बस्ती। सालों से सवाल उठ रहा है, कि आखिर महिलाएं क्यों नेताओं की कमजोरी बनती जा रही हैं? और क्यों नेताओं को यह लगता है, कि अगर समूह या गांव गढ़ी की महिलाए न हो तो वह रैली और स्वागत में भीड़ नहीं जुटा सकतें? क्या नेताओं के पास इतने भी कार्यकर्त्ता नहीं हैं, कि वह नेताजी के भीड़ का हिस्सा बन सकें? अब तो नेताओं की योग्यता, क्षमता और उनकी काबिलियत पर ही सवाल उठने लगें? सवाल उठ रहा है, कि क्या कोई ऐसा भी नेता है, जो अपनी लोकप्रिेयता के बल हजार-पांच सौ की भीड़ जुटा सके? जबाव शायद न में ही मिलेगा। जब भी नेताओं को भीड़ जुटानी होती है, तो उन्हें सबसे पहले कार्यकर्त्ता नहीं बल्कि गांव गढ़ी और समूह की महिलाएं ही याद आती है, कोई इन्हें एक साड़ी और पांच सौ रुपये का लालच देकर लाता है, तो कोई यह कहकर लाता है, कि समूह की बैठक है। नेताओं के चुनाव न जीतने का सबसे बड़ा कारण वह खुद हैं, पैसे से यह लोग भीड़ तो जुटा सकते हैं, लेकिन चुनाव नहीं जीत सकते। कहना गलत नहीं होगा कि मीडिया जिसे नेताजी के स्वागत में जनसैलाब उमड़ा लिखती है, उसमें कितनी सच्चाई होती है, मीडिया से अधिक और कोई नहीं जानता। गांव गढ़ी और समूह की महिलाओं का सबसे पहले इस्तेमाल अमित शाह की जनसभा में हुआ। उसके बाद तो नेताओं को लग गया कि भीड़ जुटाने का इससे बढ़िया माध्यम और कोई नहीं हो सकता। इस भीड़ जुटाने में कभी-कभी महिलाओं के साथ नाइंसाफी हो जाती हैं, जैसे क्षेत्रीय अध्यक्ष विनोद राय के स्वागत में हुआ, जब एक महिला को साड़ी और पांच सौ रुपया नहीं मिला तो मीडिया के सामने चिल्लाने लगी कि जब साड़ी और पैसा नहीं देना था, तो बुलाया क्यों? अक्सर आप लोगों ने देखा होगा कि भीड़ में अधिकांश महिलाएं ही होती है, और यह महिलाएं अपने मालिक के प्रति वफादार भी होती है।

इसी तरह महामंत्री हरीश द्विवेदी के स्वागत समारोह में भी हुआ। जब समूह की महिला मीडिया के सामने चिल्लाते हुए कहने लगी कि इसे जरुर वायरल करिएगा, ताकि नेताओं को पता चल सके, कि समूह की महिलाएं अगर अपने पर आ जाए, तो नेताओं की इज्जत उतारने में जरा भी समय नहीं लगेगा। कहती है, कि गांव की सभी समूह की महिलाओं को एक बजे हर्रैया बुलाया गया था, जब कि उन लोगों को यह कर बुलाया गया था, कि हर्रैया में बैठक हैं, यहां आने पर पता चला कि नेताजी का स्वागत करना है, कहा कि एक कप चाय और एक डंडा दिया गया, कहा कि अगर देर रात्रि घर पहुंची तो नेताजी के दिए गए डंडे से पति के हाथों मार भी खानी पड़ेगी। समूह की महिला बहुत गुस्से भी थी, और कह रही थी, कि उन लोगों के साथ धोखा किया गया, कहा कि अब भविष्य में किसी भी नेता के बहकावे में समूह की महिलाएं नहीं आएगीं। अब आप लोग नेताओं की लोकप्रियता का सच जान गए होंगे। जो नेता महिलाओं की कमजोरी बन जाए, उस नेता को राजनीति छोड़ देनी चाहिए, जो नेता हजार-पांच सौ की वास्तविक भीड़ न जुटा सके, वह नेता कहलाने लायक नहीं, सच तो यह है, कि अगर यह लोग अपने बल पर बिना महिलाओं के सौ दो सौ की भीड़ भी जुटा लें, तो बहुत बड़ी बात है।