बस्ती। अगर आप लोगों को याद नहीं तो हम आप को बता दें कि 10 जुलाई 23 को जिले में जिला विकास अधिकारी के रुप में निर्मल द्विवेदी का आगमन हुआ। यह पहले ऐसी डीडीओ रहे, जिन्होंने जिले में कदम रखते ही ऐसा ईमानदारी का एचएमवी रिकार्ड पूरे जिले में बजाया कि जैसे इनके जैसा ईमानदार अधिकारी कोई पैदा ही नहीं हुआ। इनकी सारी ईमानदारी उस समय धरी की धरी रह गई, जब इन्होंने मात्र कुछ ही दिनों में 45 करोड़ का घोटाला कर डाला। इनकी ईमानदारी देख तत्कालीन डीएम प्रियंका निरंजन और सीडीओ जयदेव सीएस ने बहादुरपुर के भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विषेश रुप से बहादुरपुर का प्रभारी बीडीओ बनाकर भेजा था। डीएम और सीडीओ सहित पूरे जिले के लोगों का भ्रम उस समय टूटा जब पता चला कि द्विवेदीजी ने बहादुरपुर जाते ही मनरेगा में 45 करोड़ की परियोजना की स्वीकृति 20 से 25 फीसद कमीशन लेकर अनियमित रुप से दे दी, खूब हंगामा हुआ, मीडियाबाजी भी हुई। जांच भी हुई, दोषी भी पाए गए, लेकिन अधिकारियों ने इनका कैरियर बर्बाद न हो इस लिए इन्हें यह सोचकर बचा लिया, कि यह भविष्य में फिर कभी बहादुरपुर जैसा भ्रष्टाचार नहीं करेगें। लेकिन जिन अधिकारियों की फिदरत ही बेईमानी और चोरी करने की रहती हो, उसे चाहें जितना मौका दीजिए, वे नहीं सुधरते है। इनका तबादला तो रातों हो गया, जिसकी किसी को भनक तक नहीं लगी। चुपके से बोरिया बिस्तर बांधा और नोंटों की अटैची उठाई और रात के अंधेरें में निकल लिए। यह पहले ऐसे अनलकी अधिकारी होगें, जिन्हें बिदाई का भी स्वाद चखने का मौका नहीं मिला। अब इनका आगमन फिर बस्ती में हो गया, और इस बार यह मंडल के संयुक्त विकास आयुक्त के रुप में आए, यानि इनका प्रमोशन जिला स्तर के अधिकारी से मंडल स्तर के अधिकारी के रुप में हुआ। बताते हैं, मंडल में इनकी पोस्टिगं में उन्हीं बहादुरपुर के नकली प्रमुखों का हाथ हैं, जिन्होंने इनके बीडीओ प्रभारी रहते खूब मलाई काटा। जो करोड़ों की फाइलें स्वीकृति हुई, उनमें 80 फीसद नकली प्रमुखों के जरिए हुई, यानि एक तरह से नकली प्रमुखों ने बिचौलिया का काम किया, फाइल स्वीकृति के लिए प्रधान इन्हीं नकली प्रमुखों के पास पहले जाते थे, अगर प्रभारी बीडीओ 25 फीसद कमीशन लेते तो यह 30 से 40 फीसद लेते थे, 10 से 15 फीसद कमीशन सर्विस चार्ज के रुप से यह रख लेते थे। चूंकि सब फर्जीवाड़ा होना था, काम तो होना नहीें था, इस लिए प्रधानों ने भी इतनी भारी कमीशन देने में कोई कुरेज नहीं किया।

