यह बजट नहीं,
जनता की उम्मीदों पर डाला गया ठंडा पानी है।
जिस समय देश
महंगाई, बेरोज़गारी और असमानता से जूझ रहा है,
उसी समय सत्ता ने एक ऐसा बजट पेश किया
जिसमें आम आदमी की पीड़ा के लिए न तो संवेदना है,
न समाधान, न ईमानदार इरादा।
इस बजट में
महंगाई से कराहती जनता को राहत नहीं, उपदेश मिला,
बेरोज़गार युवाओं को नौकरी नहीं, जुमले मिले,
किसान और छोटे व्यापारी एक बार फिर ठगे गए,
शिक्षा और स्वास्थ्य को घोषणाओं के कब्रिस्तान में दफना दिया गया।
यह सवाल अब टाला नहीं जा सकता—
क्या बजट देश के लिए बन रहा है,
या सत्ता को बनाए रखने के लिए?
जब चंद पूंजीपतियों के लिए रास्ते लाल कालीन बन जाएँ
और जनता के लिए वही रास्ते काँटों से भर दिए जाएँ,
तो इसे विकास नहीं,
संगठित अन्याय कहा जाता है।
यह बजट विकास का दस्तावेज़ नहीं,
जनता से कटा हुआ सत्ता का इक़रारनामा है।
इतिहास गवाह है—
जो सरकारें जनता को बजट में भूल जाती हैं,
वक़्त उन्हें सत्ता में रहना सिखाता नहीं,
हटाना सिखा देता है।
— गौरव चौधरी
(एक सजग नागरिक)
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