़ता है, और उसकी भरपाई हम लोग पौधरोपण में फर्जीवाड़ा करके करते हैं, अगर 2000 पौधरोपण करना होता है, तो उसमें 500 पौध की चोरी कर लेते हैं, जिसे बेच दिया जाता है। कहते हैं, कि बहुत से ऐसे वन रक्षक और वन दरोगा है, जो ईमानदारी से पौधरोपण से लेकर पौध उगाने का काम करना चाहते हैं, लेकिन रेंजर मैडम करने ही नहीं देती। खुद तो भ्रष्टाचार करती ही है, हम लोगों को भी करने को मजबूर करती। अगर एक पौध उगाया जाता है, तो उसकी लागत सात से आठ रुपया और अगर पौधरोपण करना है, कि एक पौध की लागत दस से 15 रुपया, एक हेक्टेअर में 1600 पौध लगते हैं, अगर वन रक्षकों और वन दरोगा का आरोप सही हैं, तो यह फर्जी बिल बाउचर से अधिक गंभीर मामला है, और इसकी जांच होनी चाहिए, ताकि वन दरोगा और वन रक्षक को उसके ईमानदारी की कीमत 50 फीसद कमीषन के रुप में न चुकाना पड़े। जोर देकर दरोगा कहते हैं, कि 50 फीसद कमीषन देने के बाद रेंजर यह देखने नहीं आती कि कितना पौधरोपण हुआ और कितना नहीं हुआ। यह विभाग ईमानदारी से काम करने वालों के लिए नहीं है। जिसने ईमानदारी दिखाई, समझो उसे ईमानदारी की सजा मिली, और अगर किसी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाया या फिर शिकायत किया तो समझो उसकी खैर नहीं, पूरा विभाग ऐसे लोगों के पीछे पड़ जाएगा, और जब कार्रवाई नहीं करवा देगा, तब तक चैन से नहीं बैठते। भ्रष्टाचार के मामले में ऐसी एकता अन्य विभागों में देखने को नहीं मिलती। हरियाली के नाम पर विभाग के लोग अपनी जेबें भरते है। हरियाली छोड़कर इस विभाग के लोग सभी वे काम करते हैं, जिसे आर्थिक अपराध माना जाता है।

‘क्षेत्रफल’ से ‘अधिक’ पौधरोपण, फिर भी ‘हरियाली’ गायब

विभागीय आकड़ों के अनुसार जिले में क्षेत्रफल से अधिक पौधरोपण हो गया, फिर भी हरियाली गायब। आप लोगों को जानकार हैरानी होगी, कि हर साल लगभग 41 लाख पौध लगाए जाते हैं, यानि पिछले पांच साल में दो करोड़ से अधिक पौधरोपण हो गया, अगर यह सभी पौध जिंदा होते तो आज एक पौध लगाने के लिए जगह नहीं मिलती। सवाल उठ रहा है, कि क्या इतने पौध सिर्फ विष्व रिकार्ड बनाने के लिए लगाए गए? कागजों में विभाग ने विष्व रिकार्ड बना दिया, लेकिन क्या वाकई इतने पौधे लगाए गए? विभाग अपनी कमियों को छिपाने के लिए फर्जी पौधरोपण तो करता ही है, फर्जी आकड़ा भी देता है। बस्ती में 25-26 में कुल 40.91 लाख पौध लगाए गए, सरकार को जो रिपोर्ट भेजी गई, इसमें जिंदा पौधों का आकड़ा नहीं दिया गया, बताया जाता है, कि पौधरोपण के सापेक्ष पौधों के जिंदा होने की 100 फीसद आकड़ा भेजा गया। विभाग ने 26-27 में 44.30 लाख पौधरोपण की योजना बनाई है। जिले में हरियाली भले ही न हो, लेकिन डीएफओ, एसडीओ और रेंजर के चेहरे पर हरियाली अवष्य झलक रही है। 100 फीसद जीवित पौधों का फर्जी आकड़ा देना अधिकारियों की मजबूरी मानी जाती है, अगर यह लोग ऐसा नहीं दिखाएगें तो विभाग इनसे रिकवरी कर लेगा।

‘ऐसे’ हटा ‘फर्जीवाड़े’ पर से ‘पर्दा’

एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने दिशा की बैठक में वन विभाग के भ्रष्टाचार का जो साक्ष्य के साथ मुद्वा उठाया, और जिसे बाद में चंद्रेश प्रताप सिंह ने प्रदेश के आला अधिकारियों के पास भेजा, उसके पीछे एक कहानी हैं, बताया जाता हैं, कि इतने बड़े घोटाले पर से पर्दा कभी न हटता अगर कमीशन का हिसाब करने के लिए बिल और बाउचर की छानबीन न होती। परम्परा के अनुसार किसको कितना कमीशन मिलना है, इसके लिए बिल देखा जाता है। इसी बिल के आधार पर कमीशन का निर्धारण होता है। हुआ यह कि जब मार्च में हिसाब के लिए बिल बाउचर छांटने का काम शुरु हुआ तो उसी में रामनगर रेंज के एक दरोगा के हाथ वह बिल लग गया, जिसपर उसका फर्जी हस्ताक्षर था, हालांकि मास्टर मांइड जयषंकर प्रसाद ने 26 लाख के फर्जी बिल को छिपा कर रखा था, उसके बाद बवाल मचा, जयषंकर को बर्खास्त करने की मांग उठी, लेकिन अधिकारियों ने बर्खास्त तो नहीं किया, अलबत्ता दिखाने के उसे मुख्यालय अटैच कर दिया, जबकि आज भी वह सारा काम रामनगर जाकर देखता है।