बता दें कि द्विवेदीजी का बहादुरपुर प्रेम लगभग चार सालों में भी नहीं छूटा। आते ही इन्होंने सबसे पहले बहादुरपुर के ग्राम पंचायतों की जांच करना शुरु किया। कहना गलत नहीं होगा, कि बहादुरपुर छोड़कर यह जिले के बाहर तो क्या जिले के अन्य किसी ब्लॉक में जांच करने नहीं गए। जब इसकी याद एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने दिलाई और कहा कि जेडीसी साहब आप सिर्फ बस्ती के जेडीसी नहीं हैं, अन्य दो जिलों के भी है, वहां भी जांच करने जाइए, क्यों सिर्फ बहादुरपुर के प्रधानों और सचिवों की ही जांच कर रहे है। जिन-जिन ग्राम पंचायतों की इन्होंने जांच किया, उनके प्रधानों ने बताया कि साहब जांच के नाम पर एक-एक लाख ले गए। इसकी शिकायत कमिष्नर से भी की गई। यह अब तक बेईली, खलीलपटटी एवं सोनबरसा ग्राम पंचायतों की जांच कर चुके हैं, अब आप सोच रहे होगें कि नकली प्रमुख के ग्राम पंचायत खलीलपटटी क्यों जांच करने गए, यह इस लिए जांच करने गए कि नकली प्रमुख और खलीलपटटी के प्रधान में नहीं जमती। प्रधानों की माने तो यह अब तक तीन ग्राम पंचायतों की जांच में तीन लाख की वसूली कर चुके है। तीन ग्राम पंचायतों की जांच के बाद इन्होंने इसी ब्लॉक के ग्राम पंचायत फूलपुर, मटेरा, कम्हरिया, हथिया प्रथम एवं हथिया द्वितीय की जांच करने का कार्यक्रम बनाया है। बीडीओ ने उक्त ग्राम पंचायत के सचिवों से तीन प्रतियों में बुकलेट तैयार कर 18 मार्च 26 से पहले हर हाल में जमा करने को निर्देष/आदेश जारी किया है।

चूंकि द्विवेदीजी को बहादुरपुर के ग्राम पंचायतों के भ्रष्टाचार के बारे में अच्छी तरह मालूम हैं, प्रधानों का कहना है, कि इसी लिए उन्हीं ग्राम पंचायतों को निशाना बनाया जा रहा है, और यह निशाना जांच और निरीक्षण के नाम पर धन उगाही के लिए बनाया जा रहा है। हो सकता है, कि इसी बहाने नकली प्रमुख भी अपना निशाना साध रहे हों। पिछले लगभग पांच सालों में ग्राम पंचायतों में मनरेगा और अन्य योजनाओं में लूट के आलावा और कुछ नहीं हुआ। बीडीओ, प्रधान, सचिव, एनआरपी, जेई, रोजगार सेवक, कम्प्यूटर आपरेटर और तकनीकी सहायकों ने इतने सालों में कौन सा गुल खिलाया यह सभी को मालूम है। ऐसे में जांच करने की क्या मंशा हो सकती हैं, यह किसी से छिपी नहीं रही। जांच और निरीक्षण के नाम पर सभी ने भ्रष्ट प्रधानों और सचिवों को यह जानकर लूटा जा रहा है, कि जिसने सरकारी योजना को लूटा, उसे लूटने में कोई बुराई नहीं है। जिले में द्विवेदीजी का कार्यकाल 10 जुलाई 23 से चार नवंबर 23 तक रहा, यानि मात्र चार माह से भी कम समय में अगर कोई अधिकारी करोड़ों की अटैची लेकर जिले से जाता है, तो उसका मन बार-बार बस्ती आने को कहेगा। वैसे भी अव्वल बस्ती में कोई अधिकारी आना नहीं चाहता हैं, आ जाता है, तो जाना नहीं चाहता। एक एडीएम स्तर के अधिकारी कहकर बस्ती से गए कि उन्होंने जितना पैसा बस्ती में बनाया, उतना पूरी जिंदगी में नहीं बनाया, ऐसा हैं, हमारा बस्ती। भले ही चाहे जिले का विकास हो या न हो, लेकिन अधिकारियों और नेताओं का अवष्य होता है। ऐसा लगता है, कि मानो द्विवेदीजी अधूरे सपने को पूरा करने के लिए बस्ती आएं हैं, और बहादुरपुर को निशाना बना रहे है।