बस्ती। जो नगर पंचायतें अनियमितता की शिकायत करने वालों को देख लेने और परिणाम भुगतने जैसी धमकी देते हैं, उस नगर पंचायत और उसके संचालक को वहां की जनता कमजोर और डरपोक मानती है। जो नगर पंचायतें शिकायतों का स्वागत और उसका निस्तारण करने के बजाए अगर शिकायतों को ही दबाने और शिकायतकर्त्ता को ही देख लेने की बातें करती है, तो वह नगर पंचायत कभी आदर्श नहीं बन सकता, भले ही सरकार ने उसे आदर्श नगर पंचायत के रुप में विकसित करने के लिए दो-तीन करोड़ दिया हो, लेकिन जब तक नगर पंचायतें क्षेत्र की जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगीं, तब तक न तो नगर पंचायतें और न उसे संचालित करने वाले ही आदर्श बन सकते है। जिस तरह चुनाव प्रचार के दौरान चेयरमैन के प्रत्याशी विकास की गंगा बहाने और नगर पंचायत को आइडिएल बनाने की बातें कह कर जीताने की अपील करते हैं। जीतने के बाद वह विकास की गंगा बहाने के बजाए भ्रष्टाचार की गंगा बहाने में लग जाते है। ऐसे में अगर कोई सवाल उठाता है, तो कौन सा गलत करता? जिसके वोट पर वह पांच साल तक राज करते हैं, उसी को धमकाते हैं। अगर किसी नगर पंचायत में भ्रष्टाचार की गंगा बहती है, तो इसके लिए सिर्फ चेयरमैन या फिर चेयरमैन की बागडोर संभालने वाले ही जिम्मेदार नहीं होते, बल्कि वे सभासद अधिक जिम्मेदार होते हैं, जो छोटा-मोटा ठेकापटटी और लालच के लिए चुप रहते है। नगर पालिका में तो सभासदों की हलचल कभी-कभार दिखाई भी दे जाती है, लेकिन नगर पंचायतों में तो आवाज तक नहीं सुनाती देती, बाहर सभी चेयरमैन के भ्रष्टाचार की बातें करते हैं, लेकिन अंदर उसका विरोध नहीं करते, जनता की नुमाइदगी करने वाले ही जब खामोष हो जाएगें, तो नगर पंचायत भ्रष्टाचार की आग में जलेगा ही। जो आइडिएल बन सकते थे, और जो अपने नगर पंचायत को आईडिएल बना सकते हैं, वह भी भ्रष्टाचार के बोझ के तले दब गए। ऐसे में जनता आखिर किसे नगर पंचायत की बागडोर सौंपे? यह भी सही है, कि एक बार चेयरमैन बन जाने के बाद उनका वजूद ही समाप्त हो जाता है, पैसा भले ही उनके पास हो जाता है, लेकिन जो मान और सम्मान चेयरमैन बनने के पहले था, वह नहीं रह जाता, लोग कहने लगते हैं, कि देखो नगर पंचायत और नगर पालिका को लूटने वाला जा रहा है। ऐसे लोगों का परिवार भी प्रभावित होता। ऐसे लोगों के बीबी और बच्चों को लोग चोर की नजर से देखते और समझते है। जो लोग भ्रष्टाचार का विरोध करते हैं, उन्हें अगर कुर्सी पर बैठने का मौका मिल जाए है, तो पहले वाले चेयरमैन से अधिक भ्रष्टाचार करने लगते है। कहने का मतलब जिसे मौका मिला, वह बेईमान और जिसे नहीं मिला वह ईमानदार। यही सच है।
हम बात कर रहे थे, नगर पंचायत गायघाट की। यहां के धमेंद्र पासवान ने पीएम को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा तो बहुत कुछ, लेकिन इस पत्र से पता चलता है, कि अगर इस नगर पंचायत के खिलाफ कोई आवाज उठाता है, उसकी खैर नहीं होती, उसे दबाने का प्रयास किया जाता है। अगर बात यही तक रह जाए तो भी ठीक हैं, लेकिन अगर क्राइम करने की बातें की जाए तो वह गलत है। क्षेत्र के हर नागरिक को यह जानने का अधिकार हैं, कि उसके विकास के नाम पर आए धन का उपयोग हुआ या दुरुपयोग। यह अधिकार उन लोगों को भी है, जो शिकायत करने या फिर आरटीआई के तहत जानकारी मांगने पर धमकी देते हैं। धमकी देने के बजाए अगर शिकायतकर्त्ता को संतुष्ट करने का प्रयास करें तो अनेक गंभीर आरोपों से बचा जा सकता है। सवाल उठ रहा है, कि आखिर नगर पंचायतें क्यों आरटीआई का मौका देती है? क्यों नहीं वह अपनी उपलब्धियों को हर साल बुकलेट के जरिए जनता को बताती हैं? बिडंबना यह है, कि लगभग तीन साल बीत गए, लेकिन दस नगर पंचायत और एक नगर पालिका में से किसी ने भी अपनी उपलब्धियों को बुकलेट के जरिए क्षेत्र की जनता को नहीं बताया। सवाल उठ रहा है, कि जब हर साल नगर पंचायतों को राज्य और 15वां वित्त आयोग से करोड़ों रुपया मिलता है, तो उस पैसे का जनता को हिसाब किताब देने में क्या नुकसान? यह भी नहीं कि धन खर्च नहीं हुआ होगा, जब धन खर्च हुआ तो फिर उसे जनता को बताने में क्या परहेज? नगर पंचायतें जब तक अपने क्षेत्र की जनता के प्रति ईमानदार नहीं होंगी, तब तक बेईमानी और चोरी का आरोप लगता रहेगा। अगर किसी नगर पंचायत की जनता को पीएम को यह लिखना पड़े कि अगर उसे या फिर उसके परिवार को कुछ हो गया तो नगर पंचायत के चेयरमैन से लेकर उसे चलाने वाले और उसके भाई जिम्मेदार होगें, तो समझ लेना चाहिए, वह नगर पंचायत अपने मकसद में कामयाब नहीं है। अगर कोई चेयरमैन या नगर पंचायत का संचालन करने वाला यह सोचता है, कि उसका तो सबकुछ नगर पंचायत ही है, तो वह गलत सोचता है, पांच साल के बाद उसे फिर उन्हीं लोगों के बीच जाना पड़ सकता, जहां पर वह हाथ जोड़कर वोट मांगने गए थे। नेताओं का जनता का एहसान कभी नहीं भूलना चाहिए, जिसने भूला उसका हर्ष पूर्व सांसद और चार हारे हुए एमएलए की तरह हो जाएगा। जिस भी नेता ने पद और कुर्सी का सम्मान नहीं किया, उस नेता का सम्मान कुर्सी भी नहीं करती। अगर नगर पंचायत गायघाट के लोग अपने ही चेयरमैन और बागडोर संभालने वालों से असुरक्षित महसूस कर रहें हैं, तो उस नगर पंचायत के जिम्मेदारों को खुद की और नगर पंचायत के कामकाज की समीक्षा करनी चाहिए।
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