बस्ती। पीओ सीएल लैब के पार्टनर की संख्या अब तीन हो गई है। फार्मासिस्ट शैलेंद्र राय तो पार्टनर थे ही जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डा. अनिल कुमार और हर्रैया महिला अस्पताल की सीएमएस डा. सुषमा जायसवाल भी पार्टनर बन गई है। प्रदेश का पहला ऐसा जिला होगा, जहां के दो अस्पतालों में एक नहीं बल्कि दो-दो लैब संचालित हो रहें है। एक पीओ सिटी और दूसरा पीओ सीएल लैब। इनमें पीओ सिटी का तो रिजेंट खरीद का दर अनुबंध गठित हैं, लेकिन पीओ सीएल का नहीं। सवाल उठ रहा है, कि जब पीओ सीएल का दर ही अनुबंध नहीं हैं, तो हर्रैया और बस्ती के सीएमएस कैसे इन्हें करोड़ों रुपये के रिजेंट खरीद का आर्डर दे रहे हैं? और कैसे इन्हें भुगतान हो रहा है? और किस दर पर हो रहा? इससे बड़ा सवाल दोनों सीएमएस ने किसके आदेश पर अपने-अपने अस्पतालों में पीओ सीएल को लैब खोलने की अनुमति दी, जब कि इन दोनों अस्पतालों में पहले से ही पीओ सिटी का लैब संचालित हो रहा है। जब इसकी जानकारी कमिष्नर को दी गई, तो वह भी हैरान रह गए, और कहने लगे कि यह कैसे हो सकता है, कि एक अस्पताल में दो-दो लैब का संचालन हो। इसकी गंभीरता देखते हुए उन्होंने जांच और कार्रवाई करने की बात कही। दोनों अस्पतालों में अनियमित रुप से पीओ सीएल लैब स्थापित करवाने में फार्मासिस्ट का बहुत बड़ा योगदान हैं, इसी लिए तीनों को पीओ सीएल का पार्टनर कहा जाता है। बिना दर अनुबंध के रिजेंट का आर्डर देना और भुगतान करना गबन की श्रेणी में आता है। अगर कहीं जांच हो गई और आरोप साबित हो गया तो दोनों सीएमएस को जमानत कराना पड़ेगा। इतना ही नहीं दोनों सीएमएस ने इस लैब के संचालक षिवम अग्रवाल को अनियमित रुप से फर्नीचर सहित अन्य सामानों का आर्डर और भुगतान दोनों किया। एक दिन पहले भाकियू भदौरिया गुट के मंडल अध्यक्ष उमेष गोस्वामी ने इसकी शिकायत शपथ-पत्र के साथ सीएम से करते हुए जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने को लिखा। शिकायतकर्त्ता का दावा है, कि अगर इसकी निष्पक्ष जांच हो गई, तो दोनों सीएमएस के साथ पीओ सीएल लैब के लोग फंस जाएगें। दोनों सीएमएस को जबाव देते नहीं बनेगा। वैसे भी लगभग नौ करोड़ के अनियमित बजट को लेकर दोनों सीएमएस पर कार्रवाई के दायरे में आते-आते बच गए, अगर यह डिप्टी सीएम और जांच अधिकारियों को मैनेज न किए होते और मोटा लिफाफा न दिए होते तो दोनों का बोरिया कब का बंध गया होता।
पीओ सीएल की ओर से जिला महिला और हर्रैया महिला अस्पताल में लैब की मशीन को दान दिया गया, अगर कोई भी फर्म या व्यक्ति सरकारी अस्पताल में दान करता है, तो उसकी उपयोगिता को देखते हुए संबधित अस्पताल के सीएमएस दान को स्वीकार कर सकते हैं। लेकिन दिए गए दान को कोई व्यक्ति या फर्म से किसी प्रकार का व्यापारिक अनुबंध नहीं किया जा सकता। ध्यान देने वाली बात यह है, कि पीओ सीएल ने दोनों अस्पतालों को पैथालाजी उपकरण को दान में दिया, न कि रिजेंट सप्लाई करने का अनुबंध किया। कहने का मतलब किसी भी दषा में पीओ सीएल को रिजेंट का आर्डर और भुगतान नहीं किया जा सकता। जाहिर सी बात हैं, कि अगर बिना दर अनुबंध के दोनों सीएमएस, पीओ सीएल को करोड़ों रुपये के रिजेंट का आर्डर और भुगतान कर रहें है, तो इसका खामियाजा आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा, क्यों कि यह मामला यहीं पर रुकने वाला नहीं है। खासबात यह है, कि जब षासन के द्वारा रिजेंट खरीद और दर का अनुबंध पीओ सिटी से हैं, तो बिना दर अनुबंध के पीओ सीएल को रिजेंट का आर्डर और भुगतान किस आधार पर किया जा रहा है। अभी तक हर्रैया के सीएमएस 80 लाख का तो बस्ती के सीएमएस दो करोड़ का भुगतान कर चुके हैं। सबसे खास बात यह है, कि दोनों अस्पतालों में एक ही लैब भर के मरीज नहीं आ रहे हैं, हर्रैया के पैथालाजिस्ट ने लिखकर दिया था, कि पीओ सिटी के आलावा अन्य किसी लैब की आवष्यकता ही नहीं तो क्यों सीएमएस ने पीओ सीएल लैब की मषीन को स्वीकार कर लिया? स्वीकार तो कर लिया लेकिन दर अनुबंध नहीं किया। बताया जाता है, दर अनुबंध से अधिक दर पर पीओ सीएल को रिजेंट का आर्डर दिया जा रहा है। यह सवाल इस लिए उठ रहा है, कि जब दर का अनुबंध ही नहीं हैं, तो उसी दर पर आर्डर दिया जाएगा, जिसमें अधिक से अधिक कमीशन मिले। सारा खेल कमीषन को लेकर खेला गया। कमीशन के लिए नौकरी को भी दावं लगाने से नहीं हिचक रहंे है। आनन-फानन में अनियमित रुप से एडी हेल्थ से उदघाटन भी करवा दिया, सब कुछ जानते भी एडी हेल्थ ने अनियमित रुप से उदघाटन कर दिया।
अब जरा अंदाजा लगाइए कि मरीज सरकारी, अस्पताल सरकारी, भवन सरकारी, संसाधन सरकारी और मुनाफा पीओ सीएल का। किसी भी सरकारी अस्पताल में प्राइवेट व्यक्ति को खून टेस्ट करने का अधिकार नहीं हैं, लेकिन पीओ सीएल वाले सीएमएस और फार्मासिस्ट की मिली भगत से अपने आदमियों के द्वारा टेस्ट करवाया जाता हैं, जांच रिपोर्ट में किसी पैथालाजिस्ट का हस्ताक्षर भी नहीं होता, जिसका हस्ताक्षर होना चाहिए, वह मजे कर रहा है। कहना गलत नहीं होगा कि दोनों सीएमएस ने पीओ सीएल के हाथों दोनों अस्पतालों को गिरवी रख दिया है। यह स्पष्ट हैं, कि सरकार के पैसे और संसाधनों से पीओ सीएल के शिवम अग्रवाल स्वंय लैब चला रहे है, जो कि स्थानीय प्रषासन के लिए एक चैलेंस जैसा है।
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