बस्ती। चीफ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा ने यह कह कर भूचाल ला दिया कि देश में करोड़ांे झूठे मुकदमें चल रहे हैं, और इनके चलते लाखों परिवार बर्बाद हो चुके हैं। कहा कि अधिकांश ऐसे केस मिले हैं, जिनमंे लोगों ने 20 साल जेल में काटा हैं, और बाद में निर्दोष साबित हुए हैं। लेकिन उनका परिवार तो बर्बाद हो गया यानी सब कुछ परिवार का खत्म हो गया और शिकायतकर्ता पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। कहा कि लेकिन अब झूठी गवाही देने वालों पर शिकायत या हलफनामा दाखिल करने पर सजा का प्रावधान किए जाने वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सुनवाई कर सरकारों को नोटिस जारी किया हैं। कहा कि कि अगर शिकायतकर्ता झूठी शिकायत करता हैं तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही का प्रावधान होगा। अब उन्हें माफ नहीं बल्कि भारी भरकम दंड दिया जाएगा ताकि कोई झूठी शिकायत करने से पहले हजार बार सोचे।
अगर यही बात कोई आम व्यक्ति या नेता कहता तो उतना गंभीर नहीं होता। एक तरह से चीफ जस्टिस ने न्यायिक और पुलिसिया व्यवस्था पर बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया, और सोचने पर मजबूर कर दिया। जिस झूठी शिकायत के मामले में चीफ जस्टिस ने सरकारों को नोटिस जारी किया, इसकी पहल बहुत पहले होनी चाहिए थी, अगर इसकी पहल पहले हो गई होती तो लोग बेगुनाह होते भी सालों जेल में न रहतें है। समाज का हर वर्ग इससे पीड़ित हैं, और चाह रहा है, कि इस मामले में सरकार कोई ऐसा कानून बनाए, जिसमें वाकई झूठी शिकायतकर्त्ता को झूठी षिकायत करने के लिए हजार बार सोचना पड़े। ऐसा भी नहीं कि झूठी शिकायत के जरिए अपने दुष्मनों को फंसाने का खेल पैसे वाले ही करते हैं, इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो किसी के बहकावे या पैसे के लालच में झूठी शिकायत करते है। झूठे केस में फंसाने के मामले में सबसे अधिक एससीएसटी एक्ट में हुआ। यह ऐसा एक्ट है, जिसके उपर यह धारा लग गया, समझो वह और उसका परिवार बर्बाद हो गया। इस एक्ट का सबसे अधिक दुरुपयोग उच्च वर्ग को फंसाने में किया गया। इसके पीड़ित परिवार को आथर््िाक लाभ मिलना भी एक्ट के दुरुपयोग का बहुत बड़ा कारण बना। बस्ती में ही अनेक ऐसे झूठे मामले सामने आए जिसमें मंदिर के पुजारी को एससीएसटी एक्ट में सालों जेल काटना पड़ा। झूठे शिकायतों के मामलों में न्यायालय से अधिक पुलिस को सतर्क होना पड़ेगा, क्यों कि अगर कोई 20 साल तक झूठी शिकायत में जेल में बीताता है, तो इसके लिए कानून और पीड़ित व्यक्ति की नजर में वह पुलिस भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने मुकदमा दर्ज किया। कोर्ट में वही मुकदमें जाते हैं, जिसकी एफआईआर पुलिस के द्वारा लिखी जाती है, इनमें कई मुकदमें सीजेएम के आदेष पर भी लिखे जाते है। अधिकतर ऐसे झूठे मुकदमें भी सामने आएं हैं, जिसमें फर्जी तरीके से एफआईआर में दुष्मनी निकालने के लिए डाले गए, अपराध एक दो करते हैं, लेकिन फंसाने के लिए उन लोगों का नाम भी शामिल कर दिया जाता, जो घटना स्थल के आसपास भी नहीं रहते, गैर जनपदों में रहने वालों के खिलाफ भी मुकदमें दर्ज कराए गए। हत्या और मारपीट जैसे गंभीर मामलों में सबसे अधिक ऐसे लोगों का नाम भी डलवा दिया जाता, जिनसे घटना से कोई भी लेना-देना नहीं। अब जरा अंदाजा लगाइए कि अगर किसी निर्दोष को जेल जाना पड़े तो उस पर और उसके परिवार पर क्या बीतेगी? इस तरह के झूठे शिकायत को कानून बाद में लेकिन पुलिस को पहले रोकना होगा। अगर झूठे शिकायत पर सजा होने लगे तो झूठी षिकायतों के बाढ़ को काफी हद तक रोका जा सकता है, और न जाने कितने निर्दोष को जेल जाने से बचाया जा सकता है। इसके लिए न्यायालय और पुलिस दोनों को मिलकर उन लोगों को जेल की हवा खिलानी होगी, जो झूठी शिकायत पर निर्दोष लोगों को फंसाने की साजिश करते हैं।
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