बस्ती। जिले के लोगों ने देखा कि किस तरह भाजपा के नेताओं ने निजी लाभ के लिए ऐसे-ऐसे लोगों को जिला पंचायअध्यक्ष नगर पंचायत का चेयरमैन और ब्लॉकों का प्रमुख बनाया, जिन्होंने पार्टी, सरकार और जनता तीनों को धोखा दिया। हालांकि इसका खामियाजा कुर्सी पर बैठाने वालों को और पार्टी दोनों को भी भुगतना पड़ा। ऐसा भी नहीं कि यह सबकुछ अंजाने में हुआ, बल्कि सोची समझी रणनीति के तहत हुआ। वरना नेताजी के चालक को चेयरमैन और चपरासी को ब्लॉक प्रमुख न बनाते। जाहिर सी बात हैं, कि अगर कोई काम निजी लाभ के लिए किया जाता है, तो उसका खामियाजा सभी को भुगतना पड़ता है। जिस तरह भाजपा के आकाओं ने पांच साल के लिए खानेपीने का इंतजाम किया, उसी का नतीजा है, कि आज सबसे अधिक भाजपा शासित जिला पंचायत, नगर पंचायतों और क्षेत्र पंचायतों में ही भ्रष्टाचार की गंगा बह रही है। अगर भाजपा के सांसद और विधायकों ने मिलकर जिला पंचायत अध्यक्ष न बनाया होता तो जिले में भ्रष्टाचार की नींव न पड़ती, और न तब किसी का चालक नगर पंचायत का चेयरमैन बन पाता और न कोई चपरासी ही प्रमुख की कुर्सी पर बैठ पाता। जिले की जनता ऐसे लोगों को कभी माफ नहीं करती, जो लुटेरों के हाथों में जिले को सौंप देतें हैं। ऐसे लोग भूल जाते हैं, कि जनता उन्हें फिर सेवा करने का मौका नहीं देगी। अगर दिया भी तो जो कुछ बचा है, वह भी लुट जाएगा। इतिहास भी ऐसे लोगों को कभी माफ नहीं करता।

जिस तरह नगर पंचायत गायघाट में जनसंख्या और क्षेत्रफल के नाम पर करोड़ों का फ्राड किया गया, सरकार, जनता और पार्टी को धोखा दिया गया, उसने भ्रष्टाचार की सारी हदें पार कर दी। सरकारी धन को डकारने के लिए कोई इतना बड़ा फ्राड कर सकता हैं, अगर इसका सच देखना हो तो उस नगर पंचायत गायघाट के रुप में देख सकते हैं, जहां के चेयरमैन की कुर्सी पर पार्टी का कोई खाटी कार्यकर्त्ता नहीं, बल्कि नेताजी का वाहन चालक बैठें हुएं मिलेगें। अब जरा अंदाजा लगाइए कि अगर किसी चेयरमैन की कुर्सी पर वाहन चालक बैठेंगे और जिसकी बागडोर किसी और के हाथ में होगी तो उस नगर पंचायत से जनता क्या उम्मीद कर सकती हैं? इस नगर पंचायत के नाम पर ऐसी लूट मची कि सभी लोग दंग रह गए, वे लोग भी दंग रह गए, जिनसे नगर पंचायत से कोई लेना नहीं, और कहने लगे कि इतना बड़ा खेल भाजपा के लोग ही खेल सकते हैं। पर्दे के आड़ में जो लोग खेल-खेल रहे हैं, उन्हें अच्छी तरह मालूम हैं, कि जब तक उनके आका रहेगें, तब तक न तो उनका और न चेयरमैन का मीडिया कुछ बिगाड़ पाएगी। जिले भर के लोग चाहतें हैं, कि ऐसे लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और मानकविहीन नगर पंचायत गायघाट को समाप्त किया जाए। अगर कोई नगर पंचायत सरकार के साथ फ्राड करके अन्य नगर पंचायतों के सापेक्ष राज्य वित्त आयोग, 15वां वित्त आयोग और आदर्श नगर पंचायत के नाम पर करोड़ों का अधिक बजट अनियमित रुप से ले रहा हैं, तो उस नगर पंचायत को अस्तित्व में रहने का कोई अधिकार नहीं है। मीडिया में सच्चाई आने के बाद लोग चेयरमैन एवं नेताजी के चालक को कम और उन भाजपा के आकाओं को अधिक जिम्मेदार मान रहें हैं, जिन्होंने खाटी कार्यकर्त्ता का हक मारकर ऐसे को कुर्सी पर बेैठा दिया, जिसने सभी को धोखा दिया। अंदर-अंदर तो अन्य नगर पंचायतों के चेयरमैन भी मान रहे थे, कि जनसंख्या का गलत आकड़ा प्रस्तुत कर करोड़ों की हेराफेरी की जा रही है, लेकिन कोई खुलकर बोलने के लिए तैयार नहीं था, क्यों कि खुद यह लोग भ्रष्टाचार में लिप्त है। कहा भी जाता है, कि वही भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठा सकता है, जो भ्रष्टाचार न करता हो। इस नगर पंचायत को लूटने वालों ने न सिर्फ राज्य वित्त के धन को लूटा, बल्कि 15वां वित्त आयोग और आदर्श नगर पंचायत के नाम पर मिलने वाले करोड़ों डकारा भी। अगर कोई नया नगर पंचायत 20 हजार से अधिक की जनसंख्या वाली होती है, तो उसे आदर्श नगर पंचायत के रुप में विकसित करने के लिए सरकार चार करोड़ का बजट देती। यह बजट दो किष्तों में मिलता है। इसी चार करोड़ को हथियाने के लिए नगर पंचायत गायघाट की बागडोर संभालने वालों ने फ्राड करके 10 हजार की जनसंख्या को लगभग 25 हजार बता दिया। ऐसे फ्राड को देख, लोग यह सोचने को मजबूर हो रहे हैं, कि क्या कोई भाजपा का नेता इतना बड़ा फ्राड भी कर सकता है, लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा है, कि यह सबकुछ ऐसे नगर पंचायत में हुआ, जिस पर भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं की कृपा है, और रही। इसी तरह 15वां वित्त आयोग के बजट को भी लूटा गया। इस साल इन्हें इस लिए बजट नहीं मिला, क्यों  कि इस नगर पंचायत ने हाउस और वाटर टैक्स नहीं लगाया। जानकार बताते हैं, कि इस तरह की लूट 2014 के बाद शुरू हुई, 2014 के पहले जनसंख्या और क्षेत्रफल में फर्जीवाड़ा नहीं चलता था, क्यों तब ग्राम पंचायतों की सहमति आवश्यक होती थी, लेकिन 2014 के बाद जब से सरकार ने डीएम की संस्तुति करने का अधिकार दे दिया, तब से गड़बड़ी शुरु हुई, अब कोई भी नगर पंचायत राजस्व और प्रशासन से मिलकर फर्जी जनसंख्या  की प्रस्तुत कराकर करोड़ों का अनियमित रुप से बजट हासिल कर सकता है। जैसा कि नगर पंचायत गाय घाट में हुआ। जिले में दस नगर पंचायतें हैं, लेकिन गाय घाट को छोड़कर अन्य ने जनसंख्या में फर्जीवाड़ा नहीं किया। कुछ लोग इस मामले को लेकर पीआईएल भी दाखिल करने की रणनीति बना रहें, ताकि मानक के विपरीत बनाए गए नगर पंचायत गाय घाट को समाप्त करने की चुनौती दी जा सके।